भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

गाड़ी हांकनेवाला, बुद्धिमती वानरी

रहा । इस प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।
मइजअं प्रेम तथा युक्तिसे उसने अपने स्वामीके प्राणोंकी रक्षा करली ।

रोटी खरीदनेवाला—अन्यान्य कुत्तोंके सदृश निउफाउण्डलैण्डके कुत्ते भी अपने समयको पहचानते हैं । इस विषय पर औबिल साहबका एक उदाहरण है कि, निउफाउण्डलैण्डका एक अच्छा कुत्ता डोर्स नगरकी सरायमें रहा करता था । उसका यह नियम था कि, प्रातःकाल आठ बजते ही कुछ पैसें सहित एक टोकरी ले रोटी बेचनेवालेके पास जाता । रोटी बेचनेवाला पैसा ले लेता था । उसके बदले टोकरीमें रोटी रख देता था । वह रोटी लाकर पाकशालामें रक्षा-पूर्वक रख देता था । बडे आश्चर्यकी बात तो यह है कि, वह रविवारके दिन उस टोकरीके पास न जाता न उसको छूता वह अइतवारको व्रत रखा करता था । एक दिनकी घटना है कि, जब वह कुत्ता रोटीकी टोकरी लिये चला जाता था तो एक दूसरे कुत्तने रोटीकी टोकरी छीन लेनेके लिये उसपर आक्रमण किया, पर उस बुद्धिमान् कुत्तने टोकरी पृथिवी पर धर दी आक्रमण करके उस कुत्तेको भगा दिया । पीछे रोटियोंकी टोकरी लेकर अपने स्वामीके घर सानन्द चला आया ।

बुद्धिमान् डण्डी—एडिनवर्ग नगरमें निउफाण्डलैण्डका कुत्ता रहता था । उसमें ऐसी बुद्धि थी कि, सहस्रों टोपियोंमेंसे स्वामीकी टोपी पहचानकर निकाल लाता था । सहस्रों ताशोंमेंसे स्वामीकी तास भी पहचानकर निकाल लाता सहस्रों छूरियोंके ढेरोंमेंसे स्वामीकी छुरी पहचानकर निकाल लाता । जिस किसी विशेष वस्तु तथा कार्यके लिये कहा जाता वही करता, चाहे वह चीज सहस्रोंके ढेरमें क्यों न हो उसीको पहचानकर निकाल लाता । इससे यह प्रमाणित होता है कि, वह गन्धसे नहीं बरन् बुद्धिकी तीक्ष्णतासे जान लेता था । एक दिन सांझ को अनेक मनुष्य एकत्रित थे । उसके साहबने एक अठन्नी खो दी, जेबमेंसे निकालते समय वह कहीं गिर पड़ी । लोग दूढ़ते रहे नहीं मिली । साहबने कुत्तेका नाम लेकर कहा कि, ऐ डण्डी ! मैं तुझ को बिस्कुट दूंगा, तू मेरी अठन्नी दूढ़ला । कुत्तने कूदकर अठन्नी मेजपर धरदी, शायद वह अठन्नी गिरनेके समय किसीने नहीं देखी उस कुत्तने उठा लिया होगा । एक रातको सब लोग तो सोने चले गये उसके स्वामीने अपना बूट दूढ़ा पर न पाया । उसने कहा कि, ए डण्डी । मेरा बूट नहीं मिलता तू दूढ़ला । तब वह द्वारपर पञ्जामारने लगा साहबने द्वार खोल दिया उस घरमें प्रवेश कर डण्डी अपने मुंहमें बूट पकड़ कर उठा लाया । साहबको याद आया कि, वह अपना बूट तख्तके नीचे भूलकर चला

सेवक बन्दर, चंपेन, हम्बाका बन्दर

आया था। कितने साहब लोग डण्डीको रोज एकपैसा दिया करते थे उस पैसोंको एकत्रित करके डण्डी रोटीवालेकी दूकानपर जाकर रोटी भोल लाया करता था। उन साहबोंमेंसे, एक दिन एकके पास पैसा नहीं था डण्डीने अपना पैसा माँगा। उसने कहा कि, मेरे पास तो पैसा नहीं है मेरे घरमें बहुत पैसा है। जब वह साहब घर गया तो द्वारपर कोलाहल सुना। किवाड खुलतेही डण्डी कूदकर अपने पैसेके लिये घरके भीतर पहुँच गया। उस साहबने कौतुकके लिये डण्डीको खोटा पैसा दे दिया वही लेकर नानाबाईकी दूकान गया। नानाबाईने उसका खोटा पैसा देखकर रोटी नहीं दी। वह पैसा लेकर डण्डी उस साहबके पास आया द्वार खटखटाया नौकरोंने द्वार खोल दिया। डण्डी खोटा पैसा साहबके पांव पर धरकर उसको घृणाकी दृष्टिसे देखता हुआ वहाँसे चला गया। डण्डी जितने पैसे पाता था सब खर्च नहीं करता था। एक रबीवारके दिन जब उसको कहींसे पैसा नहीं मिला था तो भी उसको नानाबाईकी दूकानसे रोटी लाते देखकर उसके स्वामीने नौकरसे कहा कि, मकान दूँढो यह कहींसे पैसा लेकर रोटी लाता है। दूँढने लगे तो वह कुत्ता गुरनिं तथा तड़पने लगा। तलाश हुई तो सात पैसा एक कपडेके नीचे दबे पाये, तबसे डण्डी अपने पैसे बाहर किसी जगह धूलमें दबा रखता था। फिर कभी कोनेमें न रखता था। अपने स्वामीकी आज्ञानुसार वह कुत्ता दूरतक अपने स्वामीके मित्रोंके साथ जाया करता पहुँचाकर अपने मकानको लौट आता।

गडेरियेका कुत्ता—बड़ी सावधानीसे भेड़ें चराया करता था। बहुत बुद्धिमान तथा तीक्ष्ण विचारका था। सारी भेड़ोंको भली भाँति जानता था। जिसको उसका स्वामी कहे उसी भेड़को झुण्डसे जाकर उसके पास ला दिया करता था भेड़ोंकी रक्षा किया करता था। यदि कभी उनमेंसे कोई भटक कर इधर उधर हो जावे तो तुरन्तही उसको खींच खाँचकर झुण्डके भीतर कर देता था। सांझ के समय उन भेड़ोंके झुण्डको लाकर बाड़ेके भीतर बन्द कर देता था। यदि कोई वैरी भेड़ोंको नष्ट करने आवे तो उसके ऊपरसे होकर जावे इस विचारसे उसके द्वारपर आप लेंट जाता था। यदि कोई भेड़ी पीछे रह जाती कोई दूसरा कुत्ता आकर उसको काटता तो वह उसका कान पकड़कर ऐसा झड़ झड़ाता कि वह चिल्लाता हुआ भाग जाता। इसके पीछे वह पुनः आकर अपनी भेड़ोंके साथ हो जाया करता।

एक दिन गडेरियेने अपने कुत्तेकी बुद्धिमानी जाननेके लिये यह युक्ति की कि, जब वह कुत्ता आगके पास बैठे और लोग बात चीत कर रहे थे उसने

रैंग कायप, शव लेनेवाला

कहा कि, मैं समझता हूँ कि, गाय आलूके खेतमें है । केवल यह बात छेडीही गई थी उसपर विशेष चर्चा नहीं हुई थी, उस समय वह कुत्ता अचेत सोता हुआ जान पड़ता था पर उसने यह बात सुनली खिड़की द्वारा बाहर कूदा छत पर चढ़कर आँगनको देखा तो वहाँ गौ नहीं थी देखा कि, सब कुछ ठीक है, फिर अपने घरको पलट आया । कुछ कालके पीछे चरवाहेने फिर वही बात कही फिर वह कुत्ता उसी प्रकार गया उस मैदानको देखकर फिर आ बैठा, तीसरी बार फिर उसने उसी प्रकार कहा तब कुत्ता उठकर पूछ हिलाने लगा । अपने स्वामीकी ओर इस दृष्टिसे देखने लगा कि, तू मुझसे ठट्ठा करता है इस बात पर समस्त मनुष्य जोर जोरसे हँसने लगे । वह कुत्ता फिर अपनी जगह पर आ बैठा उस समय उन लोगोंके हँसी ठट्ठा करनेपर अत्यन्त क्रोधित जान पड़ता था ।

