भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 832 में से

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पृष्ठ 431
  • श्वेताश्वतरोपनिषद् * ४०३

सम्पन्न हैं, संसारमें जितने भी शुभ गुण देखनेमें आते हैं, वे उन दिव्य गुणोंके किसी एक अंशकी झलक हैं। वे समस्त जीवोंको, उनके कर्मोंको और अनन्त ब्रह्माण्डोंके भीतर तीनों कालोंमें घटित होनेवाली छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी घटना- को भलीभाँति जानते हैं। वे प्रकृति और जीव समुदायके (अपनी अपरा और परा—दोनों प्रकृतियोंके) स्वामी हैं, तथा कार्य-कारणरूपमें स्थित सत्त्व आदि तीनों गुणोंका यथायोग्य नियन्त्रण करते हैं। वे ही इस जन्म मृत्युरूप संसार-चक्रमें जीवोंको उनके कर्मानुसार बाँधकर रखते, उनका पालन पोषण करते और इस बन्धनसे जीवोंको मुक्त भी करते हैं। उनकी कृपासे ही जीव मुक्तिके साधनमे लगकर साधनके परिपक्व होनेपर मुक्त होते हैं ॥ १६ ॥ स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता। य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ सः हि=वही, तन्मयः=तन्मय, अमृतः=अमृतरूप, ईशसंस्थः=ईश्वरों (लोकपालों) मे भी आत्मरूपसे स्थित, ज्ञः=सर्वज्ञ, सर्वगः=सर्वत्र परिपूर्ण, (और) अस्य=इस, भुवनस्य=ब्रह्माण्डका, गोप्ता=रक्षक है, यः=जो, अस्य= इस, जगतः=सम्पूर्ण जगत्‌का; नित्यम्=सदा, एव=ही, ईशे=शासन करता है, (क्योंकि) ईशनाय=इस जगत्‌पर शासन करनेके लिये, अन्यः=दूसरा कोई भी, हेतुः=हेतु, न=नहीं, विद्यते=है ॥ १७ ॥ व्याख्या—जिनके स्वरूपका पूर्वमन्त्रमे वर्णन हुआ है, वे परब्रह्म परमेश्वर ही तन्मय—स्व-स्वरूपमें स्थित, अमृत- स्वरूप—एकरस हैं; इस जगत्‌के उत्पत्ति-विनाशरूप परिवर्तनसे उनका परिवर्तन नहीं होता। वे समस्त ईश्वरोंमें—समस्त लोकोंका पालन करनेके लिये नियुक्त किये हुए लोकपालोंमें भी अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं। वे सर्वज्ञ, सर्वत्र परिपूर्ण परमेश्वर ही इस समस्त ब्रह्माण्डकी रक्षा करते हैं, वे ही इस सम्पूर्ण जगत्‌का सदा यथायोग्य नियन्त्रण और सञ्चालन करते हैं। दूसरा कोई भी इस जगत्‌पर शासन करनेके लिये उपयुक्त हेतु नहीं प्रतीत होता, क्योंकि दूसरा कोई भी सबपर शासन करनेमें समर्थ नहीं है ॥ १७ ॥ सम्बन्ध—उपर्युक्त परमेश्वरको जानने और पानेके किये साधनके रूपमें उन्हींकी शरण लेनेका प्रकार बताया जाता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ यः=जो परमेश्वर, वै=निश्चय ही, पूर्वम्=सबसे पहले; ब्रह्माणम्=ब्रह्माको, विदधाति=उत्पन्न करता है, च=और, यः=जो, वै=निश्चय ही, तस्मै=उस ब्रह्माको, वेदान्=समस्त वेदोंका ज्ञान, प्रहिणोति=प्रदान करता है; तम् आत्मबुद्धिप्रकाशम्=उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले, ह देवम्=प्रसिद्ध देव परमेश्वरको, अहम्=मैं, मुमुक्षुः=मोक्षकी इच्छावाला साधक, शरणम्=शरणरूपमे, प्रपद्ये=ग्रहण करता हूँ ॥ १८ ॥ व्याख्या—उन परमेश्वरको प्राप्त करनेका सार्वभौम एव सुगम उपाय सर्वतोभावसे उन्हींपर निर्भर होकर उन्हींकी शरणमें चले जाना है। अतः साधकको मनके द्वारा नीचे लिखे भावका चिन्तन करते हुए परमात्माकी शरणमें जाना चाहिये । जो परमेश्वर निश्चय ही सबसे पहले अपने नाभि कमलमेसे ब्रह्माको उत्पन्न करते हैं, उत्पन्न करके उन्हें निःसन्देह समस्त वेदोंका ज्ञान प्रदान करते हैं तथा जो अपने स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपने भक्तोंके हृदयमे तदनुरूप विशुद्ध बुद्धिको प्रकट करते हैं (गीता १०। १०), उन पूर्वमन्त्रोंमें वर्णित सर्वशक्तिमान् प्रसिद्ध देव परब्रह्म पुरुषोत्तमकी मै मोक्षकी अभिलाषासे युक्त होकर शरण ग्रहण करता हूँ—वे ही मुझे इस संसार-बन्धनसे छुड़ायें ॥ १८ ॥ निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम् । अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥ निष्कलम्=कलाओंसे रहित, निष्क्रियम्=क्रियारहित, शान्तम्=सर्वथा शान्त, निरवद्यम्=निर्दोष; निरञ्जनम्=निर्मल, अमृतस्य=अमृतके, परम्=परम; सेतुम्=सेतुरूप, (तथा) दग्धेन्धनम्=जले हुए ईंधनसे युक्त, अनलम् इव=अग्निकी भाँति (निर्मल ज्योतिःस्वरूप उन परमात्माका मैं चिन्तन करता हूँ ) ॥ १९ ॥

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