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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १५८ )

बोधसागर

साठसमै बाहर चौपाई । ततछिन हंस लोक को जाई ॥ सुषुमनि तत्त्व करे असवारी । तबे कालकी पहुँचे धारी ॥

साखी--जादिन काल आसहि, पगते करे उजारि ।

भागि जीव चढ़ि बैठही, द्वार कुल्फ उधारि ॥

धर्मदास वचन--चौपाई

साहेब इतना भेद बताई । जाते काल छुवन नहि पाई ॥ सब तत्त्वनको भायो भेदा । एक २ का कह्यो निषेदा ॥ तत्त्वके संग जीव चलि जाई । कौन ठौरनमें बासा पाई ॥ कौन तत्त्व संग धरे जिवदेही । कौन तत्त्व है सुक्त सनेही ॥

सद्गुरु वचन

नौ तत्त्वनका भेद बताऊँ । द्वारा तीनको कहि समझाऊँ ॥ तेज तत्त्वमें करे पयाना । वज्रशिलामें जाय समाना ॥ आकाश तत्त्वमें छूटे भाई । तारागणमें जाय समाई ॥ वायु तत्त्वमें छाडे देहा । वन वृक्षनमें जाय उरेहा ॥ पृथ्वी तत्त्वमें छूटे भाई । तौ जीव देह पशुकी पाई ॥ जल तत्त्वमें जब छूटे जाई । नरकी देह धरे तब आई ॥ अग्नि तत्त्वमें तजै शरीरा । होय पशुपक्षी कहै कबीरा ॥ छै तत्त्वनको कह्यो विचारा । तीन तत्त्वको भेद निनारा ॥ तीन तत्त्व भेद जो पावे । निश्चय हंसा लोक सिधावे ॥

धर्मदास वचन

छै तत्त्वनको पायो भेदा । तीन तत्त्वको कहो निषेदा ॥ तीन तत्त्व देहु प्रकट बताई । जासे हंसा लोक चल जाई ॥

सद्गुरु वचन

धर्मदास सुनिये चितलाई । तीन तत्त्व मैं देउं बताई ॥ शब्द तत्त्व जो जानै भाई । सुरति तत्त्वको ध्यान लगाई ॥

संतोष बोध

( १५९ )

नीर तत्त्व जाके घट होई । ताकर आवागमन न होई ॥ नौ तत्त्वनको कह्यो विचारा । धर्मदास तुम करो सँभारा ॥ कहूँ भेद तत्त्वकी बानी । क्षत्र अधर है नाम निशानी ॥ षष्ठ कमल नैन लगि देखा । तीन भेदको कहूँ विवेका ॥ तीन भेद पुरुष तेहिके पास । छाड़े काल जीवकी आसा ॥ पुरुष शब्द हैं शीतल अंगा । तत्त्व निःअक्षर कमलके संगा ॥ आप पुरुष तेहि पिण्ड न हाथा । पुरुष बिदेहि शीश बिन गाथा ॥ कायामांहि लगी यक नाला । तहवां रहे निरंजन काला ॥ ताशिर ऊपर पांजी लागी । ताहि चढ़ि हंसा जाये आगी ॥ स्वेत औ पीत कमल है गाता । तीन तत्त्व जीव संग रहाता ॥ ताहि तत्त्वको भाव सुनाई । तीन रूप तीन महिठाई ॥ कायाक्षेत्र ताहि हम दीन्हौ । खेत कमाय सो आगम चीन्हौ ॥ सप्तपाखुरी कमल यक होई । ताकर भेद कहौ मैं सोई ॥ कमल एक लोकहै तीना । तीन लोक तीनोंपुर कीना ॥ चौथालोक अधर कहि चीन्हौ । ताकरि काल गमन नहि कीन्हौ ॥

साखी-तीनलोक विचारिके, गहे शब्द टकसार ।

कहै कबीर विचारिके, उतरो भवजलपार ॥

धर्मदास वचन चौपाई

साहेब बचन कही परमाना । तीनलोकका कहो ठिकाना ॥ चौथालोक मोहि समझाई । सुनू भेद तब मन पतिआई ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास मैं तोहि बुझाऊँ । तीनलोक स्थान चिन्हाऊँ ॥ ब्रह्मलोक लिंग अस्थाना । तहाँते उत्पति होय निदाना ॥ विष्णुलोक नाभी विस्तारा । शिवका लोकहै हृदय मैझारा ॥

( १६० )

बोधसागर

चौथालोक अधर अस्थाना । कहै कबीर मैं कह्यौ बिधाना ॥ ताहि लोकको ध्यान लगावे । चलत हंस काल नहि पावे ॥

सारखी-अधर करै जब आसन, पिण्ड झरोखे नूर । मैं अदली कदली बसूँ, कहाँ खोजै बडि दूर ॥

धर्मदास उवाच चौपाई

साहेब लोक कहा हम जाना । और भेद कछु कहो बखाना ॥ सात पांखडी वरणि दिखाओ । भिन्न २ करि मोहिं लखाओ ॥

