कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1336, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंआये उत्तर दिशि चित भाये । श्री नगर तुर्म कारण आये ॥
बद्री नाथ आये तुम जहिया । हमहूँ संग आये नृप तहिया ॥
छन्द-- जीव सबसे कह्यो घर घर शब्द काहू ना गह्यो ।
गयो बद्रीनाथ मन्दिर चित्त मम हर्षित भयो ॥
दीन मस्तक हाथ तब जड़ रूप पारस कर लियो ।
प्रीति तुम यह देखि दृढ़ होय दरस अब तोहिको दियो ॥
सोरठा- भक्ति हेतु तुव अंग, साधु प्रीति तुव अंग अहै ॥
निशि दिन साधू संग, ताते चित तोहि राचेयो ॥
राजा वचन ।
चौ०- एतिक वचन राव सुन जबहीं । बिहँसि पदपंकज गहि तवहीं ॥
निशि गति रवि जिमि उगे अकासा । कोक शोक मिटि होत हुलासा ॥
यहि मर्याद दरस आनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चन्दा ॥
रानी राय चरन उर धारी । कृपा कीन मम विथा विसारी ॥
मोहि सनाथ कीन प्रभु पावन । हम अपकर्मी यम मन भावन ॥
अपना करि कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥
सकल जीव चकित मन भयऊ । नगर लोग सब देखन धयऊ ॥
तरुण वृद्ध बालक सब धाये । सबहीं देखि प्रदक्षिणा लाये ॥
संत वृद्ध बहु जुरे अपारा । स्तुति करहि सकल बहु बारा ॥
छन्द-- पाणि जोरिके राव ठाढे देहु पद मोहि पावनो ।
चरण कमल अधार तुम मोहि उभय और न भावनो ॥
छोड़ी नारि पुत्र पुत्री तुरी गज धन सम्पदा ।
राज काज कान छरडयो देखि पद तुम मनरता ॥
सोरठा- अब प्रभु तुम ते काज, यहि विधि मन मानिया ।
तज्यो लोक कुल लाज, सत पद चित अनुराग मोहि ॥
तात्पर्य - जब सत्ययुगमें कबीर साहब श्रीनगरमें प्रगट हुये वहाँके राजा राममोहन रायको (जो बड़ा विद्वान् वेदपाठी, वेदविधिपूर्वक कर्म करनेवाला और संत सेवी था) उपदेश देने लगे । पर राजाने विशेष ध्यान नहीं दिया । फिर राजा सब परिवार सहित बद्रीयात्राको चला तब कबीर साहब भी साधुके भेषमें उसके साथ हो लिये ।
जब राजा बद्रीनाथमें पहुँचकर दर्शन आदि कर अपने आवासपर आ निश्चित हो बैठा तब कबीर साहबने मंदिरमें जाकर मूर्तिके माथेपर हाथ रखा