भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 672

६२४ * मुक्तिकोपनिषद् * [ अध्याय १ लोकोंमे नहीं जाता । जिसकी काशीक्षेत्रमें ब्रह्मनाल नामक प्रदेशके अन्तर्गत मृत्यु होती है, वह मेरे तारक-मन्त्रको प्राप्त करता है, और उसे वह मुक्ति मिलती है, जिससे उसे आवागमनमें नहीं आना पड़ता । काशीक्षेत्रमे चाहे कहीं भी मृत्यु हो, शङ्करजी प्राणीके दाहिने कानमे मेरे तारक-मन्त्रका उपदेश करते हैं, जिससे उसके सारे पापोंके समूह झड़ जाते हैं, तथा वह मेरे सारूप्यको—समान रूपको प्राप्त हो जाता है। वही सालोक्य-सारूप्य मुक्ति कहलाती है। जो द्विज सदाचार-रत होकर नित्य एकमात्र मेरा ध्यान करता है और मुझे सर्वात्मस्वरूप चिन्तन करता है, वह मेरे सामीप्यको प्राप्त होता है—सदा मेरे समीप निवास करता है। वही सालोक्य- सारूप्य सामीप्य मुक्ति कहलाती है। जब गुरुके द्वारा उपदिष्ट मार्गसे मेरे अव्यय, निर्विकार स्वरूपका ध्यान करता है, तब वह द्विज भ्रमरकीटके समान सम्यक् रूपसे मेरे सायुज्यको प्राप्त करता है। वही कल्याणमयी, ब्रह्मानन्दको प्रदान करने- वाली सायुज्य-मुक्ति है। मेरी उपासनासे जो चार प्रकारकी मुक्तियाँ होती हैं—सायुज्य, सारूप्य, सालोक्य एव कैवल्य, उनमें यह कैवल्यमुक्ति किस उपायका अवलम्बन करनेसे सिद्ध होती है, सो सुनो ॥ १७-२३ ॥ अकेली माण्डूक्योपनिषद् मुमुक्षुजनोंको मुक्ति प्रदान करनेमे समर्थ है। यदि उससे भी ज्ञानमे परिपक्वता न आये तो दस उपनिषदोंका पाठ करो। उससे ज्ञान प्राप्त करके शीघ्र ही मुझे अद्वैत धाम अर्थात् तेजके रूपमें प्राप्त करोगे। अञ्जनीकुमार ! यदि उससे भी ज्ञानकी दृढता न हो तो बत्तीस उपनिषदोंका सम्यक्रूपसे अभ्यास करके संसारसे निवृत्त हो जाओ। यदि विदेहमुक्त—शरीर छोड़नेके बाद मुक्त होना चाहते हो तो एक सौ आठ उपनिषदोंका पाठ करो। उन उपनिषदोंके नाम, क्रम और शान्तिपाठ यथार्थतः कहता हूँ, सुनो। ईश^१, केन^२, कठ^३, प्रश्न^४, मुण्डैक^५, माण्डूक्य^६, तैत्तिरीयं^७, ऐतयं^८, छान्दोग्यं^९, बृहदारण्यकं^१०, ब्रह्म^११, कैवल्य^१२, जाबाल^१३, श्वेताश्वतर^१४, हंस^१५, आरुणिक^१६, गर्भ^१७, नारायण^१८, परमहंस^१९, अमृतबिन्दु^२०, अमृतनाद^२१, अथर्वशिरस्^२२, अथर्वशिखा^२३, मैत्रायणी^२४, कौषीतकिब्राह्मण^२५, बृहज्जाबाल^२६, नृसिंहतापनीय^२७, कालाग्निरुद्र^२८, मैत्रेयी^२९, सुबाल^३०, क्षुरिका^३१, मन्त्रिका^३२, सर्वसार^३३, निरालम्ब^३४, शुकरहस्य^३५, वज्रसूचिका^३६, तेजोबिन्दु^३७, नादबिन्दु^३८, ध्यानबिन्दु^३९, ब्रह्मविद्या^४०, योगतत्त्व^४१, आत्मप्रबोध^४२, नारद- परिव्राजक^४३, त्रिशिखिबाह्मण^४४, सीता^४५, योगचूडामणि^४६, निर्वाण^४७, मण्डलब्राह्मण^४८, दक्षिणामूर्ति^४९, शरभ^५०, स्कन्द^५१, त्रिपाद्विभूति- महानारायण^५२, अद्वयतारक