सद्गुरु उवाच

सात पांखडी कहूँ ठिकाना । धर्मनि बचन सत्कर माना ॥ श्रवण दोय पांखडी जाना । सुने शब्द तबही सुख माना ॥ होय पांखडी नैन बखानी । पापदृष्टि सबही क्षय हानी ॥ पांचये पांखडी कहूँ बिचारा । रसना शब्द उठै हंकारा ॥ छठी गांखडी इन्द्री जानी । उत्पत्ति बिन्दुले डारे तानी ॥ सातवीं पांखडी हेठ बतावा । खोजै कमल स्थिर घर पावा ॥ पांखडी सात कमल है एका । भीतर ताहि जीव मन ठेका ॥ ताहि कमलमें तार लगाई । सोई तारको चीन्हों भाई ॥ सोही तार अधर ले राखा । जो कोई साधु हृदयमें ताका ॥ ताहि तारका बहुत पसारा । खंड ब्रह्मांड पताला संबारा ॥ ताहि तारमें डोरी लागी । बिरला चीन्हे संत सभागी ॥ श्वेतभाव तारको अंगा । नाम निःअक्षर ताके संगा ॥

सारखी--कहै कबीर धर्मदाससे, गुप्त निःअक्षर नाम ॥ निःअक्षर लखपावई, होय जीवको काम ।

धर्मदास उवाच चौपाई

कमलभेद तुम भले सुनाया । अक्षरभेद सोइ हम पाया ॥ साहेब कहो जीव किमि आया । नरदेही कैसे करि पाया ॥

संतोषबोध

( १६१ )

कैसे घटमें कीन पसारा । कौन अस्थल बैठक संवारा ॥ इतना भेद कहां समझाई । सतगुरु मैं तुम बलि जाई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास सुनियो चितलाई । जो बूझे सो देखै बताई ॥ पवनजीव ब्रह्माण्ड रहाई । ता पीछे नाभी चलजाई ॥ नयन नासिका कीना साखी । मूल कमल सुरति गहि राखी ॥ चक्षुज्योति जो बरै उजियारा । हिरदाकमल ब्रह्माण्ड मझारा ॥ जीव बैठे द्रौपन में जाई । काया क्षेत्रमें जाय समाई ॥ ता बिधि घटमें जीवहि आया । रज बीजहीते पिंड बँधाया ॥ शीश स्वारि बांही निर्माई । कंठ कमल हृदय बनाई ॥ ता ऊपर द्विपि बदन सवारा । पवनजीवसे भय उजियारा ॥ कमल सबज स्वेत है राता । नाभी सकल पुनि सब गाता ॥ ता पीछे दोय खम्भ लगाया । रचिकाया पुनि जीव समाया ॥ स्वाती पवन पुरुषकी स्वांसा । जिन कीना जीवन संग बासा ॥ ताको भेद सुना धर्मदासा । तौलि लेहु सत्ताइस मासा ॥ छिन छिन पलपल आवै भाई । जीव संधि लेखे नहि पाई ॥ प्रथम घडी ब्रह्माण्ड रहाई । दूजी घडी नाभी चल जाई ॥

साखी-तीजी घडीके बीतते, फिर तहँवा चलजाय ॥

अस बिधि रहनी जीवकी, कहै कबीर समझाय ॥

धर्मदास वचन चौपाई

जा बिधि जीव देहमें आया । सोई भेद हम निज कर पाया ॥ दयावंत प्रभु और बताई । छुटै हंस कौन दिशि जाई ॥ काया तजिकै होय न्हारा । कौन दिशा हंस पगुधारा ॥ तौन ठाम मोहि देहु बताई । तहां सुरति राखूं ठहराई ॥

नं. ८ कबीरसागर -

( १६२ )

बोधसागर

साखी—चारखूट धरती अहै, आठ दिशा है पवन । सतगुरु कहो विचारिके, हँसाके दिशि कवन ॥

सदगुरु वचन चौपाई

मारग दोय तोहि कहँ ज्ञाना । एक बंधन एक मोक्ष बखाना ॥ जो स्वासा सँग करै पयाना । पाँच तत्त्वमें जाय समाना ॥ फिरि फिरि आवै फिरि २ जावे । बहुरि जगमें नाम धरावे ॥ अधर तत्त्वमें शब्द निवासा । ताहि माहि जिव करै जो बासा ॥ सार शब्दमें रहै समाई । अभय द्वार होइ आवै जाई ॥ वहां न लागै काल कसाई । द्वीप अधरमें बैठे जाई ॥ गुप्तभेद काहु बिरलै पावा । तुमको धर्मनि प्रगट सुनावा ॥