इसी पर हाग साहबका—कथन है कि, एक गड़रियेका कुत्ता बहुत बुद्धिमान था—वह ऐसा अद्वितीय कुत्ता था कि, किसीकी शुश्रूषा तथा प्यारको न मानता था अपने कार्यसे बहुत चौकस रहता था । ऐसा कृतज्ञ था कि, कुत्तोंकी जातिमें वैसा कोई न होगा । वह न किसीपर भूंकता, न कभी कोई भूलही करता जब वह एक वर्ष का था तभीसे भेड़ोंकी रक्षा करना सीख लिया था । जो कुछ उससे एक बार कहा जाता उसको वह कभी नहीं भूलता था । उसमें अत्यन्त बुद्धिमानी तथा विवेक प्रगट होता था । एक दिनका हाल है कि, उसके अधीन सात सौ बकरीके बच्चे तीन भागोंमें विभक्त होकर आधी रातको अपने बेड़ेसे भागकर पहाड़ पर चले गये । स्वामी तथा सहायकके वशसे बाहर हो गये । उस समय वह सरानामका कुत्ता भी दिखाई नहीं दिया । अंधेरी रात थी । उस कुत्तने अपने स्वामीको खेद करते सुना, चुपकसे उन बच्चोंकी खोजके लिये निकला । उसका स्वामी सारीरात उन बच्चोंकी तलाश करता रहा पर कहीं भी बच्चों और कुत्तेका कुछ पता न लगा । प्रातः काल उन्होंने देखा कि, समस्त बच्चे पहाड़की एक नीची जगहमें फिर रहे हैं । वह विश्वस्त कुत्ता उनकी रक्षा कर रहा है बड़े आश्चर्यका विषय तो यह है कि, उस कुत्तने समस्त बकरीके बच्चोंको ऐसी युक्तिके साथ रखा था कि गिनतीमें सब ठीक ठहरे एक भी कम नहीं हुआ, न जाने ऐसी अंधेरी रातमें किस प्रकार उसने उन समस्त बच्चोंको एक स्थानपर एकत्रित कर रखा था यह बात बुद्धिमें नहीं समाती । क्योंकि, उस अंधेरी रातमें समस्तर चरवाहे बच्चोंका सब प्रकारसे रक्षा करते तो भी वे छिटक जाते ।

मारटन साहबने—कुत्तोंके संबंधकी पुस्तकमें लिखा है कि, एक स्त्री

रोटी बनानी, मनुष्यकी सन्तान

अपने बूटको लैस करके उस बूटके ऊपर रेशमी फीता बांध रही थी उसमेंसे एक लैस टूट गई उस समय उसके पास खड़ी हुई कुतियाका नाम लेकर उसने जो मजाकियाने तौरपर कहा कि, मैं चाहता हूँ कि, तू मेरे लिये कोई और दूसरा लैस ले आती, इसके पीछे उस स्त्रीने लैस ठीक किया इस विषयका कुछ ध्यान नहीं किया। दूसरे दिन वह स्त्री पुनः अपने बूटको लैस करनेमें लगी तो कुतियाने दौड़कर नवीन रेशमी लैस उसके सामने धर दिया। इस बात पर लोगोंने अत्यन्त आश्चर्य प्रकट किया कि, कुतियाने उसको कहाँ पाया कदाचित कहींसे चुरा कर लाई होगी।

**स्पायल डाग—**एक मनुष्यके पास था, वो ऐसा जान पड़ता था, वह समस्त बातोंको समझता हो। यदि उसका स्वामी उसके कानमें कहता कि, मेरे लिये अमुक वस्तु ले आ तो वह जाता। यदि वह वस्तु खुली होती तो लाकर अपने स्वामीके चरणोंके पास रख देता, गृहकी स्त्रियां समस्त वस्तुओंको सन्दूकमें बन्द करके ताला लगा देती थीं। क्योंकि वह सारी वस्तुओंको खींच ले जाता था। यही एक दस्ताना खो जावे दूसरा उस कुत्तेको दिखाया जावे तो जबतक वह उसको दूढ़ कर उपस्थित करदे तबतक स्थिर नहीं होता था। एक दिन देखा तो बाजेकी किताबोंके ढेरको हटा उसमेंसे खोये हुए दस्तानेको निकाल लिया। जिसका कि निकालना कठिन था। यदि कोई अपरिचित उसके स्वामीके सकानमें आता तो वह उसपर गुराता। यदि वह मनुष्य न माने और भीतर चला आवे तो कुत्ता एक घण्टा बजा देता जिससे नौकर दौड़कर भीतर आ जाते कुत्तेके घण्टा बजानेके कारणको जान लेते।

**रुपयोंकी सँभाल—**बिल साहबका कथन है कि, एक बार वह सफर कर रहे थे, उनका विश्वासी कुत्ता उनके साथ था। एक दिन प्रातःकाल अपने घरसे कहीं बाहर जाते थे। उस समय उन्होंने रुपयोंकी थैली अपने साथ इस ध्यानसे ली कि सांझ तक घर लौटकर न आसकूंगा। उस समय थैलीमेंसे कुछ रुपये गिर पड़े, जब साहब कहवा खानामें गये वहाँ थैली खोलकर देखी तो कुछ रुपये कम पाये। सांझके समय घर लौटकर आये। नौकरोंने कहा कि, कुतिया कुछ खाती पीती नहीं बीमार है। साहब उस कोठरीमें गये कुतिया दौड़कर उन गिरे रुपयोंको साहबके चरणोंपर धर अत्यन्त हर्षपूर्वक खाने पीने लगी। यहाँ यह स्पष्ट है कि, जिस समय वह साहब कमरेसे बाहर जाने लगे उस समय ही उनसे रुपये गिर पड़े। उनको उठाकर कुतियाने अपने मुहमें रख लिया। यदि खाती तो वे रुपये उसके मुहसे बाहर गिर जाते।

एटलेश, शराब लेनेवाला, चेम्पेनका

स्पर्शानियल रोवर कुत्ता—सेण्टजान साहबके पास था । वह सारी बातें समझता था आज्ञानुसार सारे काम किया करता था, अपने स्वामीका बड़ाही आज़ाकारी था । उस कुत्तेका नाम रोवर था । उसका स्वामी कहे कि, रोवर ! आज तुम घरमें रहो, मैं तुमको अपने साथ बाहर नहीं लेजा सकता, तो रोवर बाहर जानेकी कभी भी इच्छा न करता, यदि वह कहदे कि, मैं आज रोवरको साथ ले जाऊंगा तो रोवर पहिलेसेही तयार होकर चलनेकी प्रतीक्षा करता रहता । एक रातको सलाह होरही थी कि, कल सबेरे आखेटको जावेंगे । कुत्ता भी समस्त बातें सुनता था । समय पर आपसे आप वह वहाँ जा पहुँचा जहाँ कि, सारे मनुष्य इकट्ठे थे, वह भयभीत हो मुंह बनाता हुआ उस स्थानपर पहुँचा कि, ऐसा न हो कि, मेरे ऊपर रुष्ट हो क्योंकि, मैं बिना आज़ा चला आया हूँ । किसी प्रकारका क्रोध न दिखाने पर वह कूद २ कर प्रसन्न होने लगा ।

सामनामका कुत्ता ।

साम—एक साहबके पास था उसका स्वामी कहता था कि, ऐ साम तु अन्यान्य कुत्तोंके साथ खेल कौतुक दिखा तो वह तुरन्त कौतुक दिखानेमें संलग्न होता, भाँति भाँतिके कौतुक दिखाता । एक दिन वह अपने स्वामीके साथ एक स्त्रीके घर गया । उसने जान लिया कि, यही प्रसिद्ध साम है । उसने कहा कि, आजकें दिन सामको मेरे यहाँ रहने दीजिये सामने अपने स्वामीसे क्षमा मांगी, उसके स्वामीने आज़ा दी कि, वह उस स्त्रीके साथ रहे उसका पहरा दे । कुछ काल तक उसके घरमें रहने पर उसका स्वामी उसको लेने आया । स्त्रीने कहा कि, कलके दिन सांझको मेरे घरमें रहने दीजिये । उसके स्वामीने उस कुत्तेको बहुत प्यार किया कहा कि, कल भोजनके समय तक इनके घर रहो, भोजन करके चले आना । उस कुत्तेने बात मानली । दूसरे दिन भोजनके समय तक उपस्थित रहा, भोजन करके स्त्रीकी ओर देखा पूछ हिलाई और उसके घरसे निकल कर अपने घर भाग आया । वह कुत्ता अपने स्वामीको वस्त्र लाता था । उसके पहननेके सारे वस्त्रोंका नाम जानता था । भोजन करनेके समय कुरसी पर बैठता था, किसी प्रकारका शब्द न करता था रोटी माँस अथवा दूध इत्यादि खाता कोई कहे साम ! एक टुकड़ा मुझे भी दे तो वह तुरन्त मान लेता था । जब सब चले जाते, तब वह सारी वस्तुओंको साफ किया करता । अस्तबल जाकर अपने स्वामीके लिये घोड़ा तैयार करा लाया करता । साईसको आज़ा देता घोड़ेकी जीनके पीछे सवार हुआ करता । तात्पर्य यह कि उससे कहीं हुई सारी बातें समझ लेता वो बड़ाही कृतज्ञ तथा नेक कुत्ता था ।

