भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 485

निकालना चाहा, पर उस लिङ्गका अन्त उनको नहीं मिला। तब विवश होकर उसको उन्होंने छोड़ दिया और हिन्दू उसको पूजते हैं।

नानकशाह महाशयकी जन्मसाखीमें लिखा है कि, जब आप भवकेमें गए तब मरदानाने पूछा कि, गुरुजी ! इस भवकेके भीतर क्या है ? तब नानकसाहबने उत्तर दिया कि, तुम जाकर देखो। तब मरदानाने कहा कि, मुझको यहाँके झाड़ू देनेवाले भीतर जाने न देंगे। तब नानकसाहबने कहा कि, तू जा, तू सबको देखेगा पर तुझको कोई न देखेगा। मरदाना भीतर जाकर देख आया। फिर नानकसाहबने पूछा, क्या देखा ? तब मरदानेने कहा कि, वहाँ देखनेको क्या है ? भवानके भीतर एक नग्न मूर्तिमात्र पड़ी है, दूसर, कुछ नहीं। तब नानकशाहने कहा कि, वह शिवजीकी मूर्ति है। मुहम्मदसाहब और अलीने समस्त मूर्तियोंको तोड़ा तथा पृथक् किया, पर उस मूर्तिको हटा नहीं सके। मुहम्मद साहबके पीछे खूबवार हुसेनी नामक एक बादशाह हुवा। उसने उस मूर्तिको अलग करना चाहा। तब उसके सारे शरीर तथा उसके समस्त सैन्यमें आग लग गई। सब मरने लगे तब उस बादशाहने अपने दोषके निमित्त क्षमा-प्रार्थना की। इस कार्यसे हाथ रोका। तब उसको और उसकी फौजको सुख मिला।

भवतवर पीपा कबीर साहिबके गुरु भाई थे। आपका बाहा विश्वास था जो कि कबीर साहिबका है। आप भी उसी तत्त्वके उसी पथसे उपासक थे जिसकी तत्त्वसे तथा जिस पथसे कबीर साहिब थे। पीपाके विश्वासकाही प्रभाव था कि सच्ची द्वारिकामें पहुँच गया कबीर साहिबके राम मंत्रके विश्वासकी करामात थी कि सिद्ध पदवी पाई। यद्यपि असत्में सत्का विश्वास उतना लाभदायक नहीं होता जितना कि सद्दस्तुका होता है संवादी भ्रम तो साक्षात् कल्याणकारी दीखताही है। पर झूठे विश्वासमें सुख नहीं है भक्तोंके श्रद्धा विश्वास निराले हुआ करते हैं उनकी दीवानगी अनन्य भक्तिको लिये हुए होती है। जो कुछ वो चाहते हैं सत्य पुरुषको वही बनना पड़ता है। इसका रहस्य साधारण व्यक्ति नहीं समझ सकते। इसे वे ही समझ सकते हैं जिनके दिलमें कुछ प्रकाश हो।

जीवकी हालत ।

पहिलेमें कुछ और था पर जब मेरी यथार्थ अवस्था बदल गई और मैं दूसरी अवस्थामें आया तब मैं भ्रमका पुतला हो गया और मैं सहस्रों प्रकारके धर्म कर्म स्थिर करने लगा। एक धर्मको मैं सच्चा ठहराता हूँ तथा दूसरेको झूठा समझता हूँ अनगिनती धर्म मैंने स्थिर किए और कर रहा हूँ और भविष्यमें