भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 310

(देखो ग्रंथ कबीरसागरनं. ११ कबीरचरित्रबोध तथा दूसरे ग्रन्थोंमें) तब शेखने कहा, मैं जानता हूँ कि, कबीरने जादू किया है इस कारण वह नहीं डूबा है। यदि अबकी बार मैं कबीरको पाजाऊँ तो अग्निमें जलादूँ—यदि वह अग्निसे बच जावेगा तो मैं उसको परमेश्वरका सत्य अंश समझूंगा। उसी समय कबीर साहब गङ्गासे बाहर निकल शाहसिकंदरके निकट गये आपके देखतेही शाह उठ खड़ा हुआ और अत्यंत मान संप्रभम सहित कबीर साहबको अपने बराबर आसनपर बैठा लिया। यह देखके पूर्वोक्त शेख अत्यंत क्रुद्ध हुआ। उसके नेत्र रक्तवर्णके होगये, कहा कि ए, कबीर ! तूने जादू किया है इस कारणही जलमें नहीं डूबा। तब कबीर साहबने कहा कि, ऐ शेखजी ! जैसे आप कहो बादशाह बोला कि, आप मुझे कबीरके मारनेके लिये कहते हैं पर इसमें मेरा कुछ वश नहीं है क्योंकि, पीर और फकीर परमात्माकी जात हैं वहां मेरा जोर नहीं पहुंच सकता। यदि वो रैयत (प्रजा) होते तो मैं जोरभी करता वो लापरभा फकीर है वहां जोर करना शोभा नहीं देता। आप ही तो यह समझकर कहा करते थे कि, पीर और फकीर परमात्मा हैं अब आप इस फकीर कबीरको मारनेके लिये कहते हैं यह मुझसे नहीं हो सकता। आप और वो एकही तो हैं यह अपने मनसे विचारो उसने तो आपका कुछ भी नहीं बिगाड़ा है। आप उसपर क्यों गजब करना चाहते हो, बड़े लोग नेकी बताया करते हैं, उन्हें जोरो जुल्म नहीं अच्छे लगते। आप मेरी बात मानलें लड़ाई छोड़ दें परमात्माकी ओर देखकर मेल करलें। यह सुन तकी बोला कि, ए सुलतान ! तुमें कोई दुःख न होगा मैं कहूं सो मानकर मेरा सन्तोष कर। यह सुन सिकन्दर बोला कि, चाहे मेरा शिर लेलीजिये पर फक्कड़ कबीरको न मारो, मैं यह मांगता हूँ मुझे देदीजिये। यह सुन तकौने क्रोधमें आ आपने ताजको जमीपर दे मारा। कबीर दासजी कहते हैं कि, जब हमने शाहको व्याकुल देखा तो कह दिया कि, ए सुलतान ! अब पीरका कहा करें हमें इसमें कुछ भी त्रास नहीं है मैं इसी तरह कह रहा हूँ यह भी बात नहीं है किन्तु सत्य नाम (श्रीराम नामके बलपर) कहता हूँ क्योंकि, मैं भी उसका ही दास हूँ। यह सुन बादशाहने कह दिया कि, जो चाहे सो कबीरका करलो, आप मार डालों हम कुछ भी बुरा न मानेंगे पर जो साधुको मारता है उसका भला नहीं होता। क्रोधमें आकर शेखतकीने कह दिया कि, कोई है जो कबीरको बांधे। आप शेखतकी उठ खड़े हुए तथा सभी काजी पंडितभी बांध २ कहने लगे। किसीनेभी नहीं कहा कि, देखो विचारो। हाथ पैर बांधकर गंगाजीमें बार दिया, पर, कबीरजीको इसमें कोई संशय नहीं हुआ। आप गंगाजलके ऊपर आसनबांधे दीखे