औरंग औरटंग, गीरेला, एनजिना

पूडलडाग—एक प्रकारके कुत्तोंको फीड और व्योंको कहते हैं। उसकी बुद्धि बड़ेही आश्चर्यमें डालनेवाली होती है इस जातिके कूत्तेको जल स्थल एकसे हैं। इस प्रकारके दो कुत्तोंने एक नगरमें शिक्षा पाई थी, पेरिस नगरीमें उनकी परीक्षा ली गई थी। एक कुत्तेका नाम फीड तथा दूसरेका नाम व्योंको था फीड गम्भीर था, व्योंको छिछोरा था। वह सदैव चुलबुलाता रहता था इधर उधर दौड़ता हुआ चलता था। यूनानी लेटिन इटालिक फरांसीसी तथा अंग्रेजी आदिसे कोई शब्द उनको दे दो तो उसे ढूँढ लाता था। यहाँ तक कि, जहाँ पचास २ अक्षर प्रत्येक भाषाके लिखे हुये पड़े हों उन सबमेंसे भी। उनके शब्दको ढूँढ लाया अपने स्वामीके पावोंपर रख दिया। जैसे अङ्ग्रेजी भाषामें एक शब्द हेवन है। हेवनका अर्थ बैकुण्ठ है। सुतरां समस्त अक्षर पृथक् पृथक् करे हुए रखे होते हैं। उस कुत्तेसे कहा गया कि शब्द हेवन ( HEAVEN ) बनाओ। तब वह कुत्ता गया और कटे अक्षर ढूँढ ढूँढकर लाता गया बराबर ला लाकर क्रमानुसार रखता गया और ( HEAVEN ) शब्द बनाकर दिखा दिया इन छः अक्षरोंमें दूसरा और पाँचवां ये दो अक्षर एकही प्रकारके हैं। यह अक्षर ( E ) ई है। यदि दो हो तो हेवन् शब्द ठीक हो जब उस कुत्तेने कटे अक्षरोंमें ढूँढा दूसरा अक्षर न पाया—केवल एकही देखा तब उनसे ऐसी बुद्धिमानकी कि, दूसरे अक्षर ( E ) को उठाकर पाँचवें स्थानमें धर दिया ( HEAVEN ) शब्दको पूरा करके दिखा दिया। इसी प्रकार गणित विद्यामें दोनोंकी परीक्षा ली गई वे दोनों गणितमें भी सुविज्ञ थे। समस्त अददोंको पृथक् पृथक् दिखा देते थे, तनिक विभिन्नता न पड़ती थी। यदि एक कुत्तेसे भूल होती थी तो दूसरा बुलाया जाता था। वह आकर उस त्रुटिको ठीक किया करता था वे दोनों कुत्ते फेड तथा व्योंको ताश खेलनेको बैठ जाते, अपने ताशको कभी नहीं भूलते थे उनमें एक हारता या जीतता था। उनका कौतुक देखनेके लिये अनेक मनुष्य एकत्रित होते वे दोनों कुत्ते खेलके सारे शब्दोंको जानते थे। वे भूलते नहीं थे, एककी त्रुटिको दूसरा शुद्ध करता था यह समस्त घटना उनके और उनके स्वामीके बीच होती थी। कुत्तोंमें ये दोनों बड़े पण्डित थे।

विविन्न पनिहा कुत्ता कुतिया—हेस्टिङ्ग नगर में एक मल्लाहके पास ऐसा पनिहा कुत्ता था कि, वह रोटी बेचनेवालेकी दूकानसे रोटी खरीद लाता। अपने स्वामीकी आज्ञा भली प्रकार पालन किया करता था। इस प्रकारकी एक कुत्ती भी थी, अपने स्वामीकी आज्ञानुसार पुस्तक उठा लाती। जो कार्य उसके योग्य होता उसको किया करती। किसी मनुष्यको बताकर उसको जो

कोरोनकियाँ और पोस्ती गान्धी

चीज दी जावे तो उसे वह उसके पास ले जाया करती थी । वह वस्तु उसको देकर चली आती थी । यहांतक कि, भारी बोझ उठाते उठाते उसके दांत टूट गये थे । आज्ञा मिलती कि, अमुक मनुष्यके पास तुम जाओ तो वह तुरन्त चली जाती थी । यदि वह न मिलता तो सामने आकर चुपचाप खड़ी हो जाती ।

प्राणदेनेवाला—एक विधवा स्त्रीके पास डंडी नामक एक कुत्ता रहता था । एक समय विधवाका दूसरा विवाह होनेवाला था । विवाह होनेके पहले डण्डीने सारा हाल जान लिया । इस बातसे कुत्ता बहुत रुष्ट हुआ ! उस स्त्रीसे प्रेम करना छोड़ दिया । वह विवश होकर कुत्तेको घर छोड़ गई क्योंकि, उसका विवाह लण्डन नगरमें होनेवाला था । जब तक विवाहका आयोजन होता रहा उतने समयतक वह उस स्त्रीके टेबुलके नीचे बड़े ही दुःखसे पड़ा रहा । उसको किसी तरह सन्तोष न होता था । प्रथम जिसको वह प्यार किया करता था उसके साथ भी न जाता, जिस प्रातःकालको उसकी मालिका उसको जहां छोड़ गई थी वह उसी स्थान पर पड़ा रहा तथा अपना शिर भी नहीं उठाता था । एक पञ्जा उठाकर आत्मिक दुःखको व्यक्त कर रहा था । उसकी मालिका चली गई । डण्डी गायब हो गया दूँढनेसे भी न मिला । अन्तमें एक दिन उसकी लाश मिली । लोगोंने पशुओंके हकीमसे पूछा कि, डण्डी किस बिमारीसे मरा । अभी तो उसकी उम्र थोड़ीसीही थी । हकीमने कहा कि, यह कुत्ता बिरहके दुःखसे मर गया है ।

भविष्य दृष्टि—टेरियर एक जातिके कुत्तेका नाम है । एक स्त्रीके पास स्काच टेरियर रहता था । वो स्त्री बलगेरिया नगरमें रहती थी । स्त्रीके मरनेके जब दो दिन रह गये तो उस कुत्तेने पहलेसे ही जान लिया कि, ऐसी घटना होनेवाली है । यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि, वह अपने घरके पीछे गया दो बड़े बड़े गढ़हे खोदे, जब उसकी मालिका मर गई तो उसने भी एक गढ़हेमें घुसकर प्राण त्याग दिये । यह बात एकही कुत्तेके साथ नहीं अनेकों कुत्तोंके साथ हुई ।

वर्तमानका ज्ञाता—हेण्टिंग नगरमें एक बीबीके पास एक कुत्ता रहता था । उसकी स्वामिनी तो ब्रिटेनको गई थी । वह नौकरोंके, साथ घरमें था । एक दिन सांझको वह कुत्ता अपनी मालकिनकी कोठरी में गया उसके कपड़े पर लोटने लगा । लोगोंने समझा कि, कदाचित् वह कुत्ता पागल हो गया है । दूसरे दिन चिट्ठी मिली कि, उसकी स्वामिनी उसी समय मर गई । जब कि, वह कुत्ता गये काल उसके कपड़ों पर लोट रहा था ।

मास्तिक जातिका कुत्ता—एक अङ्गरेजको लिये हये बागमें गया । वह

बराबरी, एम, दपये लेनेवाला, प्रत्युपकारी

कुत्ता बगीचेके भीतर जाने न पाया। चौकीदारोंने रोका साहब उस कुत्तेको जमादारके हवाले करके बाड़ेके भीतर चला गया। कुछ कालके पीछे साहब बाहर आया जमादारसे कहा कि, मेरी छड़ी खो गई, यदि आप मेरे कुत्तेको भीतर जाने दो तो वह तुरन्तही चोर पकड़ लेगा। साहबकी प्रार्थना स्वीकार की गई। साहबने कुत्तेको ईशारा किया कि, मेरी छड़ी जाती रही है। दूंड ला। कुत्ता बाटिकाके भीतर गया और चारों ओर फिरा, अन्तमें उसने एक आदमीको पकड़ लिया। साहबने कहा कि, इस मनुष्यने मेरी छड़ी चुरा ली है। इस पर उस मनुष्यकी तलाशी ली गई, उसकी जेबसे वह छड़ी निकली। उसके अतिरिक्त उसकी जेबसे और भी छः छड़ियां निकलीं। बड़े आश्चर्यकी बात है, कि कुत्ता केवल अपने स्वामीकी छड़ीको पहचानकर मुंहमें ले चला आया। दूसरी छड़ियोंको नहीं छूआ।

