कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 575, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३५
को प्रकाशित करनेवाली धनुर्मयी मुद्रा धारण करके वे सच्चिदा- नन्दमय परमेश्वर व्याख्यानकी मुद्रामें स्थित हैं ॥ ७८॥
(इस प्रकार देवताओंकी स्तुतिसे लेकर श्रीरामके राज्याभिषेकतककी लीलाका सङ्क्षेपसे वर्णन करके अब पुनः पूर्वोक्त षट्कोणका अनुसरण करके आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका वर्णन किया जाता है—)
श्रीरामचन्द्रजीके उत्तर और दक्षिणभागमे क्रमशः शत्रुघ्न और भरतजी स्थित हैं । हनुमान्जी श्रोताके रूपमें भगवान्के सम्मुख हाथ जोड़कर खड़े हैं। वे भी त्रिकोणके भीतर ही स्थित हैं । भरतके नीचे सुग्रीव हैं और शत्रुघ्नके नीचे विभीषण खड़े हैं। भगवान्के पीछेकी ओर छत्र-चँवर धारण किये लक्ष्मणजी विराजमान हैं।* लक्ष्मणजी-से नीचे स्तरमें ताड़के पंखे हाथमें लिये हुए दोनों भाई भरत-शत्रुघ्न खड़े हैं । इस प्रकार लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्नको लेकर दूसरा त्रिकोण और बन जाता है। इस तरह छः कोण होते हैं। भगवान् श्रीराम पहले तो अपने बीज-मन्त्रस्वरूप दीर्घ अक्षरोंके ही आवरणसे घिरे हुए हैं। (वह प्रथम आवरण इस प्रकार है—'रां', 'रीं', 'रूं', 'रै', 'रौं', 'रः' ) ॥ ९–११ ॥
द्वितीय आवरण यों है—वासुदेव, शान्ति, सङ्कर्षण, श्री, प्रद्युम्न, सरस्वती, अनिरुद्ध और रति । ये क्रमशः भगवान्के आग्नेय आदि दिशाओंमें स्थित हैं । द्वितीय आवरणमें भगवान् इन सबसे संयुक्त रहते हैं। तृतीय आवरणमें हनुमान्, सुग्रीव, भरत, विभीषण, लक्ष्मण, अङ्गद तथा जाम्बवान् और शत्रुघ्नकी गणना है। अर्थात् इन सबसे जब श्रीरघुनाथजी संयुक्त होते हैं, तब तृतीय आवरण सिद्ध होता है । इनके अतिरिक्त धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्रसे आवृत होनेपर भी तृतीय आवरण ही रहता है। इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण, वायु, चन्द्रमा, ईशान, ब्रह्मा और अनन्त—इन दस दिक्पालोंसे जब भगवान् आवृत होते हैं, तब चतुर्थ आवरण होता है। (इनमें इन्द्र पूर्वके, अग्नि अग्निकोणके, यम दक्षिणके, निर्ऋति नैर्ऋत्यकोणके, वरुण पश्चिमके, वायु वायव्यकोणके, चन्द्रमा उत्तरके और ईशान—शिव ईशानकोणके अधिपति हैं। इन सबकी अपनी-अपनी दिशामें पूजा करनी चाहिये । ब्रह्माका स्थान पूर्व दिशा और ईशानकोणके मध्यभागमें है तथा अनन्तका स्थान नैर्ऋत्यकोण और पश्चिमके मध्यभागमें है । इन्द्र आदिके बीज-मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—लं रं मं क्षं वं यं सं हं आं नं) इन दिक्पालोंके बाह्य भागमे उनके ही वज्र आदि आयुध हैं, जिनसे आवृत्त भगवान् पूजनीय होते हैं । (उन आयुधोंके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं—इन्द्रका वज्र, अग्निका शक्ति, यमका दण्ड, निर्ऋतिका खड्ग, वरुणका पाश, वायुका अङ्कुश, चन्द्रमाका गदा, ईशानका शूल, ब्रह्माका पद्म और अनन्तका चक्र । ) उसी आवरणमे नल आदि वानर भी भगवान्की शोभा बढाते हैं। साथ ही वसिष्ठ-वामदेव आदि मुनि भगवान्की उपासनामें संलग्न रहते हैं ॥ १२–१६ ॥
१ धनुर्मयी मुद्रा इस प्रकार है—
वामस्य मध्यमाग्रं तु तर्जन्यग्रे नियोजयेत् । अनामिकां कनिष्ठां च तस्याङ्गुष्ठेन पीडयेत् । दर्शयेद् वामके स्कन्धे धनुर्मुद्रेयमीरिता ॥
बायें हाथकी मध्यमा अङ्गुलिके अग्रभागको तर्जनीके अग्रभागमें सटा दे और अनामिका तथा कनिष्ठिकाको अँगूठेसे दबाये। इस प्रकारकी भङ्गी बायें कंधेपर प्रदर्शित करें । यही धनुर्मुद्रा बतायी गयी है।
२ व्याख्यानमुद्राका लक्षण यों है—
दक्षिणाङ्गुष्ठतर्जन्यावग्रलग्ने पराङ्गुली । प्रसार्य संहतोत्ताना एषा व्याख्यानमुद्रिका ॥ रामस्य च सरस्वत्या अत्यन्त प्रेयसी मता । ज्ञानव्याख्या पुस्तकानां युगपत्सम्भवः स्मृतः ॥
दाहिने हाथके अँगूठे और तर्जनी अङ्गुलिके अग्रभाग परस्पर सटे हों और शेष तीन अङ्गुलियोंको फैलाकर रक्खा जाय । वे फैली अङ्गुलियाँ भी परस्पर सटी हुई और उत्तान हों । यह व्याख्यान-मुद्रा है । यह श्रीरामको और सरस्वतीको बहुत अधिक प्रिय है । इसके द्वारा ज्ञान, व्याख्यान तथा पुस्तक—तीनों मुद्राओंका एक साथ प्रकाशन माना गया है।
* पहले लक्ष्मणको भगवान्के दक्षिण भागमें स्थित बता आये हैं और यहाँ पश्चिमभागमें उनकी स्थिति बतायी जाती है, परंतु इसमें विरोध नहीं है। वहाँ वनवासके समयका ध्यान है, अत उसमें भरत आदिकी उपस्थिति नहीं है। यहाँ राज्याभिषेकके समय भरतजी भी हैं, अत उस समय लक्ष्मणजीका पृष्ठभागमें स्थित होना उचित ही है।