कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 463, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ पञ्चम अध्याय प्रथम खण्ड प्राणकी सर्वश्रेष्ठता जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो कोई वसिष्ठको जानता है, वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है, निश्चय वाक् ही वसिष्ठ है । जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है, चक्षु ही प्रतिष्ठा है। जो कोई समृद्धिको जानता है, उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही समृद्धि है। जो आयतनको जानता है, वह स्वजातीयोंका आयतन—आश्रय होता है। निश्चय मन ही आयतन है ॥ १-५ ॥ एक बार प्राण ( इन्द्रियाँ ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे । उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे, वही तुममें श्रेष्ठ है।' तब वाक्-इन्द्रियने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा— 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार गूँगेलोग बिना बोले प्राणसे प्राणनक्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर वाक्- इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया । फिर चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा— 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार अन्धेलोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर चक्षु- ने प्रवेश किया । तदनन्तर श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया । तत्पश्चात् मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' यह सुनकर मनने भी प्रवेश किया। फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेके कीलोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा— 'भगवन् ! आप [ हमारे स्वामी ] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ ६-१२ ॥ फिर उससे वाक्-इन्द्रियने कहा—'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो ।' फिर उससे श्रोत्रने कहा— 'मैं जो समृद्धि हूँ सो तुम्हीं समृद्धि हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला—'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं आयतन हो।' [ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं, परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण- ही हैं ॥ १३-१५ ॥ द्वितीय खण्ड महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थोपासना उसने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' तब वागादिने कहा—'कुत्तों और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोका यह जो कुछ अन्न है [ सब तुम्हारा अन्न है ]'; सो यह सब अन ( प्राण ) का अन्न है । 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष नाम है । इस प्रकार जाननेवालेके लिये भी कुछ अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होता है । उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले— 'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं। ऐसा करनेसे वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ १-२ ॥ उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जावालने वैयाघ्रपद्य गो-श्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे सूखे ठूँठके प्रति कहे तो उसमे शाखा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फूट आयेंगे' ॥ ३ ॥ अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे.