भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जो मुरशिद मेहूँवाँ रह बरहो उसका । तो वह जीव फिर न भवसागरमें अटका ॥
यही तदवीर आजिज है न कोई और । लगा एकतार धुन सतनाम रटका ॥

समस्त धर्मोंका वृत्तान्त ।

समस्त धर्म जो अभीतक पृथ्वीपर प्रचलित हुए तथा होंगे वे सब केवल एक ओम् शब्दके आधार पर हैं । इसी ओम्द्वारा चार वेद तथा तीनों लोकोंकी स्थिति है तीन वेद अर्थात् ऋग, यजुः, साम, अथर्व ये चारों असल हैं । इन चारोंकी पहुँच सत्यपुरुषके सत्यलोकतक है । देखो अथर्वण वेद प्रश्नोपनिषद्-सत्यकाम ऋषि अपने गुरु पिप्पलाद ऋषिसे प्रश्न करता है यह पाँचवाँ प्रश्न और ५९ मंत्र है ।

ऋग्निरेतंयजुर्भिरन्तरिक्षंसाम्भिर्यत्कवयो वदन्ति ।

तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान्यत्सच्छान्तमजरममृतमभयंपरञ्चेति ॥

जैसे समस्त पृथ्वीके मनुष्य पूजते तो विष्णुको हैं पर अपनी अविद्याके कारण दूसरा परमेश्वर समझकर एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हैं । इसी प्रकार समस्त संसारके निमित्त चलन इस वेदमें लिखे हैं । शब्द अथवा ओम्हीपर समस्त संसारको उपदेश दे दिया है । समस्त बैरागी ब्राह्मण और संन्यासी तो प्रत्यक्षमें विष्णुपूजा किया करते हैं पर दूसरे लोग अपने अज्ञानवश कोई अन्य परमेश्वर ठहरा रहे हैं । छः दर्शन और छियानवें पाखण्ड और समस्त संसारके अच्छे बुरे मनुष्य इसी परमेश्वर के अधीन हैं । वही ब्रह्म जीव और माया है । वही तीनों परमेश्वर हैं । वही पुरुष और प्रकृति है । वही ब्रह्म और माया है । बौद्ध धर्मों अथवा चीनवालाका योग और यज्ञ है । योग पुरुष चिह्न तथा यज्ञ स्त्रीत्वका चिह्न है । वही आद्या, निरञ्जन, ब्रह्म और शक्ति कहो सब एक बात है । योगी और संन्यासी शिवको पूजते हैं । उनका गुरु शिव है । इस कारण शिवलिंगकी पूजामें संलग्न हुए, वेदान्ती अद्वैत ब्रह्मका समाचार देते हुए द्वैतको पूजते हैं । इसका कारण यह है कि, समस्त संसारमें द्वैतका हुल्लड है । अद्वैत तो छिपा हुवा तथा विलोपित है, वह तो कहने सुननेमें आता नहीं, समस्त काय्योंसे मनुष्य अनभिज्ञ हैं, अज्ञानावस्थामें उसकी बीतती है, समस्त आज्ञाएँ वेदकी हैं । प्रत्यक्षमें दो मत संसारमें वेदको विरुद्ध माने जाते हैं—जैन तथा बौद्ध । सो ये दोनों भी वेदके ही हैं, अज्ञानसे उससे उसमें अन्तर दिखाई देता है । बौद्ध तो अब भारतवर्षमें नहीं हैं, पर जैन तो अनेक हैं ये लोग पञ्च परमेष्ठी मानते हैं । परमेश्वर कोई नहीं सो उनके पञ्च परमेष्ठी यह हैं । १ अरहन्त—२ सिद्ध—३—