भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1298, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1298

( १५८ )

बोधसागर

साठसमै बाहर चौपाई । ततछिन हंस लोक को जाई ॥ सुषुमनि तत्त्व करे असवारी । तबे कालकी पहुँचे धारी ॥

साखी--जादिन काल आसहि, पगते करे उजारि ।

भागि जीव चढ़ि बैठही, द्वार कुल्फ उधारि ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

साहेब इतना भेद बताई । जाते काल छुवन नहि पाई ॥ सब तत्त्वनको भायो भेदा । एक २ का कह्यो निषेदा ॥ तत्त्वके संग जीव चलि जाई । कौन ठौरनमें बासा पाई ॥ कौन तत्त्व संग धरे जिवदेही । कौन तत्त्व है सुक्त सनेही ॥

सद्गुरु वचन

नौ तत्त्वनका भेद बताऊँ । द्वारा तीनको कहि समझाऊँ ॥ तेज तत्त्वमें करे पयाना । वज्रशिलामें जाय समाना ॥ आकाश तत्त्वमें छूटे भाई । तारागणमें जाय समाई ॥ वायु तत्त्वमें छाडे देहा । वन वृक्षनमें जाय उरेहा ॥ पृथ्वी तत्त्वमें छूटे भाई । तौ जीव देह पशुकी पाई ॥ जल तत्त्वमें जब छूटे जाई । नरकी देह धरे तब आई ॥ अग्नि तत्त्वमें तजै शरीरा । होय पशुपक्षी कहै कबीरा ॥ छै तत्त्वनको कह्यो विचारा । तीन तत्त्वको भेद निनारा ॥ तीन तत्त्व भेद जो पावे । निश्चय हंसा लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

छै तत्त्वनको पायो भेदा । तीन तत्त्वको कहो निषेदा ॥ तीन तत्त्व देहु प्रकट बताई । जासे हंसा लोक चल जाई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास सुनिये चितलाई । तीन तत्त्व मैं देउं बताई ॥ शब्द तत्त्व जो जानै भाई । सुरति तत्त्वको ध्यान लगाई ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 1298, कुल 2136 में से · BharatKosha