मास्टिककी वफादारी—एक धनाढ्यके घरमें जिसे अङ्ग्रेजीमें बैरोनेट कहते हैं। एक मास्टिक कुत्ता था। उसकी वफादारीकी अनेक बातें अङ्ग्रेजी पुस्तकोंमें लिखी हुई हैं। बैरोनेट अमीरने उस कुत्तेकी ओर पहले ध्यान नहीं दिया न उसपर कुछ दया की। एक दिन वह अमीर अपने मकानमें सोनेके लिये चला, उसके साथ इटली देशका रहनेवाला उसका नौकर था पीछे पीछे चला वह कुत्ता भी चुप चाप उनके साथ हो लिया अटारीपर चला गया चाह्ता कि, अमीरके शयनागारमें प्रवेश कर—पहले तो उसको जाने न दिया पर जब वह द्वार पर बहुत चिल्लाने लगा तब बैरोनेटने द्वार खोल दिया उसको भीतर आने दिया। अब वह कुत्ता उसकी कोठरीके भीतर जाकर एक कोनेमें बैठ गया। जब आधी रातका समय हुआ तो उस अमीरकी कोठरीका द्वार खुला, कुत्ता जोरसे गुरनितथा भूंकने लगा। अमीरने उठकर बत्ती जलाकर देखा कि, वही उसका इटलीवासी नौकर था। उससे बैरोनेट पूछा कि, तूने किस अभिप्रायसे आधी रातको मेरी कोठरीका द्वार खोला। अन्तमें उसने स्वीकार कर लिया कि, आपको मारकर सब धन लूट लेजानेकी मेरी इच्छा थी। वास्तवमें यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि, इस बातकी सूचना इस कुत्तेको पहलेसेही क्यों होगई। उसने पहलेसेही जान लिया कि, मेरे स्वामीके साथ वह मनुष्य उस प्रकारका व्यवहार करनेवाला है। निश्चय वह कुत्ता पहलेकी बातोंको जानता था, इस कारण सचेत होकर स्वामीके कमरेमें चौकस होकर पहलेसेही बैठ गया था।

माउण्ट सेंट बर्नर्ड डाग—एक जातिका कुत्ता होता है। यह कुत्ता मास्टिक और निउफाइण्डलेण्डके वर्णसंकर कुत्तोंकी जाति है। ऐल्पके पर्वतों पर जहाँ

शराबी बन्दर

कि, अत्यन्त बरफ पड़ती है वहाँ रहता है । वहाँ धर्मशाला बनी हैं, वहाँ पर बरमंक नामके एक प्रकारके फकीर रहते हैं, जो धर्मशालोंका प्रबन्ध रखवा करते हैं । वे लोग इस प्रकारके कुत्तोंको पालते हैं । इन कुत्तोंको सिखलाते हैं । पथिक जब उन बरफोंमें जा पड़कर मरने लगते हैं तो वे फकीर पथिकोंके बचानेके लिये कुत्तेको छोड़ते हैं । उन कुत्तोंकी सभी जातियोंकी अपेक्षा इन कुत्तोंमें अधिक बुद्धि होती है । ये कुत्ते बहुत शिक्षित होते हैं अत्यन्त बुद्धिमानोंके साथ काम किया करते हैं । धर्मशालाओंके लोग इस कुत्तेके गलेमें, गरम शराबकी बोटल बांध दिया करते हैं । स्वीट जर लेण्डके बरफीले पर्वतोंमें यह कुत्ता गिरे पड़े मुसाफिरोंको बरफोंमें ढूँढ़ा करता है । परमेश्वरने इन कुत्तोंको ऐसी बुद्धि प्रदान की, यदि मसाफिर पन्द्रह या बीस फीट बरफके नीचे दबाहो तो उसी समय बरफको खरोंच खरोंचकर टालना आरम्भ करता है । बहुत ऊँची आवाजसे भूंकता है । जिससे एक मीलसे भी अधिक उसकी आवाज चली जाती है । कुत्तेकी आवाज सुनकर धर्मशालाओंके महन्त आपहुँचते हैं । उसकी सहायता करते हैं । उपरोक्त कुत्तेकी कहानी एक अङ्ग्रेजी पुस्तक लाइबरेरी, आफ, इण्टर-टेनिङ्ग, एलफारफीसमें लिखी है कि, इस कुत्तेने बाईस मनुष्योंकी जान बचाई थी । इस कारण कुत्तेके गलेमें उसकी सुकीर्तिका तगमा पहनाया था ।

एक बार यह कुत्ता एक पथिककी जान बचाने और उसकी धर्मशालामें लानेका उद्योग कर रहा था । वह सन् १८१६ ई० में मर गया और उसके स्मारक चिह्नके लिये उसकी एक सुविशाल सभाधि बनाई गई । वे पहाड़ी लोग अबतक भी उस कुत्तेकी भलाईको नहीं भुला सके हैं ।

इस कुत्तेको धर्मशालाओंके बरमंक लोग पर्वतोंमें भेजते हैं वह वफोंमें जाकर मुसाफिरोंको ढूँढ़ता फिरता है । जहां कहीं बरफका मारा अचेत पथिक दिखाई देता है तो उसके ऊपर बैठ जाता है अपने बालोंसे उसको भली प्रकार गरमाता है । उस कुत्तेके शरीर पर बहुत बाल होते हैं । उन बालोंकी गरमीसे पथिक कुछ चैतन्यता लाभ करता है वह उसको गलेकी बोटल विखाता है । वह मुसाफिर बोटलको उसके गलेसे खोलकर पीता है जिससे सचेत हो जाता है । कुत्ता पथिकको अपनी पीठपर लादकर धर्मशालेमें ले आता है । धर्मशालाओंके साधुगण उसकी भली प्रकार सेवा करते हैं वह आरोग्यता लाभ कर अपने घरको चला जाता है ।

निउफौण्ड लेण्ड डाग—नामके कुत्तेको एक साहब अपने मित्र सहित अपने साथ लिये चले जाते थे । कुत्तेके स्वामीने कुत्तेकी बहुत प्रशंसा करके कहा

पूर्व जन्म बेत्ता मृगेंद्र

कि, कितनीही दूरसे इस कुत्तेको कोई वस्तु लेनेको भेजा जाय तो वहाँसे वह वस्तु लाकर उपस्थित कर देता है। इस बातकी सत्यता प्रगट करनेको उस साहबने एक चौकोर पत्थरके बीचमें अठन्नी धरकर उस कुत्तेको दिखाकर अपनी राहली। वह पत्थर सड़कके किनारे पर पड़ा था। वह साहब घोड़ेपर सवार होकर तीन मीलके अन्तर पर गया। उसने उस कुत्तेको इशारा किया कि, अठन्नी ले आ। कुत्ता उसी समय अठन्नी लेने चट्टानके पास गया। साहब अपने घरको चला गया। साहबने घर पहुँचतेही कुत्तेकी प्रतीक्षामें सारा दिन बिता दिया पर कुत्ता न आया।

पीछे यह बात जान पड़ी कि, कुत्ता स्वामीकी आज्ञा पाते ही उसी समय उस स्थान पर आ पहुँचा। जहाँ कि, वह अठन्नी दबाई गई थी। उस चट्टानका हटाना अपने सामर्थ्यके बाहरका कार्य समझकर वहाँ खड़ा होकर भूंकने लगा। इसी अवसरमें उस पथसे दो सवार निकले उस कुत्तेको कष्टमें जानकर उनमें से एकने अपने घोड़ेसे उतरकर उस चट्टानको हटा दिया। वह अठन्नी देख उसको हटाकर अपनी जेबमें रख लिया कुत्तेके तात्पर्यको न समझ अपने घरकी राह ली। कुत्ता उनके घोड़ेके साथ बराबर बीस मील तक चला गया। सांझको दोनों सरायमें ठहरे रातके समय दोनों आनन्दपूर्वक एक कोठरीमें सो रहे वहाँकी भटियारी उनकी सेवा करती रही। वह कुत्ता भी उनकी चारपाईके नीचे छिपकर बैठा रहा। जिसने वह अठन्नी ली थी उसने उसको लेकर अपनी पतलूनकी जेबमें रख दिया था रातके समय पायजामा उतारकर खूंटोके ऊपर रख दिया। जब वे दोनों सो गये तो उस कुत्तेने पतलूनको अपने मुँहसे पकड़ लिया खिड़की द्वारा बाहर कूदकर निकल भागा। उसी खिड़कीसे वह निकल गया जो गर्मीके मौसममें वायुके आवागमनके निमित्त खुली रहा करती थी। इस कारण ही उस कुत्तेका दाव घात लगा रातके चार बजे अपने घर पहुँचा। साहबने पतलूनकी जेब खोल कर देखा तो चिह्नवाली अपनी अठन्नीको उसी प्रकार पाया उस जेबमें से घड़ी तथा एक रुपया भी निकला। साहबने ढँढोरा पिटवाया कि, एक पतलूनमें एक घड़ी तथा रुपये इस प्रकार आये हैं। इससे उस घड़ी तथा पतलूनवाले मनुष्यको पता चल गया कुत्तेकी समस्त कीर्ति खुल गई। इस जातिका कुत्ता बड़ा हिम्मतो तथा दयालु होता है। अपनेसे निर्बल कुत्तोंपर कभी भी बल प्रयोग नहीं करता।

