कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ें(काफिर बोध दूसरा अभीतक नहीं मिला जो मिला सो यहाँ दे देते हैं।)
काफिर बोध
कौन सो काफिर कौन मुर्दार । दोऊ शब्दका करो विचार ॥
गुस्सा काफिर मनी मुर्दार । दोऊ शब्दका यही विचार ॥
हम नहिं काफिर हम हैं फकीर । जाइ धूँठे सरवर के तीर ॥
चोरी नारी दरोग सो डरें । राह सो लेखा सबका करें ।
नंगे पायन पृथ्वी फिरें । हाट न लूटै वाट न परें ॥
हमतो किसीका कछु न विगारें । दर्दमन्द दिल दया सवारें ॥
दुनिया लोक सो उल्टी करें । सत्यनाम सदा उच्चरे ॥
सिकका देखि न कहिये फकीर । फकीर, न कूटे पुरानी लकीर ॥
काफिर सो कुफराना करे । अल्लाह खुदा सो नाहीं डरे ॥
करें न बन्दगी फिरे दिवाना । गरब वाँधि फिरे गैवाना ॥
बोल कुबोल सेवा बिसरावैं । खून खराफात न द्वार बहावैं ॥
दिलमें चोर कमरमें कत्ती । लोगनके घर भाजे रत्ती ॥
अलहके नामें बाँटे खाना । सो कहिये साँचे मुसलमाना ॥
मुसलमान मुसावे आप । सिदक सबूरी कलमा पाक ॥
खड़ी ना छेडे पड़ी न खाय । सो मुसलमान बिहिश्त को जाय ॥
कलमा पढैं न आवैं बिहिस्त । हिरदे रहे बापकी दिष्टि ॥
हिन्दू मुसलमान खुदाक बन्दे । हमतो योगी न राखे छन्दे ॥
देवी देहरा मसीद मिनार । हमरे तो एक नाम अधार ॥
टाकी ले कौन ऊपर चढै । पाव न दावैं हाथ न बढै ॥
तहाँ न अग्नि पवनका डर । ऐसा अलखपुरुष जिन्दपीर का घर ।
चूरा पथ्थर बनाया दादा आदमकी करनी । हमतो रहें अलेख
पुरुष, जिन्दा पीरकी शरनी ॥ मक्खी जाय बंधनमें परी । छानत
छानत ताही गिरी ॥ काजी मुलना करे विचार । मक्खी किया बटा अहँकार ॥
मक्खी तो गाये भखे, तो सूअर भखे मक्खी तो हला भखे, मक्खी
तो मुर्दार भखे ॥ मक्खी जाय विगारे खाना । तहाँ न चले बादशाह
परवाना । कोरा कलमा बहुतेरा बोलै । खैर मिहरका खीस न खौले ॥
मिहर न बाँटे मुर्दार खोरा । खैर न बाँटे अल्लहका चोरा ॥ अरस परस-
बीच समाना । मोम दिल मोम दिल जाना ॥ सिदके सो परि पहि
चाना । दर्दमन्द दुरवेश बखाना ॥ रहमत है सुरशिद पीरको ॥ जहमत