साखी—उत्तर घाटी ऊतरे । अधरहि बैठे आय । तहांते सुरति लगावई, पुरुषके परसे पाय ।

धर्मदास वचन चौपाई

ताहि अधरको कहो ठिकाना । देखू जब मेरा मन माना ॥ बिन देखे परतीत न आवै । जो नहि सतगुरु भेद बतावे ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास मैं भेद बताई । जाय अधरमें जीव समाई ॥ ताहि अधरको कहँ ठिकाना । योजन आठ ऊपर परमाना ॥

साखी—एक अधर होय आवही; एक अधर होय जाय । एक अधर आसन करै, अधरही माहिँ समाय ॥

चौपाई

प्रथम हंस सुखसागर जाई । सुखसागर में दर्शन पाई ॥ सुखसागरका यही सँदेशा । लागे उडुगण पाती कैसा ॥ हँसा पैठिके कीन सनाना । भय उजियारी षोडश भाना ॥ लागी डोर शब्दकी नेहा । असपांजी अवर बिदेहा ॥

संतोषबोध

( १६३ )

लागी डोरी शब्दकी तारा । चढ़ै हंसा पांजी उजियारा ॥ चढ़िके हंस अधरसे पेखा । हंसा उलटि ठाटको देखा ॥ भलि साहेब मोहि कीनि दाया । छूटि सकल मोह और माया ॥ पुहुपमांहि जस वास समाना । हंस धरै इमि पुरुष ध्याना ॥ या विधि हंस अमरघर जाई । धर्मदास सुनियो चितलाई ॥

साखी-धरती अकाशसे बाहिरें, जहां शब्द निर्वान । तहां जीव चढ़ि बैठही, काल मरम नहिं जान ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

सद्गुरु भेद सतहि समाना । द्रौपखंडका कहो ठिकाना ॥ कायाखंड कहो मोहि भाखी । जाते जीव अमरघर राखी ॥

सतगुरु वचन

धर्मदास बूझी भलवानी । सत्य वचन तोहिकहुं बखानी ॥ प्रथमखण्ड शब्द है भाई । दूसर खण्ड सुरति ठहराई ॥ तीसर खण्ड निरतिमें ठयऊँ । चौथा खण्ड प्रेम निर्मयऊँ ॥ पांचवाँ खण्ड शील है भाई । छठाँ खण्ड क्षमा निर्माई ॥ सातवाँ खण्ड संतोष हटाया । आठवाँ खण्ड दया समझाया ॥ नव खण्ड भक्ति कहि दीन्हा । धर्मदास तुम निजकरि चीन्हा ॥ इन खण्डनमें खेले जाई । निश्चय हंसा लोक सिधाई ॥ सुनो सात द्रौपनके नाऊँ । भिन्न भिन्न करि कहि समझाऊँ ॥ द्रौपतत्त्व है बड उजियारा । ताको निशिदिन करो विचारा ॥ धर्ती तत्त्व अग्नि जो होई । द्रौपजलानिधि जाय समोई ॥ तेजतत्त्वमें भाषि सुनाई । द्रौप शून्यमें जाय समाई ॥ जलका तत्त्व कहू विस्तारा । तेहि सुखसागर द्रौप सिधारा ॥ वायस तत्त्व सुनो धर्मनिवानी । पवनद्रौपमें जाय समानी ॥ तत्त्व अकाश कहू समझाई । द्रौपस्वर्गमें जाय समाई ॥

( १६४ )

बोधनागर

अग्नितत्त्वकी सुनियो वानी । दीप अग्निमें जाय समानी ॥ सुषुमनि तत्त्व कहूँ समझाई । दीप अथरमें बैठे जाई ॥

सारखी-सातद्वीप नौ खण्ड हैं इनमें, रहे समाय । कहे कवीर धर्मदाससे, निश्चय लोक सिधाय ॥

धर्मदास उवाच

साहब भेद कहो हम जाना । सातबारका कहो ठिकाना ॥ सातबार कैसे उपजाई । चन्द सूर्य कैसे निर्माई ॥ सूरज कैसे तेज समोई । सीतल चन्द कौन विधि होई ॥ निशिवासर कैसे कर जानी । ये सब भेद कहो मोहि ज्ञानी ॥

सतगुरु उवाच

धर्मदास बूझी बल नागर । संत सुकृत ज्ञान उजागर ॥ कहूँ भेद सुनियो चितलाई । चन्द्रसूर दिनवार बताई ॥ पुरुष कमलते सातो वारा । ताको भेद कहूँ टकसारा ॥ सप्तपाखंडी जब बिकसाई । सातबार तहांते आई ॥ आठवाँ बार कमलमें रहेऊ । ताहि बारते सातो कियेऊ ॥ कलीकमल भये औधियारा । निशिवासरको भयो विचारा ॥