हिरण।

हिरण बहुत ही सचेत तथा चैतन्य पशु है। उसको हितक पशु तथा मनुष्य

कुमरसिंहजीका सिंह कांटा निकलवाने-वाला

आखेट करके मार लेते हैं। यह बहुत चैतन्य रहने पर भी मारा जाता है। रात दिन सचेत रहता है। जब आखेट करनेवाले आते हैं तो हिरनी बच्चोंके समीप रहती है। बच्चोंके प्रेमके मारे भाग नहीं सकती। इसीमें प्रायः शिकार हो जाया करती है। अनेक जातिके हरिण होते हैं।

कस्तूरी मृग—भी इन्हीं हरिणोंमें होता है। उसके प्राणके इच्छुक अनेक मनुष्य होते हैं यह प्रायः चीन देशमें होता है चीनी तवारीखमें लिखा है कि, यह बड़ा सावधान तथा चैतन्य होता है पर्वतोंकी चोटियों पर रहता है, जहाँ कि, मनुष्य तथा पशु कठिनाता पूर्वक पहुँच सकते हों। मनुष्य भेड़िया तथा शेरोंसे बहुत सचेत रहता है यहाँ तक कि, वह अपने मूत्रको भी पी जाता है अपनी मँगनीको धूल मिट्टीमें ऐसा दबा देता है कि, कहीं चिन्ह भी न मिले कोई यह देखकर जानले कि, यहाँ मृग रहता है उसकी नाभीमें मुश्क भरा रहता है। जब कभी भेड़िया अथवा शेर उसका आखेट करनेको उसके समीप पहुँच जाता है कहीं भागनेकी युक्ति नहीं देखता तो ऐसा कार्य करता है कि, अपनी नाभीकी मुश्कको उस शेरकी ओर ऐसे वेगसे चलाता है कि, उस सुगंधसे शेर अथवा भेड़ियेका माथा फट जाता है जिससे वह मर जाता है। उस कस्तूरीकी सुगंध उसके मस्तकको फाड़ डालती है जिससे लहू आने लगता है, वह उसी समय मर जाता है। मनुष्य इस प्रकार उसका आखेट करते है कि, दो मनुष्य पर्वतपर चढ़ जाते हैं एक तो बन्दूक भरकर छिपके बैठ जाता और दूसरा स्वर तालके साथ गाने लगता है। वह जब राग गाने लगता है तो उसके सुननेके लिये मृग शिकारीके समीप आजाता है, राग सुननेमें आत्म विस्मृत कर जाता है। उसी समय बन्दूकधारी छिपा हुआ मनुष्य फँर करता है। गोली लगतेही वह गिरकर तड़पने लगता है। आखेट करनेवाला दौड़कर उसकी कस्तूरीकी थैली काट लेता है। यदि उस थैलीको शीघ्रही न काटे वह मुश्क जो बिलकुल रक्त है समस्त शरीरमें फैल जावे हरिणका मांस कड़वा हो जाये खानेके योग्य न रहे। तथा कस्तूरी भी हाथ न लगे। दूसरी युक्ति यह है कि, जब वह मृग पर्वतके नीचे जल पीने उतरता है तो छिपकर बन्दूकसे मार लेते हैं।

पंचकमें घासका त्याग—भारतवर्षमें लोग इस प्रकार कहते हैं कि, यह मृग प्रायः चींटे और चीटियोंके बिलपर बैठता है। चाहता है कि, चीटियां मुझको काटा करें जिसमें मुझे नींद न आवे मेरी अचेतावस्थामें आखेटकर्ता मुझको मार न ले। यह भी सुना है कि, भद्रा (पंचक) के पांच दिन होते हैं। उन दिनों भारतवासी घास फूसका कुछ काम नहीं करत। पण्डित लोग तो इन दिनोंको

इस्मारमन साहिबका मत होप साहबका कथन कच्चे मांस खिलानेका दोष-शेरका प्रेम

पत्रा देखकर जाना करते हैं पर यह मृग आपसे आप जाना करता है। जब पंचक लगते हैं उसी दिनसे मृग घास नहीं चरता वह मृग पंचकके दोष तथा गुणोंको भली प्रकार जानता है पांच घड़ी घास फूसका बिलकुल काम नहीं करता।
बकरी।

कितनेही मनुष्य बकरियोंको सिखलाते हैं, जिससे वे बड़ेही विचित्र कौतुक दिखाती हैं। इसकी बुद्धि अच्छी होती है। विषैली घासों तथा पौदोंको भली प्रकार पहचानती है, उनको कदापि नहीं खातीं। सुना जाता है कि, बकरियोंमें भविष्यका हाल जाननेकी शक्ति भी होती हैं। क्योंकि, जहाँ कहीं अनेक दिवसोंसे बन्द पड़ा भी कुआँ हो छिप गया हो, यदि उस स्थानको लोग जानने कुर्वेका पता लगाना चाहें तो बकरियोंके झुण्डको उस स्थानपर लेजाके बैठ देते हैं जब सब बकरियां जाती हैं तो छिपे कुर्वेके चारों ओर घेरा बाँधकर बैठ जाती हैं। जहाँ पर वह कुर्वा होता है उस भूमिपर एक भी नहीं बैठती छिपे हुये कूएँ के चौगिर्द बैठती हैं।

कथा सुननेवाली—फीरोजपुर जिलेके लखौके मौजेमें वेदी साहब कथा कहते थे। उसको सुनने अनेक मनुष्य एकत्रित होते थे। एक बकरी भी कथा सुननेको आया करती थी। कथा आरम्भ होनेके पूर्व बकरी आया करती थी। जबतक वह कथा होती तबतक खड़ी होके सुना करती थी। कथा होजानेपर सब लोग चले जाते सबसे पीछे वह बकरी जाया करती थी।

सदनाको उपदेश—सदना नामक एक कसाई था। एक दिन उसके घर एक अतिथि आया। उसने बिचारा कि, यदि बकरा मारूं तो ठीक नहीं उसका अण्डकोष काटलूं तो अतिथिके लिये यथेष्ट होगा। जब वो काटनेको तैयार हुआ तो बकरा बोला कि, ए सदना ! यह बात अच्छी नहीं। कितनी बार तुमने मेरा शिर काटा है मैंने तुम्हारा काटा है। तुम मेरा शिर काट लो अण्डकोष मत काटो। यह बात सुनकर सदना को ज्ञान आगया कसाईका काम छोड़कर परम भक्त हो गया।

भेड़।

भेड़ बकरीकीही एक जाति है। उसकी बुद्धिकी अनेक कहानियां कही जाती हैं। कप्तान ब्राउन साहबका कथन है कि, भेड़ोंको स्वदेशसे बहुत प्रेम होता है।

स्वदेश प्रेम—एक मनुष्यने अपनी भेड़को दूसरेके हाथ बेच दिया। खरीददार भेड़को अपने घर ले गया। वहाँ भेड़को स्वदेश याद आया वह जहाँ

रीछ और शेरकीमैत्री, तेंदुआ

गई जहां रहती थी वहांसे उसका देश नौ दिनकी यात्राका मार्ग था । भेड़ वहांसे चली उसका बच्चा उसके साथ था । बच्चा थक कर पीछे रह जाता तो प्रेमके साथ फिर उसको साथ लेकर फिर आगे चलती जिस समय वह अष्टरालिंग नगरमें पहुँची थी वहाँ वार्षिक मेलेका दिन था । भेड़ मेलेमें नहीं घुसी नगरके किनारे बैठी रही, बड़े तड़के उसने अपनी राहली । केवल एक कुत्तोंने उसको एक स्थान पर चारों ओरसे घेरा पर उसने उनका सामना करके फिर अपनी राहली । एक मनुष्यने उसको भटकी हुई समझकर पकड़ रक्खा पर किसी प्रकार उसके हाथसे भी निकल कर वह फिर आगे चली जहां उसके जानेकी इच्छा थी वहाँ जा पहुँची ।

एक साहब सड़क पर भ्रमण करता हुआ चला जाता था । उसके पास एक भेड़ मिमियाती चिल्लाती हुई आई उसका मुहँ ताकने लगी उसने जान लिया कि, यह भेड़ मेरी सहायता चाहती है । वह साहब घोड़े से उतरकर उसके साथ हो लिया । भेड़ आगे आगे चली उसको एक स्थानमें ले गयी । वहां जाकर देखा कि, भेड़का बच्चा दो पत्थरोंके बीचमें फँसा है । उसका पांव ऊपरको है और वह तड़प रहा है साहबने उस बच्चेको निकाल कर उसकी माताको सौंप दिया । उसकी माता अपनी भाषामें धन्यवाद देनेके साथ साहबको कृतज्ञता भरी दृष्टिसे देखती हुई अपना बच्चा लिये चली गई । यह बात ब्राउन साहबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखी हुई है ।

