भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 795

उपदेश ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३९

है। यदि रागवश अधिक वस्तुओंका संग्रह करता है तो वह मृत्युके पश्चात् रौरव नरकमें जाकर पुनः पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेता है। शीत आदिसे बचनेके लिये फटे-पुराने साफ कपड़ोंको सीकर एक गुदड़ी बना ले और बस्तीसे बाहर रहकर गेरुए रंगका वस्त्र धारण करे । संन्यासी एक ही वस्त्र धारण करे अथवा बिना वस्त्रके ही (दिगम्बर) रहे। दृष्टिको इधर-उधर चारों ओर न ले जाकर एक ही स्थानपर नियन्त्रित रक्खे। मनमें किसी भी वस्तुके लिये लोभ न आने दे । सदा अकेला ही विचरण करे । वर्षा ऋतुमें किसी एक ही स्थानपर निवास करे । कुटुम्ब, स्त्री-पुत्र, (व्याकरण आदि) वेदाङ्गोंके ग्रन्थ, यज्ञ और यज्ञोपवीतका त्याग करके संन्यासीको सर्वत्र गूढ भावसे (बिना अपना विज्ञापन किये) विचरण करना चाहिये ॥ २८-३२ ॥ 'काम, क्रोध, घमण्ड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उन सबका परित्याग करके सन्यासी सब ओरसे ममताको हरु ले। अपने मनमें राग और द्वेषको स्थान न दे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझे । प्राणियोंकी हिंसासे सर्वथा दूर रहे तथा सब ओरसे निःस्पृह होकर मुनिवृत्तिसे रहे। जो दम्भ और अहङ्कारसे मुक्त है, हिंसा और चुगली आदि दोषोसे दूर है तथा आत्मज्ञानके लिये उपयोगी गुणोंसे सुशोभित है, वह सन्यासी मोक्षको प्राप्त होता है। इन्द्रियोंकी विषयोंमे आसक्ति रहनेपर मनुष्य निःसन्देह अनेक प्रकारके दोषोंमें फँस जाता है; किंतु यदि उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी प्रकार वशमें कर ले तो वह (मोक्षरूप) सिद्धिको प्राप्त होता है। विषय भोगोंकी कामना भोगोंके उपभोगसे कदापि शान्त नहीं होती। भोगसे तो वह उल्टे बढती ही है—ठीक उसी तरह, जैसे घी डालनेसे आग और भी प्रज्वलित हो उठती है। जो मधुर या कटु शब्द सुनकर, कोमल या कठोर वस्तुका स्पर्श कर, स्वादिष्ट या स्वादहीन भोजन करके, सुन्दर या विकृत रूप देखकर और सुगन्ध या दुर्गन्ध सूँघकर न तो हर्षसे फूल उठता है और न ग्लानिका ही अनुभव करता है, उसीको जितेन्द्रिय जानना चाहिये । जिसके मन और वाणी शुद्ध हैं तथा सर्वदा भलीभाँति दोषोंसे सुरक्षित (बचे हुए) हैं, वही वेदान्तश्रवणका पूर्ण फल प्राप्त करता है । ब्राह्मण सम्मानसे विषकी भाँति उद्विग्न रहे और अपमानको अमृतकी भाँति समझकर सदा उसकी अभिलाषा करे । अपमानित पुरुष सुखसे सोता, सुखसे जागता और इस लोकमें सुखसे ही विचरता है. किंतु अपमान करनेवाला स्वतः नष्ट हो जाता है। अतिवादों (कठोर वचनों) को सहन करे, किसीका अनादर न करे तथा इस (नश्वर) देहको लेकर किसीके साथ वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करता है, उसके प्रति बदलेमें क्रोध न करे। यदि वह गाली देता हो, तो भी स्वय तो उसे अच्छी ही बात कहे। दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाछिद्र और एक मुख—इन सातों द्वारोंके अनुभवसे सम्बन्ध रखनेवाली वाणीको कभी असत्यरूपमे न बोले । सुख चाहनेवाला पुरुष अध्यात्मतत्त्वमें अनुराग रखकर स्थिरभावसे बैठे, किसीसे कोई अपेक्षा न रक्खे, मनसे सब तरहकी कामनाओंको निकाल दे तथा अपने सिवा किसी दूसरेको सहायक न बनाकर अकेला ही इस ससारमें विचरता रहे। इन्द्रियोंको वशमें रखने, राग-द्वेषका नाश करने तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेसे मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है। यह शरीर रोगोंका घर है, इसमें हड्डियोंके खंभे लगे हैं। स्नायुजालकी डोरीसे यह बँधा है। मास और रक्त इसपर थोप दिया गया हैं। इसे चमड़ेसे मढ दिया गया है। यह मल और मूत्रसे सदा ही पूर्ण रहता है। इससे दुर्गन्ध निकलती रहती है। बुढापे और शोकसे व्याप्त होनेके कारण यह सदा आतुर (असमर्थ) रहता है। वीर्य और रजसे उत्पन्न होनेके कारण यह रजखल (रजोगुणी अथवा धूलसे भरा हुआ) है। साथ ही यह अनित्य भी है (आज गिरेगा या कल, इसका कुछ भी ठिकाना नही है)। इसमें पाँच भूत सदा ही डेरा डाले रहते हैं, अतः इसे त्याग दे (इसके प्रति अहता और ममता न रक्खे)। यदि मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, मल, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायभूत इस शरीरसे प्रेम करता है तो वह नरकसे भी अवश्य प्रेम करेगा। इस शरीरमें जो अहम्भाव है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है, वही महावीचि नामक नरकमें ले जानेके लिये बिछा हुआ जाल है। तथा वही असिपत्र वन नामक नरककी श्रेणी है। शरीरमें होनेवाली अहता कुत्तेका मास लेकर चलनेवाली चाण्डालिनीके समान है। उसको सब प्रकारके यत्नोंद्वारा त्याग दे। सर्वनाश उपस्थित हो, तो भी कल्याणकामी पुरुषको उसका संगर्तक नही करना चाहिये। अपने प्रियजनोंमें सुकृत (पुण्य) को और अप्रियजनोंमे दुष्कृत (पाप) को छोड़कर—स्वयं उनसे सम्बन्ध न रखकर ध्यानयोगके द्वारा साधक सनातन ब्रह्म- को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार धीरे धीरे सम्पूर्ण आसक्तियों- का त्याग करके सन्यासी पुरुष सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें ही स्थिति प्राप्त करता है। सिद्धिलाभके