सारखी-भंजन कीनो कमलको, छोलन कीनो पास । चन्द्रसूर जाते भये कियो पृथ्वी प्रकाश ॥

चौपाई

पहिले छोलन जल' नहि रहेऊ । ताते सूर तेज जो भयऊ ॥ सुनियो चन्द्रकेरि शीतलताई । धर्मदास मैं देउँ बताई ॥ सीच्यो अभी छोल पुनि जबही । शीतल चन्दा उपजे तबही ॥ छोलन चूनि झरि झरि परही । नक्षत्र चंद्रमा संगति करही ॥ यहि विधि चन्द्रसूर जो भयेऊ । धर्मदास हम तुमसे कहेऊ ॥ यह सब रचना कूर्मको दीना । पाछे ध्यान अथरमें कीन्हा ॥

संतोषबोध

( १६५ )

सब विस्तार कूर्मही दयऊ । तबही पुरुष कन्याको कियऊ॥ रचना रही कूर्मके पेटा । धर्मराय ताघर नहिं दीठा ॥

साखी--रचना रही कूर्ममें, पुरुषहि दीन सर्वांरि । जाते शब्द उत्पति भई, सो मैं कहूँ विचारि ॥

चौपाई

धर्मराय सेवा सितधारा । तब पुरुष ताहि बाचा हारा ॥ पुरुष दीन उत्पति धर्मराई । धायके लडे कूर्मसे जाई ॥

साखी--क्षीणै माथा नख करी, हरे सबे विस्तार । महाशून्य लेय आयऊ, धर्मराय बरियार ॥

चौपाई

निकसी खान वेद रस बानी । चांद सूर्य यों उडगण जानी॥ सब विस्तार निकसिजब आया । धर्म जलनिधि राख छिपाया॥

साखी--निकसी वस्तु कूर्मते, ना कोइ कीन विचार । मूल बीज जब पाइया, भयाकाल बरिआर ॥

धर्मदास उवाच चौपाई

को ले शीश कूर्म का छीना । यह तो भेद सकल हम चीना॥ धर्मराय कन्या कैसे पाई । तीन देव कैसे उपजाई ॥

सद्गुरु वचन

अद्या पुरुष दीन पठवाई । आदि भवानी अमृत लाई ॥ अष्टांगी देखी धर्मराई । तासु सुरति संयोग बनाई ॥ अद्याके विधि शिवसो सुरारी । मथि जलनिधि रतन निकारी॥ अष्टांगीते भये विस्तारा । सब रचना या कीन हमारा ॥

कूर्म वर्णन

बिनती कूर्म पुरुषते लाई । तव सुत शीश हमार छिनाई ॥ छोछा उदर भया हमारा । अहो पुरुष कहु देहु अहारा ॥

( १६६ )

बोधसागर

साखी-वचन तुम्हारा मानेऊ, राखि शब्दकी कानि । नीर जलानिधि सोखिके, मेटत सब उत्पानि ॥

पुरुष उवाच

वाणीपुरुष अथरसे कहेऊ । जाउ कूर्म मागि सो लेऊ ॥ वचन हमारा सत जो होई । जो मांगो सो देऊं तोई ॥

कूर्म उवाच

साखी-ना कछु भोजन चाहैं, ना कछु करूं अहार । चन्द्र सूर्य जब पाउं, तब लेऊं शिर भार ॥

पुरुष उवाच चौपाई

चांद सूर्य मैं देहू तोही । कैसे चलै सृष्टि पुनि सोही ॥ जो जगमें होय अंधियारा । कैसे चलै सृष्टि व्यवहारा ॥

कर्म उवाच

साखी-चांद सूर्य चलि आवही, तो मैं करूं अहार । चांद सूर्य पहुंचे नहीं, निगुलूं सब संसार ॥

पुरुष उवाच-चौपाई

पुरुष वचन तब कहैं बिचारी । भोजन सूर पहरलेहु चारी ॥ शशि भोजनका भाषू लेखा । घडी घडीको करूं विवेका ॥ अमी चन्द्रके पेट रहाई । ताको लेखा कहुं समझाई ॥ अमृत क्षणक्षण तुम लेहो । पाछै सम्पूर्ण करि देहो ॥ चन्द्रतेज धर्मनि इमि हानी । सूर्यतेज जो बहुत बखानी ॥ कूर्म पुरुष वचन हियो देखा । घडी पहरको बांधे लेखा ॥ पल क्षण दंड परमाना । घडी पहरकी कहूँ ठिकाना ॥ षट स्वासाकी पल यक होई । षट पलकी क्षण जानों सोई ॥ दश क्षणको यक दंड बखाना । दोय दंड यक घड़ी परमाना ॥ चारि घड़ी यक पहर विवेका । चारि पहरका दिन यक लेखा ॥ सात बार दूना करि जाना । यहि विधि पाख भयो परमाना ॥

संतोषबोध *

( १६७ )

दोयपाखको मास बखाना । दोयमासकी ऋतु यक जाना ॥ दोयऋतुको थककाल विशेषा । तीन चौकड़ी बरष यक देखा ॥ आगे देखो ताकर लेखा । धर्मदास अब कहूँ बिवेका ॥ निशि वासर पुनि होय जबही । कर्म अहार सुरले तबही ॥ चारिपहर निशिकरै जो आसा । वासरसुर सब होय प्रकाशा ॥ अत्र चन्दाको कहूँ बखाना । धर्मदास तुम निज करि जाना ॥ कृष्णपक्ष पडिवा जब आवे । कूर्म अहार चन्द्रको पावे ॥ कूर्मअहार चन्द्र इमि लीन्हौं । घडी घडी घटती तब कीन्हौं ॥ शुक्लपक्षते भया निवासा । पूनम चन्द्र किया प्रकाशा ॥ पूनम व्रत कूर्म जो कीन्हा । ताते चन्द्रआस नहिं लीन्हा ॥ अमी चन्द्रमें रहे समाई । पूनम अधिक जाहिते भाई ॥ पूरण व्रत पूनमको होई । पूनममें चौका आरम्भे सोई ॥ तीन व्रत वंशको दीना । अंश बचाय अपनाकरिलीना ॥

साखी-दीना अपने वंशकी, करि हैं शब्द संभार ।

गुप्तनाम गहि राखि है, हंस उतारे पार ॥

चौपाई

सुमिरे नाम औ सुरति संभारे । नाम पान दे हंस उबारे ॥ जा दिन मुक्ति साथै कोई । निःअक्षरकी गमताही होई ॥ पूरण व्रत पूनम जो होई । पूनम चौका कूर्मका सोई ॥ अहो कूर्म आसन पर जाई । सत्य वचन कहूँ समझाई ॥ ऐसे वचन कूर्मको भयऊ । कहैं कबीर धर्मनि सुनि लयऊ ॥

धर्मदास वचन

साहेब भेट कहे हम पेखा । अब भाष्यो पवनन कर लेखा ॥ पवन भेद मोहि कहौ समुझाई । वचन तुम्हार रहूँ लवलार्ई ॥ कहो कहाँ ते पवन उठि आई । दिशा भेद तुम मोहि सुनाई ॥

( १६८ )

बोधसागर

कवन पवनते जीव उत्पानी । सोई पवन तुम कहौ बखानी ॥ ताहि पवनको नाम बताऔ । कर्म काटि हंसा मुक्ताऔ ॥ कैसे सीप स्वातीको पावै । कारण कौन बांझ रहि जावै ॥ ये सब भेद दया करि कहेऊ । साहब मोहि अपना करि लयेऊ ॥

सदगुरु उवाच

धर्मदास सुनु पवनकी खानी । कूर्म मुखते पवन उत्पानी ॥ चारि अरति पवन उठि आया । ताको भेद कोई जन पाया ॥ शीश कूर्मका कहूँ बखानी । साधु सुजन कोई कोई जानी ॥ माया आठ पृथ्वीमें भीना । आठ दिशा भइ ताकर चीना ॥ माथा आठ आठ है माना । चारिदिशा चारि कौन परमाना ॥ माथा तीन छीनि ले गयऊ । माथा तीन पेटमें रहेऊ ॥ काकर चौदह भुवन बनाया । सोई रूप नर करे सुभावा ॥ अधर पवन सो जीव उत्पानी । चले उर्द्धसों अधर समानी ॥ ताहि वचनको पारस नामा । होय संयोग उठ जब कामा ॥ बाई और ते देहि जगाई । उमगे काम चले मनताई ॥ चले बिन्दु तीन मुख धाई । उरधहुते अधर जब आई ॥ ऋतुबसन्त जा दिन होई । स्वाती पवन पड़े पुनि सोई ॥ ऋतुबसन्त त्रियतन आवे । खुले कमल तब चाह जनावे ॥ शिव शक्ति सो मिलि है आई । स्वाती बुन्द शक्ति तब पाई ॥ तौन पवन बिन्दु गहि लेही । ताते बांझ होय नहिं तेही ॥ उत्पति पवन कही हम सोइ । स्वाती पवनले सम्पुट होई ॥

साखी—जाहि पवन पर चंदा रसे, ताहि न आसे काल । को यह भेद विचारि है, सोइ जौहरी लाल ॥

चौपाई

धर्मदास तोहि कहूँ बिचारा । सूझि पड़े सो भेदन्यारा ॥

संतोषबोध

( १६९ )

स्वाती पवन छुवन नहीं पावे । बिन्दु अकेला जो उठि धावे ॥ ताते शून्य होय पुनि जाई । कहूँ भेद चित्तराखु समाई ॥ पवन भेद हम तुमसो कहेऊ । नाम न्यारा इन्ते रहेऊ ॥

साखी-पवन भेद हम भाखेऊ, तामैं कालपसार ।

पचासी पवनके बाहिरे, अरज शब्द है सार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

पवन भेद सतगुरु हम जाना । अब कछु कहिये नाम बखाना ॥ निःअक्षरका कहो प्रकाशा । है भीतर कि बाहर बासा ॥ कैसे हंसा लोक समाई । कौन बस्तु जो होय सहाई ॥ कैप्रमान बस्तु जो होई । साहेब मोहि कहो तुम सोई ॥

