कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 653, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६०५ जब राजा जनकने इस प्रकार श्रीशुकदेवजीके स्वभावकी परीक्षा कर ली, तब उन्हे पास बुलाया और प्रसन्नचित्त देखकर उन्हें प्रणाम किया। उनका स्वागत करते हुए राजाने कहा—'आपने अपने सांसारिक कृत्योंको नि शेष कर दिया है, आपको सारे मनोरथ प्राप्त हैं ऐसी स्थितिमें आपकी क्या अभिलाषा है ?' श्रीशुकदेव मुनि बोले—'गुरुवर ! मुझे शीघ्र और ठीक ठीक बतलाइये कि यह जागतिक प्रपञ्च कैसे उत्पन्न होता है और किस प्रकार विलीन होता है ?' महात्मा जनकने श्रीशुकदेवजीसे सारी बातें यथावत् बतलायीं, उन्हीं बातोंको उनके परम ज्ञानी पिता पहले ही बतला चुके थे। (इसपर शुकदेवजीने कहा—) 'मैने स्वय ही विशेषरूपसे इसे जाना था, पूछनेपर मेरे पिताजीने भी यही बाते मुझको बतलायीं। ज्ञानिश्रेष्ठ ! आपने भी यही बात बतलायी और यही विषय शास्त्रोंमें भी दिखलायी देता है। मनके विकल्पसे प्रपञ्च उत्पन्न होता है और उस विकल्पके नाश होनेपर इसका नाश हो जाता है। निन्दनीय संसार निःसार है, यह निश्चित है। तब हे महाभाग ! यह है क्या वस्तु ? मुझे सत्य बात बतलाइये। जगत्के सम्बन्धमें भ्रान्त हुआ मेरा चित्त आपके द्वारा ही शान्तिको प्राप्त कर सकता है' ॥ २८-३५ ॥ राजा जनकने कहा—'शुकदेवजी ! तुम सुनो, मै सारे ज्ञान विस्तारको कहता हूँ—जो समस्त ज्ञानका सार तथा रहस्यों- का भी रहस्य है, एव जिसके जाननेसे पुरुष शीघ्र ही मुक्तिको प्राप्त हो जाता है। दृश्य जगत् है ही नहीं—यह बोध हो जानेपर मनकी दृश्य विषयसे परिशुद्धि हो जाती है। जब यह बोध परिपक्व हो जाता है, तब उससे निर्वाणरूपी परमा शान्ति प्राप्त होती है। वासनाओका जो निःशेष परित्याग होता है, वही श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्ध अवस्थाको साधुजनोंने मोक्ष कहा है। पुन., जो शुद्ध वासनाओसे युक्त हैं तथा जिनका जीवन अनर्थोसे शून्य है एव जिन्हें ज्ञेयतत्त्व ज्ञात है, महाबुद्धि- मान् शुकदेवजी ! वे पुरुष जीवन्मुक्त कहलाते हैं। पदार्थ- भावनाकी दृढता ही बन्ध कहलाती है और ब्रह्मन् ! वासनाओं- की क्षीणताको ही मोक्ष कहा जाता है ॥ ३६-४१ ॥ 'बिना तप.साधन आदिके, स्वभावत. ही जिसे जगत्के भोग अच्छे नहीं लगते, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। यथासमय प्राप्त होनेवाले सुखों और दु खोंमें अनासक्त हुआ जो न प्रसन्न होता है और न दुःखी होता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। हर्ष, अमर्ष (उद्वेग), भय, क्रोध, काम और कार्पण्य(शोक)की दृष्टिसे जिसका अन्तःकरण अछूता रहता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहङ्कारमयी वासनाको सहज ही त्याग करके स्थित होता है, वह चित्तावलम्बनका सम्यक् त्याग करनेवाला जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसकी दृष्टि सदा अन्तर्मुखी रहती है, जिसको न किसी पदार्थकी आकाङ्क्षा होती है और न उपेक्षा, जो सुषुप्तिके समान स्थितिमे विचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदा आत्मामे रत है, जिसका मन पूर्ण और पवित्र है, परमश्रेष्ठ शान्त अवस्थाको प्राप्त कर जो ससारमे किसी वस्तुकी इच्छा नहीं करता, जो किसीके प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन विचरण करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदयाकाश सवेद्य पदार्थोंके द्वारा तनिक भी लिपायमान नहीं होता, तथा चेतन संवित् ही जिसका स्वरूप है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। राग द्वेष, सुख-दुःख, धर्माधर्म, फलाफलकी अपेक्षा न करके जो काम करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहम्भावको छोड़कर, मान और मत्सर त्यागकर, निरुद्वेग और सङ्कल्पहीन होकर कार्य करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सर्वत्र स्नेहरहित होकर साक्षीके समान अवस्थित रहता है, तथा बिना किसी इच्छाके कर्तव्यमें लगा रहता है, वह जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म और अधर्मको, जगत्के चिन्तनको तथा सारी इच्छाओंको अन्तःकरणसे परित्याग कर दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। यह सारा दृश्य प्रपञ्च, जो देखनेमे आता है—इसको जिसने भलीभाँति त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। चरपरे, खट्टे, नमकीन, कड़वे, स्वादिष्ट तथा स्वादहीनको जो एक समान समझकर खाता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। बुढापा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य और दारिद्र्य—सबको रम्य मानकर जो उपभोग करता है, वह जीवन्मुक्त है। धर्म और अधर्म, सुख-दुःख, तथा जन्म और मरण—इनको जिसने हृदयसे पूर्णतः त्याग दिया है, वह जीवन्मुक्त है। जो समत्वपूर्ण तथा स्वच्छ बुद्धिसे, उद्वेग और आनन्दसे रहित होकर न शोक करता है न उत्साहित होता है, वह जीवन्मुक्त है। सारी इच्छाओ, सारी शङ्काओं, सारी कामनाओं और सारे निश्चयोंका जिसने मनसे परित्याग कर दिया है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जन्म, स्थिति और विनाशमें, उच्चतितथा अवनतिमें—सदा जिसका मन एक समान रहता है, वह जीवन्मुक्त है। जो न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है, जो प्रारब्धप्राप्त भोगोंका उपभोग करता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने ससारका चिन्तन छोड़ दिया है, जो कलावान् होकर