कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 953, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंआखेट खोजता है, डूबता है निकलता है अनेक प्रकारसे अपना काय्य सिद्ध करता है । सब रूप रङ्ग उसमें देख पड़ते हैं जीवित शक्ति भी जान पड़ती है ।
ऐनकेरेनेटे ।
एक धातुका टुकड़ा है देखनेमें नीलक नलकासा होता है । शाखायें फूटती हैं, उँगलियोंके समान गिरह होती है । सब शाखायें जीवित होती हैं, तारा मछली तथा मूंगा आदिकी तरह यह भी प्राण रखता है ।
मुंगिया या कोरल ।
मुंगिया पत्थर जिसे कि, अंगरेजीमें कोरल भी कहते हैं, समुद्रके तट पर टुकड़ा मिलता है समुद्रमें जीवित होता है, पानीसे मिला हुआ कठिन चट्टानोंकी तरह होता है । हिन्द महासागरको छोड़कर दूसरे गहरे समुद्रोंमें पाया जाता है । कोसोंतक लम्बी २ चट्टानके ऊपर कहीं पानी पर तैरता हुआ और कहीं पानीके अन्दर एवं कितने जीवित और कितने एक मुँदे पाये जाते हैं, पानीके अन्दरके मूंगे जीवित होते हैं, उनका रंग सफेद होता है पर जब वह बाहर निकाले जाते हैं तो लाल हो जाते हैं । टगरू जावाके मूंगे बड़ेही गुणवान् होते ।
स्पंज ।
दरियाई पदार्थ है । बहुत दिनोंसे इस बातपर वाद बिवाद हो रहा है कि, यह स्थावर जंगमोंसे कौन है ? सन् १८४८ ई० में यह सिद्ध किया गया था कि, यह स्थावर है पर कितनोंने यह निश्चय किया है कि, यह प्राणधारी है । बहुत छिद्रोंवाला लचकदार होता है । बहुतसा पानी सोखकर फिर छोड़ देता है । इसलिये वह बहुत कार्योंमें काम आता है ।
स्पंजकी पहचान—यह है कि, जितनाही हलका हो उतनाही अच्छा होता है । जिन टापुओंमें जिवकिया लोग इसको निकालते हैं वहाँ उसका रूप कुछ और ही होता है । उसके पंजे दूढ़ होते हैं वे क्रमशः बढ़ते हैं । जो यहाँ काममें लाया जाता है ये सब उसकी हड्डियाँ होती हैं ।
लाजवन्ती ।
लाजवन्ती एक पौधा है, यह भारतवर्षमें अधिकता के साथ पाया जाता है, इसमें भी प्राणधारियोंकेसे गुण पाये जाते हैं । पर स्पर्शसे यह जीवधारियोंके समान लजा जाती है इसी कारण यह लाजवन्ती कहलाता है ।
सूर्यमुखी ।
जिसको सभी भारतवासी जानते हैं । यह सूर्यके साथही साथ घूमा करता है जिधर सूर्य जाता है उधरही उसका भी मुख हो जाता है । इसी तरह