भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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रखकर आना । ए ! इशककी दिलमें आग लगी हुई है दिलमें जितनी हवस हो उसे पूरा करले । जा तूने दुनियाँकी हवससे नापाक जाम भर रक्खा है उसको छोड़ने कीही भेंट भाट हो ए मेरे बीमार बुलबुल ! उसके छोड़ेसे सब आफत टल जायंगी । प्याला पीकर मनुष्यवर सिंडीके समान न हो, न दुनियाँकी ही हविश कर । जब नाले लगानेका वख्त आया तब सोता पड़ा है । ए ! अब रात बीत चुकी है, जग खबर ले जो तने बीज बोया है, उसीकी खेती फलती है इसमें पूर्ण प्रकरण तथा बुलबुलसे जीवात्माका संबोधन किया है ।

हेला (नदा) के अङ्गकी साखिया ।

कबीर देश दे हम वगरिया, ग्राम ग्राम सब खौरा ।
ऐसा जिवडा न मिला, ए जो फरक विछोर ॥ १ ॥
कबीर समझाए समझे नहीं, पर हाथ आप बिकाय ।
समझाए समझे नहीं, बाँधे यमपुर जाय ॥ २ ॥
कबीर जाए नाता आदिको, विसर गयो वह ठौर ।
चौरासीके विसपर, अखत औरकी और ॥ ३ ॥
कबीर वस्तु है गाहक नहीं, वस्तु सोगरव मोल ।
बिना दामको मानवा, फिरे सो डावों डोल ॥ ४ ॥
कबीर —यह जग तो झेडे गया, भया जोग नहिं भोग ।
तिल तिल झार कबीर लए, तलठी झारें लोग ॥ ५ ॥
सुरनर मुनि और देवता, सात द्वीप नौ खण्ड ।
कहै कबीर सब भोगिया, देह धरेको दण्ड ॥ ६ ॥
कबीर-लघुताई सबते भली, लघुताते सब होय ।
जस दुतियाको चन्द्रमा, शीष नवें सब कोय ॥ ७ ॥
कबीर—जो कोई मिला सो गुरुमिला, चेला मिला न कोय ।
छः लाख छानवे रमैनी, एक जीवपर होय ॥ ८ ॥
कबीर—श्रोता तो घरही नहीं, वक्त बदे सो बाद ।
श्रोत्रा वक्ता एक घर, तब कथनीको स्वाद ॥ ९ ॥
कबीर—सुन कागज छुवों नहीं, कलम गहों नहिं हाथ ।
चारों युगको महात्म, मुखहि जनाई बात ॥ १० ॥
कबीर—दुःख न था संसारमें, था नहिं शोग वियोग ।
सुखहीमें दुःखला दिया, बोली बोलें लोग ॥ ११ ॥

हम देश देश और गाम २ में फिर । सब जगहोंमें गये पर ऐसा कोई जीव