कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 529, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ४]
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
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[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]
स्पर्श कर सकता है, अन्य अन्यको जान सकता है । परंतु जैसे जलमें वैसे ही सुषुप्तिमें एक अद्वैत द्रष्टा है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने जनकको उपदेश दिया । 'यह इस ( पुरुष ) की परमगति है, यह इसकी परम सम्पत्ति है, यह इसका परमलोक है, यह इसका परमानन्द है । इस आनन्दकी मात्राके आश्रित ही अन्य प्राणी जीवन धारण करते हैं ॥ ३१-३२ ॥
वह जो मनुष्योंमें सब अङ्गोंसे पूर्ण समृद्ध, दूसरोंका अधिपति और मनुष्यसम्बन्धी सम्पूर्ण भोगसामग्रियोंद्वारा सबसे अधिक सम्पन्न होता है, वह मनुष्योंका परम आनन्द है। अब जो मनुष्योंके सौ आनन्द हैं, वह पितृलोकको जीतनेवाले पितृगणका एक आनन्द है। और जो पितृलोकको जीतनेवाले पितरोंके सौ आनन्द हैं, वह गन्धर्वलोकका एक आनन्द है । तथा जो गन्धर्वलोकके सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेवोंका, जो कि कर्मके द्वारा देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है। जो कर्मदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह आजान ( जन्मसिद्ध ) देवोंका एक आनन्द है, और जो निष्पाप, निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो आजानदेवोंके सौ आनन्द हैं, वह प्रजापति-लोकका एक आनन्द है; और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ]। जो प्रजापतिलोकके सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मलोकका एक आनन्द है, और जो निष्पाप निष्काम श्रोत्रिय है [ उसका भी वह आनन्द है ] तथा यही परम आनन्द है । हे सम्राट् ! यह ब्रह्मलोक है'—ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा । [ जनक बोले-] 'मैं श्रीमान्को सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ, अब आगे भी आप मोक्षके लिये ही उपदेश करें।' यह सुनकर याज्ञवल्क्यजी डर गये कि इस बुद्धिमान् राजाने तो
[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का ऊपरी भाग]
मुझे सम्पूर्ण प्रश्नोंके निर्णयपर्यन्त [ उत्तर देनेको ] बाँध लिया ॥३३॥
वह यह पुरुष इस स्वप्नान्तमें रमण और विहार करके तथा पुण्य और पापको देखकर ही पुनः गये हुए मार्गसे ही यथास्थान जागरित-अवस्थाको ही लौट आता है ॥ ३४ ॥
लोकमे जिस प्रकार बहुत अधिक बोझ लदा हुआ छकड़ा शब्द करता हुआ चलता है, उसी प्रकार यह देही आत्मा प्राज्ञात्मासे अधिष्ठित [हो मरण कालमे] शब्द करता हुआ जाता है, जब कि यह ऊपरके श्वास छोड़नेवाला हो जाता है । वह यह देह जिस समय कृशताको प्राप्त होता है, वृद्धावस्था अथवा ज्वरादि रोगके कारण कृश हो जाता है, उस समय जैसे आम, गूलर अथवा पिप्पल फल बन्धन (डंठल) से छूट जाता है, वैसे ही यह पुरुष इन अङ्गोंसे छूटकर, फिर जिस मार्गसे आया था, उसीसे प्रत्येक योनिमें प्राणकी विशेष अभिव्यक्तिके लिये ही चला जाता है ॥ ३५-३६ ॥
अतः जिस प्रकार आते हुए राजाकी उग्रकर्मा एव पापकर्म-में नियुक्त सूत और गाँवके नेतालोग अन्न, पान और निवासस्थान तैयार रखकर 'ये आये, ये आये' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं, उसी प्रकार इस कर्मफलवेत्ताकी सम्पूर्ण भूत 'यह ब्रह्म आता है, यह आता है' इस प्रकार कहते हुए प्रतीक्षा करते हैं ॥ ३७ ॥
जिस प्रकार जानेके लिये तैयार हुए राजाके अभिमुख होकर उग्रकर्मा और पापकर्ममें नियुक्त सूत एवं गाँवके नेतालोग जाते हैं, उसी प्रकार जब यह ऊपरके श्वास लेने लगता है तो अन्तकालमें सारे प्राण इस आत्माके अभिमुख होकर इसके साथ जाते हैं ॥ ३८ ॥
चतुर्थ ब्राह्मण कामना-नाशसे ब्रह्म-प्राप्ति
[बायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]
वह यह आत्मा जिस समय दुर्बलताको प्राप्त हो मानो सम्मोहित हो जाता है, तब ये वागादि प्राण इसके प्रति अभिमुखतासे आते हैं। वह इन [ प्राणोंकी ] तेजोमात्राको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करके हृदयमें ही अनुक्रान्त (अभिव्यक्त ज्ञानवान् ) होता है। जिस समय यह चाक्षुष पुरुष सब ओरसे व्यावृत्त होता है, उस समय मुमूर्षु रूपज्ञानहीन हो जाता है ॥ १ ॥
[ चक्षु-इन्द्रिय लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो लोग 'नहीं देखता' ऐसा कहते हैं; [ घ्राणेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सूँघता' ऐसा कहते हैं, [ रसनेन्द्रिय ] एक-
[दायाँ स्तम्भ - पृष्ठ का निचला भाग]
रूप हो जाती है तो 'नहीं चखता' ऐसा कहते हैं, [ वागिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं बोलता' ऐसा कहते हैं, [ श्रोत्रेन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं सुनता' ऐसा कहते हैं, [ मन ] एकरूप हो जाता है तो 'मनन नहीं करता' ऐसा कहते हैं, [ त्वगिन्द्रिय ] एकरूप हो जाती है तो 'स्पर्श नहीं करता' ऐसा कहते हैं, और यदि [ बुद्धि लिङ्गात्मासे ] एकरूप हो जाती है तो 'नहीं जानता' ऐसा कहते हैं । उस इस हृदयका अग्र ( बाहर जानेका मार्ग ) अत्यन्त प्रकाशित होने लगता है, उसीसे यह आत्मा नेत्रसे, मूर्द्धासे अथवा शरीरके किसी अन्य