कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुना था कि, दक्षिणदेशकी किसी वस्तीमें बड़ाही तेजमय एक ऋषि प्रगट हुवा था। कुछ कालपर्यन्त लोगोंको दिखाई दिया फिर अन्तर्धान हो गया। इस ऋषिके शरीरपर बड़े बड़े बाल थे।)
कुष्ठम् ऋषि ।
कुष्ठम् ऋषि अन्तरिक्षमें रहते हैं, आपका वृत्तान्त कबीर साहबके ग्रंथ अम्बुसागर चतुर्थ तरंगमें इस प्रकार लिखा है कि, जलरङ्गजी और कबीर साहबकी पातालमें वार्तालाप हो रही थी जिस युगमें यह बातचीत हुई इस युगका नाम पुरमन युग है, पचास लाख वर्षकी इस युगकी उमर थी। तब कबीर साहबने कहा कि, अन्तरिक्षद्वीपमें एक ऐसा पक्षी रहता है कि, सहस्रों-उत्पत्ति स्थित और विनाश हुआ करता है कुष्ठ पक्षी सदैव समान भावसे रहता है उसको किसी प्रकारका कष्ट नहीं पहुँचता। वह पक्षी बड़ाही तपस्वी तथा साधु है। वह पक्षी बड़ा तेजस्वी है। कहा है कि, समस्त सृष्टिका कौतुक महा-प्रलयके समय कुष्ठमजीके मुहमें समा जाता है। यह कुष्ठम ऋषि हंस कबीर है। सत्यगुरुकी आज्ञासे किसी प्रकार मुंह फेरा इस कारणही उनकी सूरत पक्षीकी हो गई। कबीर साहबद्वारा कुष्ठम ऋषिकी बड़ाई तथा श्रेष्ठता सुनकर जलरङ्गजी आदि अनेक हंसोंके मनमें प्रबल कामना हुई कि, कुष्ठमजीका दर्शन करें। सबोंने कबीर साहबसे निवेदन किया। कबीर साहबने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और सब हंसोंको जलरङ्गजी सहित लेकर चले। उसी प्रकरण में अम्बुसागरसे यहाँ उद्धृत करते हैं -
जलरंग वचन ।
चौ० -कह जलरङ्ग सुनो मम बानी । पक्षी दर्शन सुरत समानी ॥
अब तुम मोहि सङ्गले जाई । पक्षी मो कहैं देहु देखाई ॥
तब जलरंग भेज शठहारा । चलो हंस सब संग हमारा ॥
ज्ञानी वचन ।
यह सुन ज्ञानी वचन उचारा । शब्द विमान होहु असवारा ॥
उभय विमान चढे मिल ओई । चले विनोद हंस सँग सोई ॥
ज्ञानी अंश चले सब आगे । और जलरङ्ग सङ्ग सब लागे ॥
छिन्नमें गए पंछीके पासा । लोक निरन्तर जहाँ निवासा ॥
द्वै अंश तहाँ ठाढ रहाये । पक्षीको तब खबर जनाये ॥
पंछी बैठे आसन मारी । युग पचासकी लागी तारी ॥