कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 944, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंकोई मछली उसकी चालमें आवे । कोई दूसरी मछली आई । देखा कि, पानी-पर छोटे २ कीड़े फिरते हैं, वह उनको खाने दौड़ती है बस । उसी समय यह ऐंझलर मछली पानीके नीचेसे निकलकर उस मछलीको चट कर जाती है । इस छलसे अनेक मछलियोंको फँसाया करती है । इस युक्तिसे उसका पेट नहीं भरता तो वीरताको काममें लाती है । मछलियोंको बलपूर्वक पकड़ती है । उसकी पकड़का छूटना कठिन हो जाता है । इसको शरीरका आधा शिर होता है।
धोखेसे बचानेवाली—हनुमानजी सञ्जीवन बूटी लेने गये थे कालनेमि राक्षस रावणकी ओरसे हनुमानजीको धोखा देने मुनि वन मार्गमें बैठ गया हनुमानजीने कालनेमिसे पानी मांगा उसने तालाब बता दिया वहाँ उनका पेर एक मछलीसे छू गया वो अप्सरा होकर स्वर्ग चली गई । उसने हनुमानजीसे कहा कि, महाराज ! मुझे ऋषिने मछली होनेका शाप दिया था, मेरी नम्रता देखकर निवृत्ति भी बतला दी थी कि, राम दूतका चरण स्पर्श होतेही मुक्त हो जायगी । आपके चरण लगजानेसे मेरा शाप चला गया । जिसे आप मुनि मान रहे हैं । यह कालनेमि है आपको धोखा दिया चाहता है । आप इससे सावधान हो जाइये । इतना कहकर अप्सरा चली गई, हनुमानजीने कालनेमिको मार डाला ।
पशु पक्षीके रूपमें ऋषि गण ।
अनेकों सन्त महात्मा ऋषि मुनि पशु पक्षीका रूप धरकर भूमण्डल पर विचरा करते हैं । उनका पशु पक्षीका शरीर इच्छाकृत होता है वो किसीका किया हुआ नहीं होता न ऐसाही है कि, पूर्वके देहको त्यागकर उक्त देह ग्रहण किया हो किन्तु वही देह पशु पक्षीके देहके रूपमें परिणत हो जाता है जब इच्छा नहीं रहती । बहुतसे उच्च कोटिके व्यक्ति भी कर्म वश पशु पक्षियोंकी योनिमें गमन करते रहते हैं पर पूर्वके अभ्यासके बलसे उन्हें स्मरण बना रहता है हृदय प्रकाशित रहता है पर बाहिर नहीं दीखता । इन बातोंके देखनेसे यही विदित होता है कि, “साईके सब जीव हैं कीरी कुंजर होय” सभी भगवानके हैं उसके लिये सब एक समान प्यारे हैं । राजर्षि भरतजीके आवागमनको लेकर कबीर साहिबने भी कहा है कि,
एक मोहके कारणे, भरत धरे दो देह ।
सो नर कैसे छूटि हैं, जिनके बहुत सनेह ॥
यानी एक मोहके कारण भरत दो देह धारण करता है तो वे मनुष्य कैसे छूटेंगे जिनके अनेकों मोहें मौजूद हैं अर्थात् अनेकों मोहँवाले मनुष्य अवश्यही