^५३, रामरहस्य^५४, रामतापनीय^५५, वासुदेव^५६, मुद्गल^५७, शाण्डिल्य^५८, पैङ्गल^५९, भिक्षुक^६०, महत्^६१, शारीरक^६२, योगशिखा^६३, तुरीयातीत^६४, संन्यास^६५, परमहंसपरिव्राजक^६६, अक्षमाला^६७, अव्यक्त^६८, एकाक्षर^६९, अन्नपूर्णा^७०, सूर्य^७१, अक्षि^७२, अध्यात्म^७३, कुण्डिका^७४, सावित्री^७५, आत्मा^७६, पाशुपत^७७, परब्रह्म^७८, अवधूत^७९, त्रिपुरातापनीय^८०, देवी^८१, त्रिपुरा^८२, कठरुद्र^८३, भावना^८४, रुद्रहृदय^८५, योगकुण्डली^८६, भस्मजाबाल^८७, रुद्राक्षजावाल^८८, गणपति^८९, जाबालदर्शन^९०, तारसार^९१, महावाक्य^९२, पञ्चब्रह्म^९३, प्राणाग्निहोत्र^९४, गोपालतापनीय^९५, कृष्ण^९६, याज्ञवल्क्य^९७, वराह^९८, शाट्यायनीय^९९, हयग्रीव^१००, दत्तात्रेय^१०१, गरुड^१०२, कलिसन्तरण^१०३, जाबालि^१०४, सौभाग्यलक्ष्मी^१०५, सरस्वतीतहस्य^१०६, बह्वृच^१०७ और मुक्तिकोपनिषद्^१०८ ॥ २४-३६ ॥ ये एक सौ आठ उपनिषदें मनुष्यके आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक—तीनों तापोंका नाश करती हैं। इनके पाठ और स्वाध्यायसे ज्ञान और वैराग्यकी प्राप्ति होती है तथा लोक वासना, शास्त्र-वासना एव देह-वासनारूप त्रिविध वासनाओंका नाश होता है। पूर्व और पश्चात् विहित प्रत्येक उपनिषद्की शान्तिका पाठ करते हुए, वेदविद्याविशारद, व्रतपरायण, स्नान किये हुए, स्वय आत्मतत्त्वोपदेष्टाके मुखसे— ग्रहण अर्थात् श्रवण करके जो द्विजश्रेष्ठ अष्टोत्तरशत उपनिषदोंका पाठ करते हैं, वे जबतक प्रारब्धकर्मोंका नाश नहीं हो जाता, तबतक जीवन्मुक्त बने रहते हैं। उसके पश्चात् कालक्रमसे जब प्रारब्धका नाश हो जाता है, तब वे मेरी विदेह-मुक्तिको प्राप्त करते हैं। समस्त उपनिषदोंके बीच एक सौ आठ उपनिषदें मारस्वरूप हैं। इनका एक बार भी श्रवण करनेसे सारे पापोंके समूह नष्ट हो जाते हैं। पवनकुमार ! तुम मेरे शिष्य हो, अतएव मैने तुम्हारे लिये इस शास्त्रका वर्णन किया है । मेरे द्वारा वर्णित यह अष्टोत्तरशत उपनिषद्रूप शास्त्र अत्यन्त गोपनीय है । ज्ञानसे, अज्ञानसे अथवा प्रसङ्गवश भी इनका पाठ करनेसे संसाररूप बन्धनसे मुक्ति मिल जाती है । जो तुमसे राज्य अथवा धन माँगे, उसे उसकी कामना-पूर्तिके लिये राज्य अथवा धन दे सकते हो; परन्तु इन एक सौ आठ उपनिषदोंको जिस-किसीको देना ठीक नहीं। निश्चय- पूर्वक जो नास्तिक हैं, कृतघ्न हैं, दुराचारी हैं, मेरी भक्तिसे मुँह मोड़े हुए हैं तथा शास्त्ररूप गड्ढोंमें गिरकर मोहित हो रहे हैं अर्थात् जो केवल शास्त्र-चर्चा में ही लगे हुए हैं, उन्हें तो कभी नहीं देना चाहिये । मारुति ! सेवापरायण शिष्यको, अनुकूल (आज्ञाकारी) पुत्रको अथवा जो कोई भी मेरा भक्त हो, अच्छे कुलमे उत्पन्न हो, सुशील और सद्बुद्धिसम्पन्न हो, उसे भलीभाँति परीक्षा करके अष्टोत्तरशत उपनिषदों-