लोमडी

लोमडी बहुत ही चैतन्य होती है । किताबोंमें इसकी अनेक बातें लिखी हैं । लोमडियोंको भविष्यका बहुत ध्यान रहा करता है क्योंकि, वे जो कुछ खाती हैं उससे बचे भोजनको स्थान स्थान पर गाड़ देती हैं । उस पर चिन्ह भी कर देती हैं, जिसमें वह स्थान भूल न जाय अपनी गड़ी हुई जमाको भली भाँति पहचान ले । जब उनका मन चाहता है निकाल कर खा लेती हैं—बड़ी बुद्धि-मानीसे सचेत होकर आखेट करती हैं ।

बिल्ली और डायन

बहुत दिवसोंसे लोगोंका ऐसा ध्यान है कि, बिल्लियां जादूगार स्त्रियोंके साथ रहा करती हैं । वे ऐसा भी समझते हैं कि, स्वयम् डाइन बिल्लियोंके रूपमें होती हैं । डायन दुराचारिणी, भ्रष्ट तथा भाँति भाँतिके छलकपटोंसे भरी हुई रहती हैं । वे किसी छिपे हुये कार्यमें अथवा यात्राके लिये जाती हैं तो बिल्लीके स्वरूपमें होकर भ्रमण करती हैं ।

शेरका बच्चा हाथी, सीलोनका हाथी

लांडकी डाइनबिल्ली—एक बार लांड कोचरेन साहब उत्तरसागरके यात्रा कर रहे थे। उनके साथ एक काली बिल्ली भी थी। वह ऋतु बहुतही खराब था सदैव तुफान आया करता था वायु ठीक नहीं बहती थी। जहाजवाले इस प्रकार कहने लगे कि, सारी आपत्तियां उसी काली बिल्लीके कारण है जो कि, लांड साहबके साथ है। यह बात लांड साहबसे कही गई कि, आपके साथ जो काली बिल्ली है यह डायन है। साहबने कहा कि, यह तो भ्रम है पर जो तुम्हारी ऐसीही इच्छा है तो इसको पानीमें डाल दो। यह बात सुनकर सब मनुष्य भयभीत हो निवेदन करने लगे कि, साहब। ! ऐसा कार्य न कीजियेगा। जब आप इसको समुद्रमें फिकवाओगे तो वह और उपद्रव करेगी जिससे हम लोगोंके प्राणोंपर आपत्ति आवेगी। इससे यही उचित है कि, आप इस बिल्लीको दुःख न दीजिये, सुखसे रहने दीजिये। उन्होंने कहा कि, यदि आप इस बिल्लीको न छोड़ेंगे तो हमको आशा है कि, हम लोग कुशलपूर्वक अपने देश इङ्ग्लिस्थानको पहुँच सकेंगे। काली बिल्लीको लोग प्रायः डायन समझते हैं।

रक्तदानसे आपत्ति—उपरोक्त पुस्तकका लेखक यह भी लिखता है कि, एक बार एक गँवारिन हाथमें एक प्याला लिये मुझसे कहने लगी कि, मुझको आप अपने काली बिल्लीके बच्चेकी पूछमेंसे रक्तकी कुछ बूंदें दीजिये जिसमें मेरे घरके चूल्हेमें बरकत आ जाय बला दूर हो। दूसरी स्त्रीने आकर मुझसे कहा कि, सावधान ! भूलना नहीं काली बिल्ली कदापि अपने पाससे पृथक् करना न रक्त देना। यदि उसको बाहर करोगे तो उसीके साथ सौभाग्य और बरकत भी बिदा हो जायगी।

डायनकी सवारीकी शंका—कप्तान ब्राउन साहब कहते हैं कि, स्काटलैण्डके लोगोंका यह नियम था कि, वहाँके दालानोंमें लोग अपनी बिल्लियां बांध बांध कर रखते थे। वे अनुमान करते थे कि, आज की रात डायन बिल्लियोंपर सवार होगी इसी कारण उनसे अपनी २ बिल्लीको बचानेके लिये युक्तियां करते थे। जो लोग यह सावधानी करना भूल जाते थे, वे आपत्तिमें पड़ते देखते कि, उनकी बिल्लियां घरसे निकल कर बनमें भागी जाती हैं। प्रत्येकके ऊपर डायने सवार हैं नारवेंकी बड़ी सड़क पर चली जाती हैं। काली बिल्लीका अङ्गरेजीमें बहुत कुछ विवरण है, इंग्लैण्ड, स्काटलैण्ड और आयरलैण्डके मनुष्य इसके विषयमें अनुमान करते हैं कि, इसके कारण कितनीही आपत्तियां आती हैं कितनीही दूर हो जाती हैं। यह भी अनुमान करते हैं कि, बिल्लियां, मनुष्योंकी तरह बातें किया करती हैं। लेखक लिखता है कि, मैंने लण्डन अपने घरके पिछवाड़े अनेक बिल्लि-

हाथीकी उग्र कृतज्ञता, पुत्रसे प्रेम, बनेलेकी बुद्धिमत्ता मक्कारीका बदला, शिकारीको दण्ड

योंको एकत्रित देखकर निश्चय कर लिया कि, ये सब किसी गूढ़ परामर्शके लिये यहां इकट्ठी हुई हैं। आपसमें वार्तालाप करके कुछ निश्चय कर रही हैं।

बिल्लियोंका प्रेम—मेरे भाईके पास एक बिल्ली थी। वह उनसे बहुत प्रेम रखती थी। एकबार यात्रा करने गये उसको घर पर अपने मित्रोंके पास छोड़ गये। दो वर्षके पीछे जिस दिन उनके आनेकी आशा थी, लोग उसी दिन उस बिल्लीको बहुत बेचैन देखके चकित हुये। सब लोगोंने पहले वह गाड़ीकी खड़खड़ाहट सुनकर चाहती थी कि, पहलेही से जाकर अपने स्वामीसे मिले, उस दिन उसको बहुत हर्ष था। दूसरे दिन जाकर अपने स्वामीके मोंढेपर बैठे जैसे कि, वह पहले जाके बैठा करती थी जिस दिन बिल्लियोंका स्वामी मरा, उस दिन उसकी सारी बिल्लियोंने उसकी कब्र पर जाके अपने प्राण त्याग दिये।

चीलके रूपमें डायन—ये डायने बिल्लियांही नहीं बरन अन्यान्य जीवधारियोंके स्वरूपमें भी होती हैं, सुतरां फीरोजपुरके जिला दूध मौजेमें मैं था। वहांके लोग कहने लगे कि, काकूसिंह नामक साहूकार गांवके बाहर कहीं जाता था। एक दिन गांवसे बाहर उजाड़में उसको कड़ी प्यास लगी। वहां कहीं भी पानी नहीं मिला इस कारण तूषासे गिरकर अचेत हो गया। डायनके नामसे विख्यात एक तरखानी स्त्री, काकूसिंह के घर पर जाकर समाचार दिया कि, अमुक उजाड़ में काकूसिंह प्यासका मारा अचेत होकर पड़ा हुआ है। उसके घरके लोयसवारी तथा पानी लेकर शीघ्रही उसके पास पहुँच गये, उसके मुँहपर पानी छिड़का और पिलाया वह शीघ्रही चैतन्य हुआ। उसको सवार कराके घर लाये। वहां आने पर काकूसिंहने लोगोंने पूछा कि, जहां मैं अचेत होकर गिरा था वहां तो कोई मनुष्य नहीं था तुम लोगोंने मेरी बेहोशीका समाचार किस प्रकार मिला? लोगोंने कहा कि, अमुक तरखानीने कहा है। काकूसिंहने कहा कि, वहां कोई मनुष्य नहीं था केवल एक चील एक जुण्डके बूक्षपर बैठी थी। अतः जान पड़ा कि, डाइन चीलका रूप धरे है।

उल्लूके रूपमें डाइन—कलावंतोंने उल्लुओंकी आवाज को अपने रागके साथ संयुक्त किया है, पुस्तकोंमें उल्लुओंकी बोलीको बरबादीका चिन्ह लिखा है। तथा अपवित्र पक्षी कहा है। डायन स्त्रियां उल्लुओंके स्वरूपमें भी फिरा करती हैं। अलेमान देशकी स्त्रियां भांति भांतिकी जादूटोने करती हैं। स्त्रियोंकी जादूगर उल्लू समझा करते हैं। उल्लू जादूगर स्त्रियां समझी जाती हैं। ऐसेही बङ्गाल देशकी स्त्रियां और उत्तरीय पर्वतोंकी स्त्रियां जादूके काममें अत्यन्त चतुर होती हैं।

आसक्ति

बिल्लीके रूपमें घात—बिल्लियां छोटे छोटे लड़की लड़कोंको मार लेती हैं। कभी कभी युवक स्त्री अथवा पुरुषको भी मार लेती हैं पर किसीको यह सुधि नहीं रहती कि, यह डायन है अथवा बिल्ली है कौन ?

