भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 668, कुल 832 में से

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पृष्ठ 668

ॐ षष्ठ अध्याय ऋभुका उपदेश चालू 'अन्तरकी आकाररूप एव भावनामय भावोकी सम्पत्तिका त्याग करके, हे निष्पाप ! तुम जो हो, उसी स्थितिमें इस जगत्में सुखसे विचरण करो । 'मै सर्वत्र अकर्ता हूँ'—इस भावनाकी दृढतासे वह परम अमृता नामकी समता ही शेष रहती है । खेद तथा उल्लासके विलास अपने ही किये हुए हैं—इस भावनामे अपने सङ्कल्पके क्षीण होनेपर समता ही अवशिष्ट रह जाती है। समस्त पदार्थोंमें समताकी जो सत्यनिष्ठ स्थिति है, उसमें चित्तके भलीभाँति स्थित होनेपर वह पुनः आवागमनका कारण नहीं बनता। अथवा मुनि ! समस्त कर्तृत्व तथा अकर्तृत्वका त्याग करके, मनको पीकर, तुम जो हो, उसी स्थितिमें स्थिर हो जाओ। अन्तमें समाधिस्थ होकर जिससे तुम त्याग करते हो, उसका भी त्याग कर दो । चेतनने ही मन. सकल्पका आकार धारण कर रक्खा है तथा यही प्रकाश एव अन्धकार बना हुआ है। अतः वासना करनेवालेका प्राणस्पन्दनके साथ साथ समूल त्याग करके आकाशके समान निर्लेप एवं प्रशान्तचित्त हो जाओ। हृदयसे सारी वासनाओंका त्याग करके जो निराकुल होकर रहता है, वह मुक्त है, वह परमेश्वर है । उसने दसो दिशाओंमे भ्रान्तिके वश होकर घूमते हुए समस्त द्रष्टव्य पदार्थोंको देख लिया। युक्तिपूर्वक आचरण करनेवाले ज्ञानी पुरुषके लिये यह ससार गोष्पदके समान सहज ही तरनेयोग्य हो जाता है । शरीरके बाहर तथा भीतर, नीचे-ऊपर तथा दिशाओंमे—इधर-उधर, सर्वत्र आत्मा ही आत्मा है। उसके लिये जगत् अनात्ममय नहीं होता॥१-१०॥ 'वह स्थान नहीं है, जहाँ मैं नहीं हूँ, और वह वस्तु नहीं है, जो आत्ममय न हो । मैं दूसरी किस वस्तुकी इच्छा करूँ, सब कुछ सत् और चिन्मय होकर व्याप्त है। यह सब कुछ निश्चयपूर्वक ब्रह्म ही है, यह सब आत्मा ही व्याप्त हो रहा है । हे निष्पाप ! मैं और हूँ, यह और है—इस प्रकार- की भ्रान्तिको छोड़ दो । व्यापी और नित्य घनब्रह्ममे कल्पित भावोंकी सम्भावना नहीं है। इसमें न शोक है न मोह है, न जरा है न जन्म है । जो आत्मतत्त्वमें है, वही है, अतएव सर्वदा सर्वत्र किसी वस्तुकी इच्छा न करते हुए तथा जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीको अनासक्त होकर भोगते हुए सन्ताप- हीन होकर रहो । त्याग और ग्रहणका परित्याग करके सर्वदा विगतज्वर होकर रहो। हे महामतिमान्! जिसका यह अन्तिम जन्म है, उसमे शीघ्र ही, वगमे श्रेष्ठ मुक्ताके समान, निर्मल विद्या प्रवेश करती है । विरक्त चित्तवालोंकी, सम्यक्रूपमे, स्वानुभूतिसे प्रकट की गयी यह बात है कि द्रष्टाको दृश्यके सम्बन्धसे जो निश्चयात्मिका आनन्द-प्रतीति होती है, उस अपने आत्मतत्त्वसे उत्पन्न स्पन्दनकी हम सम्यक् रीतिसे उपासना करते हैं। वासनाओंके साथ द्रष्टा, दृश्य और दर्शन—इन तीनोका त्याग करके साक्षात्कारके रूपमे भासमान आत्माकी हम सम्यक् उपासना करते हैं । 'अस्ति और नास्ति—इन दोनो पक्षोंके बीचमे स्थित, प्रकाशोको भी प्रकाशित करनेवाले, शाश्वत आत्माकी हम सम्यक् उपासना करते हैं। अपने हृदयमे स्थित महेश्वरको छोड़कर जो अन्य वस्तुकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करते है, वे अपने हाथमे स्थित कौस्तुभ- मणिका त्याग करके दूसरे रत्नकी इच्छा करते हैं। इन इन्द्रियरूपी शत्रुओंको—चाहे ये उठे हुए हों या न हों— बारबार विवेकरूपी दण्डसे उसी प्रकार मारना चाहिये, जैसे इन्द्र वज्रसे पहाड़ोंको मार गिराते है ॥ ११-२१ ॥ 'ससाररूपी रात्रिके दुःस्वप्नरूप एव सर्वथा शून्य इस देहमय भ्रममे जो कुछ प्रपञ्चका प्रसार देखा, सब ही अपवित्र देखा। बाल्यजीवनमे अज्ञानसे आबद्ध रहा, यौवनमें वनिताद्वारा मारा गया, अब अन्तमे यह नराधम स्त्री-पुत्रकी चिन्तामें दुखी होकर क्या कर सकता है । सत्के सिरपर असत् स्थित है। रमणीय भावोंके ऊपर अरमणीयता सवार है। सुखोंके सिर- पर दुःख स्थित है । मे किस एकका आश्रय लूँ ? जिनके निमेष और उन्मेषसे जगत्का सहार और सृष्टि होती है, इस प्रकारके पुरुष भी जब कालके गालमे चले जाते हैं, तब मुझ-जैसों- की तो गणना ही क्या है । ससार ही दुःखोंकी अन्तिम सीमा कही गयी है, उसमे शरीरके पड़े रहनेपर सुखास्वादन कैसे हो सकता है ? मैं जाग गया हूँ, मै जाग गया हूँ । मेरी आत्माको चुरानेवाला दुष्ट चोर यह मन ही है । मनने मुझको चिरकाल- से चुरा लिया है। मैं इसको मार डालूँगा । हेय पदार्थोंके लिये खेद न करो, उपादेय पदार्थोंमें अनुरक्त मत होओ । हेय और उपादेयसम्बन्धी दृष्टिका त्यागकर शेषमे स्थित होकर सुस्थिर हो जाओ । ससारकी ओरसे निराशा, निर्भयता, नित्यता,