भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 734

लगभग पैंतालौस वर्ष होते हैं जब मैं चुनारगढ़ जो कि, काशीके समीप है वहाँ गया। वहाँके पर्वतपर जाके मैंने एक प्रकारका वृक्ष देखा। उस वृक्षके जड़से लेकर डालियोंतक नागरी अक्षरोंमें राम राम लिखा था। वहाँ इस प्रकारके अनेक वृक्ष थे। समस्त वृक्षोंकी यही दशा थी कि, सबमें राम राम लिखा हुआ था, जब सब वृक्षोंकी यही दशा देखी तब भली भाँति दृष्टि दौड़ाई जड़से ऊपरतक समानही देख पड़ा। अनुमान किया कि, इन वृक्षोंपर कोई आकर लिख गया होगा। इन वृक्षोंमेंसे एक वृक्षकी छाल हटाकर देखा तो छालके भीतर भी वही राम राम सुन्दरताके साथ लिखा हुआ था। तब निश्चय होगया कि, यह किसी मनुष्यके हाथोंका लिखा हुआ नहीं बरन् प्राकृतिक लिखावट है। उसके उत्पत्ति कालसेही यह गुण उसमें आगया है। उन वृक्षोंकी यह दशा देखकर मैं गांवमें गया, लोगोंसे पूछा इस वृक्षका क्या नाम है? तब लोगोंने कहा कि, इसे रामनामी वृक्ष बोलते हैं। उस वृक्षकी जड़में जो अक्षर थे उनकी स्याही बहुत काली थी और जैसे जैसे वे ऊपर जाते थे वैसेही वैसी स्याही फीकी पड़ती जाती थी। पतली डालोंकी स्याही बड़ी फीकी थी परन्तु पत्तोंके नाम तो अत्यन्त फीकी स्याहीमें होंगे कि, वे दिखाई भी न दे। उस वृक्षका वह रङ्ग ढङ्ग देखकर मैंने जाना कि, पूर्वकालका यह कोई भक्त है और किसी दोषवश वृक्ष हो गया है।

उस समय यमलार्जुन कुबेरके पुत्र याद आये जो नारद मुनिके शापसे वृक्ष हो गये थे। श्रीकृष्ण जीने उनका उद्धार किया था। उस वृक्ष की अवस्थासे उन्हें छुड़ाकर उनको यथार्थ स्वरूप प्रदान किया था। इसी प्रकार गौतम ऋषि की स्त्री (अहिल्या) गौतमके शापसे पत्थर हो गयी थी, श्रीरामचन्द्रजीकी कृपासे अपनी पूर्वावस्थामें, प्राप्त हुई। इसी प्रकार सब जीव कर्मके बन्धनमें पड़े हैं, जड़ और चैतन्य सब फँसे हुये हैं। कदापि किसी योग यत्नसे नहीं छूटते, उलटा दिन प्रतिदिन और अधिक फँसते जाते हैं। इसी विषयपर कबीर साहबने रमैनी कही हैं उन्हें यहीं लिखे देता हूँ।

कर्मखण्डका सत्यकबीर वचन

रमैनी-कर्म कथा अब कहूँ बखानी। जौन फाँस अटके नर प्राणी ॥
चारों खानि कर्म अधिकाई। चहूँ खानि मिलि कर्म दृढ़ाई ॥
कम्महि धरती पवन अकासा। कर्महि चन्द सूर परकासा ॥
कम्महि ब्रह्मा विष्णु महेश। कम्महि भये गौरि गणेश ॥
सातबार पन्द्रह तिथि साजा। नौग्रह ऊपर कर्म विराजा ॥
कम्महि रामकृष्ण औतारा। कर्महि रावण कंस संहारा ॥