सद्गुरु उवाच

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । संशय तेरो सबहि मिटाऊँ ॥ बावन अक्षर मय संसारा । निःअक्षरसो लोक पसारा ॥ सोइ नाम है अक्षर निवासा । कायाते बाहर प्रकाशा ॥ नाम भेद मैं तुमसे कहेऊ । धर्मदास तुम निजकर ठहेऊ ॥ तौन नाम मुनि हंसा पावे । कहै कबीर सो लोक सिधावे ॥

साखी-धरनि अकाशके बाहिरे; योजन आठ परमान ।

तहां क्षत्रतन राखेऊ हंसा करे विश्राम ॥

चौपाई

विन सतगुरु कोई भेद न पाई । धर्मदास मैं तोहि लखाई ॥ राई भर है वस्तु हमारी । अर्धराय स्थूल सवाँरी ॥ लहर लहर बादलमें होई । पुरुष मूल निज जानो सोई ॥ उनको सौप दीन शिर भारा । वै जीवनको करै उबारा ॥ भाषू शब्द प्रथमहैं राई । फूटि अकाश घोर होय जाई ॥ वाहिवक्त जो तजै शरीरा । आवै लोक अस कहै कबीरा ॥

( १७० )

बोधसागर

सत्तलोक अधर है धामा । तहवों पुरुष अजर है नामा ॥ तौन नामले हंस उड़ाना । पहुचै हंसलोक अस्थाना ॥ तहाँ गये जिवकाल न पावे । योनि संकट बहुरि न आवे ॥

सारखी--सबे भेद हम भाषेऊ, कहा शब्द टकसार । धर्मदास प्रतीति करि, सुमिरहु नाम हमार ॥

धर्मदास उवाच-चौपाई

कहेउ शब्द मोर मन माना । अब प्रभु कहिये सुरति ठिकाना ॥ कहो सुरतिकी उत्पति भयेऊ । कहो निरति दूसर निर्मयऊ ॥ कौन सरूप सुरतिको जानी । कैसे निरति दूसरी ठानी ॥ कैसेके घट आनि समानी । सो समरथ मोहि कहो बखानी ॥ सुरति निरति संगति किमि भयऊ । कैसे समझ हृदयमें लहेऊ ॥

सारखी-सुरति निरतिकी उत्पति, सब कहि भाषहु मोहि ॥ दोनों कैसे देखिये, पूछतहौं गुरु तोहि ॥

सदगुरु वचन चौपाई

धर्मदास मैं कहूं वखानी । भाखं सुरति निरति उत्पानी ॥ मूल नाभि ते शब्द उचारा । फूढीनाल भई दुइ धारा ॥ स्वाती पवन अधरते आई । सुरति निरति संगति मिलि धाई ॥ सुरति निरति यों उत्पति होई । ताको भेद लखे जन कोई ॥ सुरति निरतकी सुधि ना पाई । सो नर पशु पक्षी है भाई ॥ मूरख सो मोहरति है गयऊ । शब्द बांधि जिन सुरति ना गहेऊ ॥ तेहि शब्दका करो विचारा । सुरति निरतिले शब्द संभारा ॥

सारखी-अंकुर नाम वह शब्द है, कीना सकल पसार ॥ कहे कबीर धर्मदास सों गहो शब्द टकसार ॥

चौपाई

गहै शब्द सो लोक सिधाई । बिना शब्द पशु पक्षी भाई ॥

संतोषबोध

( १७१ )

बिना शब्द जैसे घट अंधियारा । धरि धरि काल करै अहारा ॥ शब्द सुरति निरति यक ठौरा । कहै पुरुष तहां मोहि निहोरा ॥ अगम तत्त्व गहि मथै शरीरा । निरति नाम भये सत्कबीरा ॥ निरति धरे शब्दकी आशा । सुरति नाम तुम गहु धर्मदासा ॥ सुरति निरतिसे बांधे नेहा । पावै नाम होय हंस विदेहा ॥ कथि ज्ञान भाषेउ टकसारा । धर्मदास तुम करो विचारा ॥ हम तुम कीना सकल पसारा । लोक न जाने मूठ गँवारा ॥ मथुरा बैठिके ज्ञान सुनाई । धर्मदाम गहे सतगुरु पाई ॥ पूरण ज्ञान तुम मोहि सुनावा । संसय सबही दूर बहाया ॥

साखी-गुरु समाना शिष्यमें, शिष्य लिया कर नेह । विलगाये विलगे नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥

इति श्रीग्रन्थसंतोषबोध समाप्त


A black and white line drawing of a vase filled with flowers and leaves, centered on the page. The vase is cylindrical with vertical lines, and the flowers are clustered at the top with long, pointed leaves. The drawing is framed by a decorative border consisting of repeating scrollwork patterns along the edges of the page.

सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, कर्णामय, कबीर, सुरतियोग संतान, धनी, धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया- वंश व्यालीसकी दया

अथ श्रीबोधसागरे

पञ्चविंशतिस्तरंगः

अथ काया पांजी प्रारम्भ

धर्मदास उवाच-चौपाई

धर्मदास जब विनती कीना । कायापांजी पूँछ सो लीना ॥ धर्मदास पूछे चित लाई । कायापांजी कहो अर्थाई ॥ काया पांजी कहो विचारी । जहाँ होय तत्त्व करै पैठारी ॥ काया पांजीका करौ बखाना । जहवाँ सुरतिका सदा ठिकाना ॥ कायापांजी निजकर पाऊँ । सुरति शब्दमें जाय समाऊँ ॥

( १७४ )

बोधसागर

कायापांजी कर कहो विशेषा । मैं अपने घट कहूं विवेक्षा ॥ करि विवेक तहैं सुरति लगाऊँ । पांजी द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ सुरति लगाय रहूँ मैं तहैंवां । सार शब्द मूल है जहैंवां ॥ करि विवेक तहां सुरति पठाऊँ । पांजां द्वार घाट मैं पाऊँ ॥ पावो घाट सुरतिके द्वारा । तो मैं सुरति करो पैठारा ॥ बिना घाट कहाँ जाऊँ भाई । बिन जाने कहैं रहूँ समाई ॥ बिन जाने जाऊँ केहि घाटा । कैसे पाऊँ शब्द के बाटा ॥ बिन जाने शब्दकरि घाटा । शब्द अगम अगम है बाटा ॥ शब्दके अंग अगम है भाई । बिन जाने सब गये नसाई ॥ पाऊँ द्वार शब्दका टीका । अवर सकल जग लागे फीका ॥ अगम शब्द कहो अर्थार्थ । बिन पाये शब्द गह्यो न जाई ॥ मूल शब्द जहैं होय उचारा । सो पाऊँ सुमेरु चढ़ि द्वारा ॥ भाषो द्वार सुमेरु बखानी । कहवांते सुमेरु पुनि जानी ॥ कहवांते अकाशका लेखा । सो मोहि साहेब कहो विवेक्षा ॥

साखी-धर्मदास बिनती करे, घाट घाट कहो समझाय ।

तहां मैं सुरति लगाइके, शब्दमें रहूँ समय ॥

सद्गुरु उवाच-चौपाई

धर्मदास मैं भेद बताऊँ । सुरति शब्दका द्वार चिन्हाऊँ ॥ चन्द्रलगनका कहूँ विचारा । तहवां सुरति करो बैठारा ॥ चन्द्रद्वार होय आवो जाई । यही घाट मैं रहो समाई ॥ दोउस्वर साधि करो यक घाटा । चन्द्रद्वार होय पावो बाटा ॥

धर्मदास उवाच

कौन घाट चन्द्र है भाई । कौन घाट सूर्य पै आई ॥

१ विवेक्षा-विवेक-विचार

कायापांजी

( १७५ )

सदगुरु उवाच

दहिने घाट चन्द्रका वासा । बाँवें सूर करै प्रकाशा ॥ यही दोउ स्वर साधो भाई । चन्द्रद्वार होय निकसो आई ॥ अगम पंथ दहिने स्वर करहु । सुरती संयोगनाल चित धरहु ॥ चन्द्रद्वार होय आओ जाइ । शब्द सुरतिमें रहो समाई ॥ स्वर दाहिने सुरति चढ़ाओ । तबही डोर शब्दकी पायो ॥ शब्द डोर दहिने दिशि जाई । धर्मदास तुम गहो बनाई ॥ पाओ डोर शब्दको भाई । अगम पंथ चढ़ि बैठो जाई ॥ गहो बनाइ कटै यम पासी । पहुँचो लोक मिटै चौरासी ॥ स्वर दाहिने होय करे पयाना । तब सोहं सुरतिहोय अगु आना ॥

सार्वी--कहैं कबीर धर्मदाससे, ऐसा साधो घाट । आगे भेद बताऊं, तहं देखो लिजवाट ॥

चौपाई

अहो धर्मदास मैं भेद बताऊं । शब्दहि सुरतिका द्वार चिह्नाऊं ॥ भाष्यो शब्द सुरतिका पासा । सो मैं तुमसे कहों प्रकाशा ॥ कहूँ तत्त्व तहैं करो जो बासा । मथो तत्त्व तुम धर्मदासा ॥ मथो तत्त्व सुरति सो भाई । पुनि आगेको देहु रंगाई ॥ तत्त्व मथो तुम अंश हमारा । तत्त्वसे उतरो भवजल पारा ॥

धर्मदास उवाच

कह्यो तत्त्व तुम मथो बनाई । ज्ञानी तुमहि कहो समझाई ॥ कहवा आहि तत्त्व को बासा । सो ज्ञानी मोहि कहो प्रकाशा ॥

