कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 691, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं । जिससे सत्यपदार्थका विवेक हो उसीका नाम सत्सङ्ग है, वह सत्यपुरुष निर्गुण तथा सर्गुणसे परे है । जिसके द्वारा वह सत्यपुरुष सर्गुण निर्गुण सबसे परे जाना जावे उसे सत्सङ्ग कहते हैं । उसीसे मनुष्यकी मुक्ति होती है, अपना शुद्ध स्वरूप पहचान सकता है ।
सत्य—अब जानना चाहिये कि, सत्य किसको कहते हैं ? जो तीनों कालोंमें समान स्वरूपमें रहे उसमें विभिन्नता कदापि न हो एवं निर्गुण सर्गुणसे अलग चारों वेदोंसे न्यारा हो उसे सत्य कहते हैं । इससे सभी बेसुध हैं, इसी सत्यको सत्यनाम कहते हैं यही सत्यनाम निःअक्षर पुरुष है । क्षर, अक्षर, निःअक्षर, क्षर मायाको कहते हैं । अक्षर आत्मा अर्थात् जीवको बोलते हैं जो कूटस्थ कहलाता है । जो इन दोनोंसे पृथक् है उसीको निःअक्षर या पुरुषोत्तम कहते हैं । जब यह जीव पांचोंको छोड़कर सत्यपदमें समाता है, उसमें भली प्रकार निमग्न हो जाता है तब उसका नाम हंस कबीर कहलाता है । वह सत्यपदार्थ जिस द्वारा सत्यपुरुष की प्राप्ति होती है वह सत्सङ्ग है । ऐसे सन्त प्रायः नहीं मिलते । जब तक ऐसे सन्तोंकी सङ्गति नहीं होती तब तक मनुष्य हंसका स्वरूप नहीं पा सकता । हंसको ब्रह्मा, विष्णु, शिव दण्डवत् प्रणाम करते हैं, यह बात नहीं वरन् स्वयम् निरञ्जन उनको नमस्कार करता है । जब हंस उस देशको चलतें हैं तब उनका प्रभाव अनुपम होजाता है ।
सत्यकबीर वचन
श्लोक— चन्द्रोभानुर्नभो वायुः पृथिव्यग्निर्जलं तथा ।
नहि पञ्चभ्योस्ति तथा लोके रूपं विलक्षणम् ॥
चन्द्र, सूर्य, आकाश, वायु, पृथिवी, अग्नि, जल यहां नहीं, वह लोक पांचों तत्त्वोंसे भिन्न है, उसका रङ्ग ढङ्ग न्यारा है, वह क्या कहा जावे जहां न पांचतत्व हैं, न तीन गुण हैं, न किसी प्रकारकी सांसारिक वासनाएँही हैं, वो न स्त्री पुरुष, न छोटा बड़ा और न राजा प्रजा ही है ।
साखी—समझेकी गति और है, जिनसमझा सब ठौर ।
कहैं कबीर इस बीचका, बलकहि औरै और ॥
दौड धूप छोड़ो सखिया, छोड़ो कथा पुराण ।
उलटि वेदको भेद गहो, सार शब्द गुरु ज्ञान ॥
सुरति फँसी संसारमें, ताते परिगा दूर ।
सुरति बांध स्थिर करो, आठो पहर हजूर ॥
नाम सत्य गुरु सत्य है, आप सत्य जब होय ।