कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 766, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंx जीवयोगिनि
२ स्वसंबेदका यह कथन है कि, सर्वजीव चौरासी लाख योगिनमें मारे मारे फिरते हैं। जैसे जिसके कर्म होते हैं उसीके अनुसार उसको सुख दुख मिलता है। सब जीवोंको स्वरूप तथा स्वभाव उनके पूर्वजन्मके कर्मानुसार होता है जबतक मुक्ति नहीं होती तबतक सब जीवोंका आवागमन ही हुआ करता है। कोई जीव चौरासी योगिनमें फिरनेसे बिना पारख गुरुके छूट नहीं सकता।
चौरासी लाख योगिका वृत्तान्त—जैसा कि, कबीर साहबने अनुराग सागर ग्रन्थमें कहा बैसाही लिखता हैं। जलके जीवोंकी योगि नौलाख हैं पक्षियोंकी चौदह लाख योगि हैं, सताईसलाख अनेक प्रकारके जीव कीड़े मकोड़े इत्यादि हैं। तीस लाख स्थावर हैं। मनुष्योंकी चारलाख प्रकारकी योगि हैं। यह चौरासी लाख योगि हुई। इन सबमें—केवल मनुष्य देहसे मुक्ति होती है, किसी दूसरी योगि से कदापि छूटकारा नहीं पा सकता क्योंकि, दूसरी देहके तत्त्वोंमें विभिन्नता और कमी होती है। इस कारण उनकी अल्प विद्या होती है। उनका हाल यों है कि, एक तत्त्व जलसे सब स्थावर हैं और दो तत्त्वोंसे उखमज अर्थात् मक्खी और मच्छड़ इत्यादि हैं, तीन तत्त्वोंसे अण्डज अर्थात् अण्डा देनेवाले सब जीव हैं, चार तत्त्वसे पिण्डज अर्थात् बच्चा देनेवाले जीव हैं। इस कारण मनुष्योंको सबसे अधिक ज्ञान होता है इसी देहसे भक्ति और मुक्ति हो सकती है। जल तत्त्वसे स्थावर अर्थात् पेड़ इत्यादि हैं। अण्डजखानके समस्त जीव, वायु अग्नि जल इन तीन तत्त्वोंसे हैं। और उखमजमें वायु और अग्नि ये दो तत्त्व हैं, पिण्डजमें वायु अग्नि जल मिट्टी ये चार तत्त्व हैं, जो मनुष्यकी देह है वह पूर्णतया पांच तत्त्वसे है। स्त्री पुरुषमें तत्व समान है पर बुद्धिकी विभिन्नता है। यह जीव चारों खानिनमें फिरते फिरते मनुष्य की देह पाता है। पूरे पाँच तत्व और तीन गुणोंसे मनुष्यकी देह है। पूर्वजन्मके चिन्ह उसके साथ होते हैं, उसके वेही रङ्ग ढङ्ग परिलक्षित होते हैं।
१ अण्डजसे मनुष्य होनेके चिन्ह—जो जीव अण्डजखानिसे मनुष्यदेह पाता है
x अनुराग सागर पृ० ४८ में लिखा है कि कहैं कबीर मुनो धर्मनि वानी, तुमसे अब योगि भाव बखानी ॥ भिन्न २ के कहैं समुझाई। तुमसे संत न कछु दुराई ॥ नौ लाख जलके जीव बखाना। चतुर्दश पंछी परवाना ॥ क्रुम कीट सताइस लाखा। तीस लाख जग स्थावर भाषा ॥ चतुर्लक्ष मानुष परमाना ॥ मानुष देह; परमपद जाना ॥ और योगि गहि परमपद पावे। तत्वहीन वह भटका खावे ॥ १ अनुराग सागर ४९ पृ० में कहा है कि—चारि खानि जीवनके आहीं ॥ तत्वमेद आहि पुनि ताहीं ॥ सो, अब तुमसो कहों, बखानी। एक तत्व अस्थावर जानी ॥ उखमजें दोय तत्व परमाना। अण्डज तीन तत्व गुण जाना ॥ पिण्डज चार तत्वतेहि कहिये। पांच तत्व मानुष तन लहिये ॥ ताते हो ज्ञान अधिकारा। नरकी देह भक्ति अति प्यारा ॥