स्त्रीकी हत्या — इसी किताबमें लिखा है कि, एक स्त्री सहसा चिल्ला कर पृथिवीपर गिरकर तड़पने लगी। लोग बाहरसे दौड़े आये देखा कि गला काटा हुआ है, रक्त बह रहा है। लोगोंने इधर उधर देखा तो कोई कारण न दिखाई दिया। न जान पड़ा कि, किस प्रकार उसका गला कटा। पर छतके ऊपर एक भयानक बिल्ली बैठी थी उस स्त्रीकी ओर क्रोधित होकर देख रही थी। इससे जान पड़ा कि, उसी बिल्लीने उसका गला काटा था। भारतवर्षमें डायन स्त्रियाँ लड़के तथा लड़कियोंके कलेजे बड़ी विधिसे खाया करती हैं।

चीलके रूपमें बूढ़ी डाईन — सेण्ट जान साहब डायनकी एक विचित्र कहानी लिखते हैं। वह इस प्रकार है कि, एक बूढ़ी स्त्री एक बनमें रहा करती थी। जहाँ वह रहती थी वहाँ एक झील थी डायन मनुष्य तथा पशु दोनों को बड़ी हानि पहुँचाया करती थी। उस परगनाके लोगोंने उस डायनको बहुत रोकना हटाना चाहा अनेक बार आत्मिक युक्तियोंद्वारा उसे परास्त करना चाहा उसपर आक्रमण, किया। अन्तमें वह कहीं छिप गई किसीको कुछ न जान पड़ा कि, कहाँ चली गई कहीं आस पासमें है वा नहीं दूरपर है। उसीके कारण मनुष्य तथा पशुओंमें सैकड़ों ही रोग होते थे। अन्तमें एक मनुष्यने देख लिया कि, वह झीलके किनारे पत्थरों के समीप उड़ उड़ कर फिरती है। लोग भली प्रकार ताड़ने लगे वह प्रायः जाती आती और फड़फड़ाती जान पड़ती थी। अनेक बार लोगोंने उसको गोली मारी पर नहीं लगी।

बमूलेके रूपमें मारा—आखिर एक वीर पुरुषने यह स्थिर किया कि, मैं इसको मार कर देशको आपत्तिसे बचाऊंगा। लोगोंसे कहा कि, मैं निश्चय विजय प्राप्त करूँगा। इसी कारण वह बन्दूक भर कर जहाँ वह रहती थी उसी पर्वत पर छिप कर बैठ गया। प्रतीक्षा करने लगा कि, डायन आवे तो मैं उसे गोली मार दूँ। सारी रात बीत गई मदिराके नशेसे वह वहाँ बड़ी चौकसीसे बैठ रहा था। अन्तमें बड़े घोर वायुमें एक विचित्र शब्द सुना देखा कि, डायन बगुलाका स्वरूप धारण किये उसी सिपाहीकी ओर चली आती है। सिपाही विचारने लगा कि, यदि मैं अपने घरमें होता तो अच्छा था क्योंकि, उसके हाथ सर्दीसे इतने अकड़ गये थे कि, वह कठिनतासे बन्दूकका घोड़ा दबा सकता था। अन्तमें वह डायन उसके शिरपर पहुँची उसने बन्दूक चलाई। प्रातःकाल लोग आये तो देखा

बच्चेका मां पर प्रेम, शिक्षण दरजीको दण्ड

कि, वह अचेत पड़ा है उसकी बन्दूक फट गई है गर्दनकी हड्डी टूट गई है । एक बहुत बड़ा बगुला मरा पड़ा है उसकी देहमें गोली इस पारसे उस पार निकल गई है । उसके समीप ही मृत बगुले को पड़ा देख कर लोगोंको निश्चय होगया कि, यह बगुला जादूगरनी स्त्री ही है ।

निष्कर्ष — इसी प्रकार सहस्रों सिद्ध साधु ऋषि मुनि तथा राक्षस जादूगर इत्यादि पशु पक्षी और हिंसक पशुओंके स्वरूपमें फिरते रहते हैं । इसमें उनको कोई नहीं पहचान सकता । जो जाने सो ही पहचाने, दूसरेका कुछ वश नहीं चल सकता । यह बात विद्या तथा मन्त्रोंके द्वारा प्राप्त हो सकती है यह केवल एक सिद्धि है दूसरा कुछ नहीं है । सिद्ध पशुके स्वरूपमें होकर अपना काम बनाकर पृथक हो जाते हैं । जैसे शेर बन गये अपने वंशीको मार लिया । लोगोंने जाना शेरने मारा है आप अलगके अलग बने रहे ।

अन्तर्धान होना — एक साधुने मुझसे कहा था कि, एक कोढ़ी मनुष्यकी चारपाईके सिरानेके दाहने पायेको पकड़कर एक बिल्ली खड़ी थी । उसने उसको बहुत हटाया पर नहीं हटी । वह पत्थर लेकर मारने दौड़ा । वहाँसे थोड़ी दूर पर एक बांसोंकी कोठी थी वह बिल्ली उधरको ही भाग गई । कोढ़ी उसके पीछे दौड़ा । बिल्ली बांसोंकी कोठीसे तीन चार हाथके अन्तर पर ही अन्तर्धान हो गई । चाँदनी रात थी गर्मियोंका दिन था । उसको बहुत दूँढ़ा पर पता न चला । यह डुमराव इलाकेके नाट नामक गांवकी बात है ।

विज्जू ।

एक प्रकारका जीव होता है । यह भारत वर्षमें कवरिस्तानोंके पास अधिकता से पाया जाता है यह गड़े मुर्देको निकाल कर खाया करता है इसका कद बिल्लीके कदसे कुछ ही बड़ा होता है यह पेड़पर चढ़कर चील्होंके बच्चोंको भी खाजाता है ।

विज्जूओंका परस्पर प्रेम — फ्रांस देशमें दो मनुष्य यात्रा कर रहे थे उनके साथ एक कुत्ता भी था, उस कुत्तेने विज्जूको उठा दिया उन मनुष्योंमेंसे एकने उसे बन्दूकसे मार दिया । वे उसको घसीटकर गांवले चले । थोड़ी दूर चले थे कि, पीछेसे एक दुखी विज्जूका करुण शब्द सुनाई दिया । वो निडर होकर मृत विज्जू के ऊपर चढ़ गया लोग उसे हटानेकी चेष्टा करने लगे पर प्रेमके दीवाने विज्जूने अपने जीवनका मोह छोड़ रखा था उसे सिवा अपने प्यारे बीजूके दूसरा कुछ भी नहीं दीखता था जब अनेक प्रकारकी कोशिशें करनेपर भी उसने मृत विज्जूको न छोड़ा तो पाषाण हृदय शिकारियोंने अपनी भयंकर बीभत्सना परिचय देकर उसे भी मार डाला । सहृदय संसारने मानवी वंबरताका दृश्य देख दुखीके प्रेमपर दो आंसू बहा दिये । बीजू प्रेमपर विशुद्ध बलि करके सबाके लिये अमर हो गया ।

लिपी, गेंडा, बेफीगाकी सहायता, ऊंट ऊंटकी प्रतिहिंसा

उपसम ।

उपसम एक छोटा पांच इञ्चका लम्बा जानवर होता है । यह अमेरिका देशमें उत्पन्न होता है, उसके ऊपर बड़े बड़े बाल होते हैं वे बहुत सुन्दर तथा मुलायम होते हैं । उसको शिकारी पकड़ते हैं वह उनके वशमें आजाता है वह ऐसा कपट करके पड़ जाता है कि, मानों मर गया । शिकारी उसको छोड़ देते हैं । छुटकारा पातेही वह उठकर तुरंत भाग जाता है ।

चूहा ।

उपरोक्त पुस्तकमें एक मनुष्यका हाल लिखा है कि, मैं लंका टापूकी सैर कर रहा था । एक दिन मैंने अपने कुत्तेको चूहे पर छोड़ा । कुत्तेने चूहेको पकड़ लिया । उस समय चूहेको देखा तो मरा हुआ दिखाई दिया । उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग ढीले तथा अशक्य जान पड़ते थे उसमें प्राणका तनिक भी चिह्न नहीं था । उसको छोड़ दिया । वह चूहा समय पाकर इतनी जोरसे भागा कि, उसकी गतिको कोई पहुँच न सकता था ।

