कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 869, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहा । इस प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।
मइजअं प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।
रोटी खरीदनेवाला—अन्यान्य कुत्तोंके सदृश निउफाउण्डलैण्डके कुत्ते भी अपने समयको पहचानते हैं । इस विषय पर औबिल साहबका एक उदाहरण है कि, निउफाउण्डलैण्डका एक अच्छा कुत्ता डोर्स नगरकी सरायमें रहा करता था । उसका यह नियम था कि, प्रातःकाल आठ बजते ही कुछ पैसें सहित एक टोकरी ले रोटी बेचनेवालेके पास जाता । रोटी बेचनेवाला पैसा ले लेता था । उसके बदले टोकरीमें रोटी रख देता था । वह रोटी लाकर पाकशालामें रक्षा-पूर्वक रख देता था । बडे आश्चर्यकी बात तो यह है कि, वह रविवारके दिन उस टोकरीके पास न जाता न उसको छूता वह अइतवारको व्रत रखा करता था । एक दिनकी घटना है कि, जब वह कुत्ता रोटीकी टोकरी लिये चला जाता था तो एक दूसरे कुत्तने रोटीकी टोकरी छीन लेनेके लिये उसपर आक्रमण किया, पर उस बुद्धिमान् कुत्तने टोकरी पृथिवी पर धर दी आक्रमण करके उस कुत्तेको भगा दिया । पीछे रोटियोंकी टोकरी लेकर अपने स्वामीके घर सानन्द चला आया ।
बुद्धिमान् डण्डी—एडिनवर्ग नगरमें निउफाण्डलैण्डका कुत्ता रहता था । उसमें ऐसी बुद्धि थी कि, सहस्रों टोपियोंमेंसे स्वामीकी टोपी पहचानकर निकाल लाता था । सहस्रों ताशोंमेंसे स्वामीकी तास भी पहचानकर निकाल लाता सहस्रों छूरियोंके ढेरोंमेंसे स्वामीकी छुरी पहचानकर निकाल लाता । जिस किसी विशेष वस्तु तथा कार्यके लिये कहा जाता वही करता, चाहे वह चीज सहस्रोंके ढेरमें क्यों न हो उसीको पहचानकर निकाल लाता । इससे यह प्रमाणित होता है कि, वह गन्धसे नहीं बरन् बुद्धिकी तीक्ष्णतासे जान लेता था । एक दिन सांझ को अनेक मनुष्य एकत्रित थे । उसके साहबने एक अठन्नी खो दी, जेबमेंसे निकालते समय वह कहीं गिर पड़ी । लोग दूढ़ते रहे नहीं मिली । साहबने कुत्तेका नाम लेकर कहा कि, ऐ डण्डी ! मैं तुझ को बिस्कुट दूंगा, तू मेरी अठन्नी दूढ़ला । कुत्तने कूदकर अठन्नी मेजपर धरदी, शायद वह अठन्नी गिरनेके समय किसीने नहीं देखी उस कुत्तने उठा लिया होगा । एक रातको सब लोग तो सोने चले गये उसके स्वामीने अपना बूट दूढ़ा पर न पाया । उसने कहा कि, ए डण्डी । मेरा बूट नहीं मिलता तू दूढ़ला । तब वह द्वारपर पञ्जामारने लगा साहबने द्वार खोल दिया उस घरमें प्रवेश कर डण्डी अपने मुंहमें बूट पकड़ कर उठा लाया । साहबको याद आया कि, वह अपना बूट तख्तके नीचे भूलकर चला