सतगुरु बचन

दहिनस्वर साधि चढ़ो आकाशा । त्रिकुटी मध्य तत्त्वका वासा ॥ त्रिकुटीमध्य तत्त्व जो रहाई । तहाँ सुरति सो देखो जाई ॥ त्रिकुटी मध्य तत्त्वको थाना तेहि मथि आगे देहु पयाना ॥

( १७६ )

बोधसागर

सुरति डोरी चलै बरजहेरा । मथिके तत्त्व कपाट उघेरा ॥ तेहि आगे सुमेरु बखानी । बरनो द्वार स्वरूप खानी ॥ वाहि द्वार होय सुरति चढ़ाओ। आगे अगम भेद पुनि पाओ ॥ त्रिकुटी आगे सुमेरु ठेकाना । तापर जुब्बा अकाश विधाना ॥ आंगुलचारी अकाश परमानो । धर्मदास तुम निजकर जानो ॥

धर्मदास वचन

अब अकाशका भाखों राहा । हम अजानका जानों थाहा ॥

सद्गुरु वचन

अब अकाशका भाखूं लेखा । सुरतिकमल तहैं निजकर देखा ॥ बांये धर्मराय अस्थाना । दहिने सुरति द्वार ठिकाना ॥ सुरति कमल सुमेरुके आगे । बिहैगम डोर तहाँसे लागे ॥ सुरति कमलके रूप बखानो । एक चन्द्र आभा अनुमानो ॥ वाहि कमलमें झलकै चंदा । सुरति चढ़ाय तुम करो आनन्ददा ॥ तहवां डोर शब्दकी भाई । सुरति संयोग चढ़ि देखो जाई ॥ सुरति नाल है बड़ बरियारा । मध्य लिलाट धर्म रखवारा ॥ शब्द काहे न करहु विचारा । धर्मदास तुम अंश हमारा ॥ दहिने सुरति कमल कहैं पावा । तेहि आगे पुनि ध्यान लगावा ॥ तेहिदिगसुरतिकमलको लेखा । सुरति तत्त्व नैन बिन देखा ॥ ताकर भेद मैं देऊँ बताई । सुइ परमाण द्वार निरमाई ॥ धर्मदास मैं कहूँ पुकारी । तिल परमाण तहैं खुलै केवारी ॥ तेहि केवार दोय है घाटा । चढ़े सुरति तब पावो बाटा ॥ सोहैं सुरतिले चढो संभारी । तिल परमाण खुलै केवारी ॥ नासिकानाल सुरति जो ध्यावे । खोली केवारी तब बाहर आवे ॥ पशुरी सुरति कमलको जानी । तासे सुरति करो पहिचानी ॥

साखी-सतगुरु भेद बतावई, तब पावे यह द्वार । कहैं कबीर धर्मदाससो, निश्चय वचन हमार ॥

कायापांजी

( १७७ )

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास चरनन चितलावा । अगमागम तुम मोहि बुलावा ॥ आगे गम्य मोहि देहु लखाई । अब मैं गहों सुरति बनाई ॥ यह तो ठीक चिन्हैउ मैं भाई । तुम परताप गम्य हम पाई ॥ अब आगेकर कहो बखाना । जहाँ मूलशब्दका पावों ध्याना ॥ जेहिते शब्दमें जाय समाई । तवन गम्य मोहि देहु लखाई ॥ भाषो मूल जाओ बलिहारी । मूलशब्द पुनि गहों सम्हारी ॥ सुरति कमल गम तुम भाखो । सुरति सम्हार अपने चितराखो ॥ सुरति कमल सुनब मैं साहेब । विहंगम डोरि गही चितलायब ॥ अब आगेका भाषो राहा । हम अजान का जानो थाहा ॥ तुम्हरे जनाय हम जानब भाई । तुम जानो सो करो बनाई ॥

साखी-समरत्थ आगे भाषो, मैकहू सुरति सम्हार । सकल पसारा मेटिके, उत्तह भवजल पार ॥ सतगुरु तब दया भई, पावों पद निर्वान । आगे गम्य बतावहु, सतगुरु वचन परमान ॥

सद्गुरु वचन-चौपाई

सुरति कमलके आगे भाखों । तुमसे गोप कछू नहीं राखों ॥ सुरति कमलहोय निकसो भाई । विहंगम डोरि गहो चितलाई ॥ विहंगम डोर दहिने दिशि जाई । तुमसों भेद कहौ समझाई ॥ सुरति कमलके कहों ठिकाना । आगे है योजन परमाना ॥ अक्षय वृक्ष तहाँ लागा भाई । दवना मरुआ बरनि न जाई ॥ बेलि चमेली बास सुबासा । बास सुबास किया प्रकाशा ॥

साखी-दवना मरुआ गुलाब है, गुलाब चमेली बास । तहवां अक्षय वृक्ष है, वरणों वास सुबास ॥