कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 904, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस भगोड़े अमीरको खींचकर भीतर करती हैं। पहरेदार चीँटियोंमें एक तरहका भाग जानेका स्वभाव होता है कि वे अपनी जन्मभूमिको छोड़कर भाग जाती हैं।
सहबास—जोड़ खानेके पीछे फिर कदापि पलट कर नहीं आतीं। उनका घर मादा विहीन होनेके कारण शीघ्रही उजाड़ हो जाता है। उनका जोड़ खाना विशेषतः घरके भीतर नहीं होता देखा गया है कि, चारों ओर जासूस फिरा करते हैं कि, जहाँ कहीं वे बच्चा जननेवाली मादा पावें पकड़ लावें। जासूस विशेषतः इसी विषयके लिये नियत किये गये हैं। यह बात जाँचसे जानी गई है कि, झुण्डके झुण्ड इधर उधर तितर बितर हो जाते हैं। जिसमें अच्छी मादा ढूँढ़कर ले आवें। उनके मकानके समीप न मिले तो दूर दूरकी यात्रा करती हैं। बहुत दूर दूर चली जाती हैं फिर लौटकर नहीं आतीं। समय पाकर नवीन बस्ती बसाने लगती हैं।
सहवासके बाद मौत—जोड़ खानेपर निश्चयही मर जाती हैं। दूसरे भी अन्यान्य कितने कीड़े मकोड़ोंके नर जोड़ा खानेके पीछेही मर जाते हैं। ऐसाही नियम चीँटियों का भी है। क्योंकि सेवक चीँटियाँ उनको पुनः अपने घर नहीं लातीं न उनकी ओर ध्यानही देती हैं। एक बार चीँटियाँ घरको छोड़ जाती हैं तो वे अवश्यही मर जाती हैं। क्योंकि, उनके पास न पर होता है न भोजन प्राप्तिका यंत्रही होता है।
चीँटियोंके पर—प्राचीन कालके मनुष्य ऐसा अनुमान करते थे कि चीँटियोंको नियत समयपर, पर निकलते हैं। वर्तमान कालके जानवरोंकी विद्याके प्रख्यात विद्वान परह्वेरेके विचारसे जान पड़ा कि, मादाके नियत समय-पर निकलते हैं, उगकर फिर गिर जाते हैं।
बच्चे—चीँटियोंके अण्डे ऐसे छोटे होते हैं कि, उनका नज़्ज़ी आँखोंसे देखना कठिन हो जाता है। दूसरे कीड़ोंके विपरीत चीँटियाँ अण्डे देती हैं उसी समय स्वेच्छापूरवक अपने पर गिरा देती हैं। जो मजदूर चीँटियाँ हैं वे समस्त अण्डोंको एक स्थानपर इकट्ठा करती हैं। जिस समय वे अंडे देतीं हैं उस समय बहुतेरी चाकर चीँटियाँ उनके चारों ओर एकत्रित रहती हैं। वे अण्डोंको एकत्रित करके पृथक् पृथक् मकानकी कोठड़ियोंमें पकनेके लिये सावधानीसे धर-देती हैं और पालती हैं। उनके पकनेके लिये वायुकी आवश्यकता होनेसे दिनके समय चीँटियाँ घरके टीलेके मुँहके समीप रखती जाती हैं। पर ऐसे स्थानोंमें धरती हैं जिसमें कि, सूर्यकी तपन आवश्यकतासे अधिक न होने पावे जितनी गर्मीकी आवश्यकता है उससे अधिक न लगने पावे, जब रात होती है उस समय