कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 916, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंयँ कौँज जा दूर २ देशकी सफर किया करती हैं। जब वे विश्राममें होती हैं तो एक दो चौकीदारकी तरह खड़े पहरे दिया करती हैं, आपत्तिके समय शब्द करते ही अपने बैरियोंसे सचेत हो जाती हैं। ये कौँजे अपना अण्डा पर्वत पर छोड़कर चली आती हैं। उनके संकल्पसे उनका अण्डा पककर बच्चा हो जाता है।
कौवा तथा कुलाग।
कागोंका न्याय—कौवा बहुत चालाक जानवर है, स्काटलेण्ड किम्वा फिरोमें कागोंकी बहुत बड़ी सभा एकत्रित होती है। उस समय ऐसी भीड़ होती है जिससे प्रमाणित होता है कि, वे किसी विशेष अभिप्रायसे वहाँ बुलाये हुए इकट्ठे हुये हैं। उनमें कुछ उच्च श्रेणीके कौवे बहुत गम्भीर और न्यायी दिखाई देते हैं शेषके सारे सावधान तथा चिल्लाते दिखाई देते हैं। एक घण्टेके बाद सब उड़ जाते हैं। जब सब इधर उधर चले जाते हैं तो उस स्थानपर दो एक कौवे मरे पड़े हुये होते हैं।
डाक्टर एडमेन्स मेन साहबका कथन है कि, कौवोंका बड़ा जमाव दो एक दिनोंतक बराबर रहता है। जब तक उनके अभियोगका न्याय न हो जावे तबतक उन लोगोंकी सम बराबर उसी प्रकार रहा करती है। काग चारों ओरसे आकर नियत स्थानपर इकट्ठे हो जाते हैं। जब सब एकत्रित हो जाते हैं तो बहुत चिल्लाहट होती है। कुछ कालके पीछे सारे कौवे एक अथवा दोनों पर आक्रमण करके जानसे मार डालते हैं। जब न्याय हो चुकता है तो समस्त इधर उधर हो अपनी राह लेते हैं।
खरगोशकी शिकार—एक सरायवालेके पास बनैला कौवा था वह जङ्गली कौवे तथा कुत्तेको लेकर आखेट करने जाया करता था, कुत्ता तो झाड़ीमें घुसकर खरगोशको उठाता था, काग बाहर सावधानी किया करता था। खरगोशके झाड़ीके बाहर निकलते ही काग तुरन्त उसको पकड़ लेता था। कुत्ता पीछेसे शीघ्रही आकर कागका सहायक होता था। दोनों मिलकर खरगोशको पकड़ लेते थे। उनसे बचकर कोई भी खरगोश न जाने पाता था।
कुत्तेसे मित्रता—एक कुत्ते तथा कौवेकी मैत्री हो गयी। एक दिन कुत्ता गाड़ीके नीचे दबके आहत हो गया। कौवा कुत्तेकी सेवा किया करता, हड़ियां ले जाकर कुत्तेके सामने धरा करता। काग उसके साथ पला था, दोनोंमें अत्यन्त प्रेम था। जब तक वह अच्छा नहीं हुआ, तब तक बराबर उसकी सेवा करता रहा। एक रात कुत्ता अस्तबलमें बँधा था उस रातको कागने अपने मित्रसे