श्वेत चूहा — जेसी साहब श्वेत चूहोंके विषय पर लिखते हैं कि, पादरी फ्रीमन साहब साँझको घूमनेके लिये बाहर चले जाते थे । उसने ऐसा कौतुक देखा कि, अनेक चूहे एक स्थानसे दूसरे स्थानको चले जाते हैं । वे खड़े होकर कौतुक देखने लगे । चूहोंकी भीड़ उनके समीप होकर चली गई अन्तमें उन्होंने देखा कि, पीछेसे एक बूढ़ा और अन्धा चूहा चला आता है । वह अन्धा अपने मुँहमें लकड़ी पकड़े हैं । लकड़ीका दूसरा सिरको आंखवाला चूहा अपने मुँहसे पकड़े लिये जाता है । अन्धा चूहा सब चूहोंके साथ बराबर चला जाता है वह लकड़ी पकड़ने वाला चूहा अन्धेका पथदर्शक तथा मजबूत रक्षक था ।

एक अङ्गरेजी पुस्तकमें लिखा है कि, नोबिन नामक एक लड़का था । उसको किसी मित्रने बहुमूल्य तेलकी कुछ शीशियां दीं । उसने वे लेकर अपनी कोठरीके एक कोनेमें रख दीं । दूसरे दिवस जाकर देखा तो दो शीशियां खाली थीं । उस समय उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि, यहां तो किसी दूसरेकी पहुँच नहीं थी, मेरी शीशियां कौन खाली कर गया ? वह चुपचाप एक कोनेमें बैठ गया । एक घण्टेके बाद देखता है कि, तीन चूहे एक बिलमेंसे निकल शीशियोंकी ओर गये । उनमेंसे एकने अपने पिछले दोनों पैरोंको भूमिसे लगा अगले दोनों पैरोंसे शीशीको दृढ़ता पूर्वक पकड़ लिया, दूसरा चूहा उसके शिरपर चढ़ गया । अपने दांतोंसे शीशीका ढक्कन खोल दिया । उसने अपनी पूँछको शीशीके भीतर डुबोया

ऊंटनीका मोह, चूर २ कर दिया

पृथिवी पर तीसरे चूहेको चुसाया । इस प्रकार बारम्बार अपनी पूँछ डुबाकर उसको चुसाता गया । जब उस चूहेका पेट भर गया, उसने शीशीको पकड़ लिया । शीशी पकड़नेवाला पृथिवीपर बैठ गया ऊपरवाला उसको तेल पिलाता गया । फिर नीचेवालेका पेट भरतेही ऊपरवाला नीचे आया । नीचेवाला ऊपर गया । इसी प्रकार उस ऊपरवालेने नीचेवालेका पेट भर दिया । इसी प्रकार तीनों पेट भरकर दोनों शीशियोंको खाली करके अपने बिलमें चले गये ।

सन् १८२९ ई० में बहुत बड़ी बाढ़ आयी. लोग बाढ़को टड़न नदीके किनारे पर खड़े देख रहे थे । देखा कि, एक हंस पानीपर पैरता चला आता है उसकी पीठपर एक काला दागभी दिखाई दे रहा है । वह हंस समीप आया । लोगों को उसकी पीठपर एक चूहा दिखाई दिया । जब वह हंस पृथिवीके समीप पहुँचा चूहा हंसकी पीठसे उतरकर भाग गया । हंसकी दयासे बाढ़से बचकर चूहा अपने प्राण बचा सका ।

अमेरिकाके एक मासिकपत्रमें यह हाल लिखा था कि, कुछ अङ्ग्रेज अफसर पोर्टस्मिथके पास आगके निकट बैठे थे, उनमेंसे एकने गाना-बजाना आरम्भ किया दश मिनिट भी न बीते होंगे कि, एक छोटीसी चूहिया निकल आई । लोग देख रहे थे कि, जिस जिस ढङ्गसे राग और ताल टूटता था उसी ढङ्गसे वह कूदती उछलती हुई प्रसन्न होती थी । इसके पीछे चूहिया अचेत होकर गिर पड़ी और मर गई । उसके दुःख दर्दका चिह्न भी जाता रहा कुछ कारण भी न जाना गया कि, क्यों मर गई ।

डाक्टर कारपेण्टर साहबका कथन है कि, एक स्त्रीने अपनी आँखों देखा कि, चूहोंका एक झुण्ड बच्चोंको आगले पञ्जोंमें दबाये एक घरसे दूसरे घर चला जा रहा है । जब वे प्रत्येक सीढ़ीपर पहुँचते थे तो एक दूसरेको बच्चा पकड़ा देते थे । इस प्रकार अगला अपने अगलेको दूसरा अगला अपने अगलेको पकड़ाता, इसी प्रकार सब सीढ़ीके ऊपर चढ़ते और उठाये चले गये । जिस बरतनमें उनका मुँह तथा पञ्चा पहुँच नहीं सकता था, उसमें वे अपनी पूँछ डुबा देते दूसरे साथी चूहोंको चखाते जिसमें स्वाद द्वारा मालूम हो जावे कि, इस बर्तनमें किस प्रकारकी वस्तु है उसका मित्र गन्ध तथा स्वादसे तुरन्तही जान लेता कि, अमुक वस्तु इसमें बन्द है, लेने योग्य होनेपर उसके लेनेकी चिन्ता करते ।

लाहौर जिलेके सुरसिंह नामक गांवमें एक जमींदारकी स्त्रीकी नथ जाती रही । उसने जान लिया कि, कोई चूहा लेगया होगा । उसके जमींदारने मदिराका प्याला भरकर चूहेके बिलपर रख दिया । चूहे मदिरा पीकर प्रसन्न हुए नथ बिलके बाहर रख गये ।

घ्राणशक्ति हवसियोंकी घ्राणशक्ति, घोड़ा, गोरखर

भारतवर्षमें विख्यात है कि, चूहोंको भविष्यका ज्ञान होता है क्योंकि, जिस मकानमें आग लगनेवाली होती है, उससे चूहे पहलेसेही निकल जाते हैं, वह मकान चूहोंसे खाली हो जाता है चूहे कुछ हानि करते हैं उनको गाली देनेसे वे घातक हो जाते हैं अधिक हानि किया करते हैं जो उनकी खुशामद करे तेल आदिका हलवा खिलावे तो कम हानि होती है ।

मैंने सुना था कि, एक गडेरिया भेड़ बकरियां चराता था । उसने एक झाड़ीमें ऐसा कौतुक देखा कि, एक चूहेने बिलसे निकालकर एक काला पैंसा बाहर रख दिया । इस प्रकार कई बार बिलके भीतर गया एक एक पैंसा बाहर लाकर रखता गया । जिससे बहुतसे पैंसोंका ढेर लगा दिया । उसे देखकर चूहा बहुत प्रसन्न हुआ । ढेरके इर्द गिर्द घूमने लगा । फिर उन पैंसोंको बिलके भीतर ले गया, गडेरिया यह कौतुक देख रहा था । उसने जान लिया कि, चूहा उनको बिलके भीतर ले जाना चाहता है वह ललकार कर दौड़ा । चूहा भयके मारे सूराखके भीतर घुस गया । गडेरियेने काले सिक्कोंको उठा लिया उन पैंसोंको भली प्रकार भलकर देखा तो चांदीके रुपये निकले । गडेरिया सांझको भेंड़ोंको लेकर अपने घर आया, सारे मनुष्योंसे चूहेका हाल कहा । गांवके लोग दौड़े आये अधिक द्रव्य प्राप्त करनेके लालचसे बिलको खोदा तो वही एक रुपया मिला जो भीतर लेगया था अधिक कुछ नहीं मिला चूहा भी अपने धनके शोकसे आखिरकार मरही गया ।

सर्प ।

भारतके इतिहासमें सर्पोंकी भी अनेक बातें मिलेंगी रामायण महाभारत भागवत और वेदोंमें सर्पोंकी अनेकों घटनाएं मिलती हैं । पृथ्वीके धारण करने वाले शेषनागसे लेकर भूमिपर फिर फिरकर मूषे खानेवाले तक इस जातिमें आजाते हैं । हिन्दू संस्कृतिमें नाग एक देवयोनि विशेष मानते हैं, इनके लोकको नागलोक कहते हैं इनकी अनेकों जातियां हैं, यहां उन्हींका कुछ वर्णन करते हैं ।

सर्पोंके राजा — यह समाज भी मानव समाजकी तरह ही है जैसे मनुष्योंमें नरपति होते हैं उसी तरह अहिरोंमें भी अहिपति हुआ करते हैं उनके राजाके व्यवहार भी वैसेही हैं वासुकि आदि सर्प जातिके राजेही तो हैं । पर ये तो बड़े राजे हैं, इनके सिवा और भी अनेक छोटे छोटे राजे होते हैं जो भूमण्डलपर भी रहा करते हैं ।

सर्पसभा — सन् १८३५ ई० की एक बात इस प्रकार सुनी गई थी कि, एक ब्राह्मण राजपूताना शङ्खावारीका रहनेवाला था । अकालमें देश छोड़कर दक्षिण हैदराबादको गया, क्योंकि वहाँ उसके यजमान रहते थे । यजमानोंने