भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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लिये नमस्कार है। ॐ प्रथमाधारचक्रं गुदा स्थानं रक्तवर्णं देवता सिद्धिः बुद्धिः शक्ति कूर्म ऋषि मूषक वाहन अपान वायु कूर्म कला अंकोचन मुद्रा मूल बंध चतुरदल ४ चतुरमात्रा ४ वं शं षं सं अंतर मात्रा ४ वहिर्मात्रा ४ आनंद १ योगानन्द खीरानन्द ३ श्रीपरमानंद ४ अजपा जाप षट्शतानि ६०० घटिका ४ पल ३२ अक्षर ४ पूजा मानसिका सोहंभावेन पूजयेत् अत्र गंधादि समर्पयामि नमः ॥ ॐ प्रथम आधारचक्र है यह गुदाके स्थानमें है लाल रंग है। उसका देवता गणेश है। सिद्धिबुद्धि शक्ति है। कूर्म ऋषि है। मूल बंध है। चार पत्ते हैं। चार मात्रा हैं। बं शं षं सं भीतरी चार मात्रा। बाहरी चार मात्रा, आनन्द, योगानन्द, वीरानन्द और श्रीपरमानन्द हैं। अजपाजाप छः सौ है। यह चार खड़ी तथा बत्तीसपलमें होता है। अक्षर चार है। पूजा मानसी है सोहम् भाव करके पूजें यों कहे कि, इत्र गन्ध इत्यादिसे मैं पूजता हूँ ॥

महासमुद्र अर्थात् समस्त स्थानपर जलही जल परिपूर्ण हो रहा है और दूसरा कुछ नहीं। यह जलस्थान जलरञ्ज गोसाईंका है।

ब्रह्माण्ड ।

पूर्व कहा हुआ स्वरूपही समस्त ब्रह्माण्डका भी है। इसीको तीन लोक भव-सागर कहते हैं। इसीमें उत्पत्ति स्थिति तथा विनाशका समस्त कौतुक हो रहा है। इस कौतुकको बड़े कौतूकीने बनाया है। जिसके भेदको भवसागरके रहनेवाले नहीं जान सकते। जितने खिलाड़ी हैं उन सबमें यह खिलाड़ी बड़ाही बलिष्ठ है। किसी तांत्रिकका तंत्र अथवा कौतुकीका कौतुक इसके आगे जा नहीं सकता। इस कारण संसारमें जितने जादूगर हैं सब इसके चरे बन गये। जो जादूगर उसके सामने खड़ा होता है, उसीको वह दबालेता है। सबको अपने अधीन बना लेता है। ऐसेही तौरीतमें लिखा है कि, जब मूसा बहुतेरे कौतुक दिखलाने लगा, तब फिरऊन बादशाहने अनेक जादूगरोंको बुलवाया, उन जादूगरोंने अनेक सर्प उत्पन्नकर दिये। तब मूसाने अपना सोंटा चलाया वह सोंटा बहुत बड़ा अजगर बन गया। उसने जादूगरोंके समस्त सर्पोंको खालिया। समस्त जादूगर मूसाके सामने न ठहर सके, भाग गये। इस प्रकार समस्त कौतुकवाले इस विशाल कौतुकी की सेवावंदनामें रहते हैं। जिसको सत्यगुरु मिल जावे वह वास्तवमें उसके पञ्जेसे बच निकले। दूजी कोई युक्ति नहीं। इस ब्रह्माण्डका स्वरूप जो बनाया गया उसमें पहला चित्र इस प्रकार नहीं बनाया गया। कारण यह कि, उक्त स्थान-पर्यन्त कोई भी भाग्य शाली पहुँच नहीं सकता है। जितने सिद्ध साधु हैं वे तीन स्थान पर्यन्त पहुँचते हैं। अर्थात् सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, जो सायुज्य मृक्ति