कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 800, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् ' [ उपदेश ४ आदिके अभिमानमे रहित एव आहारोपार्जनकी चेष्टासे रहित होता है । संन्यासी मुनि कौपीन पहनकर रहे अथवा नगा ही रहकर ध्यानसे तत्पर रहे । इस प्रकार ज्ञानपरायण योगी ब्रह्मभावकी प्राप्तिमे समर्थ होता है । संन्यासका चिह्नविशेष होने हुए भी उनमें ज्ञान ही मोक्षका विशेष कारण है । प्राणियोके लिये नाना प्रकारके चिह्नोंका धारण मोक्षसाधक ज्ञानके अभावम निरर्थक ही होता है । जिसके विषयमे कोई भी यह नहीं जानता कि यह साधु है या असाधु, मूर्ख है या बहुत बड़ा विद्वान्, अथवा सदाचारी है या दुराचारी, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण है । इसलिये विद्वान संन्यासी किसी भी चिह्नविशेषको न धारण करके स्वधर्मका ज्ञान रखते हुए सर्वोत्तम ब्रह्मचिन्तन न्तका पालन करे। वह गूढ धर्मका आश्रय लेकर इस प्रकार आचरण करे, जिससे उसके आचरणके विषयकी कोई बात दूसरोपर प्रकट न हो । समस्त प्राणियोंके लिये सदेहता विषय बना हुआ वह वर्ण और आश्रमसे रहित हो अन्ध, जड और मूककी भाँति पृथिवीपर विचरण करे । उस शान्तचित्त सन्यासीका दर्शन करके देवता भी वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये लालायित होते हैं । जब आत्मसत्ताके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुके अस्तित्वका चिह्न भी न रह जाय, तभी कैवल्य प्राप्त होता है । यही ब्रह्म- तत्त्वका उपदेश है' ॥ २३-३६ ॥ तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा-'भगवन् ! सन्यासकी विधि क्या है, यह बतानेकी कृपा करें।' तब ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दी और इस प्रकार कहा-'आतुर-मन्त्रासमे अथवा क्रम सन्यासमे चतुर्थ आश्रम स्वीकार करनेके लिये पहले प्रायश्चित्तरूपमे कृच्छ्र आदि व्रत करके फिर अष्टश्राद्ध करे । देवता, ऋषि, दिव्यमनुष्य, भूत, पितर, माताएँ और आत्मा-इन आठके निमित्त आठ श्राद्ध करना आवश्यक है । पहले 'सत्य' और 'वसु' नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करे, फिर देवश्राद्धमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीका, ऋषिश्राद्धमें देवर्षि, राजर्षि तथा मानवर्षियोंका, दिव्यश्राद्धमे आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों तथा बारह आदित्योका, मनुष्य-श्राद्धमे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार तथा सनत्सुजातका, भूतश्राद्धमे पृथिवी आदि पञ्च महाभूतो, नेत्र आदि इन्द्रियों तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदायोंका, पितृश्राद्धमें पिता, पितामह तथा प्रपितामहका, मातृश्राद्धमे माता, पितामही और प्रपितामहीका तथा आत्मश्राद्धमे अपना, अपने पिताका और पितामहका-यदि उसके पिता जीवित हो तो पिताको छोड़कर अपना, पितामह और प्रपितामहका आह्वान करे । आठो श्राद्धोंको एक ही यज्ञका अङ्ग बनाकर करनेपर प्रत्येक श्राद्धम दो ठाके क्रममे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उनका विधिवत् पूजन करे । अथवा यदि आठ पृथक्-पृथक् यज्ञ किये जायँ तो ऐसी स्थितिम अपनी आग्नामे आये हुए मन्त्रोंद्वारा इन आठ श्राद्धोंको आठ दिनम या एक दिनमें करे । पितृयाग ( श्राद्धकल्प ) म बताये हुए विधानके अनुसार ब्राह्मणोंके पूजनसे लेकर भाजनतक सब कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करके पिण्डदान दे । फिर दक्षिणा और ताम्बूलसे ब्राह्मणोंको सतुष्ट करके उन्हें विदा कर और शेष कमकी सिद्धिके लिये सात या आठ छोड़कर शेष गर्भा देर्शोको मुँड़वा दे । साथ ही मूँछ, दाढी और नग्न भी कटवा दे । ऊपर बताये अनुसार सात केशाको अवश्य बचा ल । काँग्त और उपस्थके केश भी न कटाये । औरके पश्चात् स्नान करे । उसके बाद सायंकालीन सध्या वन्दन करके एक सहस्र गायत्रीका जप करे । फिर ब्रह्मयज्ञ करके स्वतन्त्र अग्निकी स्थापना कर । फिर अपनी शाखाका उपमहार करके उसमे बताये अनुसार आज्यभागपर्यन्त घीकी आहुति दे । हवनकी विधि पूरी करके तीन ग्रास सत्तूका प्राशन (भोजन) कर । फिर आचमन करके अग्निकी रक्षाके लिये उसमे ईधन आदि रखकर स्वय अग्निसे उत्तरकी ओर काल मृगचर्मपर बैठ जाय और पुराण कथा सुनते हुए रातभर जागरण करे । रातके चौथे पहरके अन्तमे स्नान करके पूर्वोक्त अग्निमे चरु पकायें । फिर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोद्वारा उस चरुकी सोलह आहुतियाँ अग्निमे डाले और विरजा होम करके आचमनपूर्वक दक्षिणासहित वस्त्र, सुवर्ण, पात्र और धेनुका दान करे और इस प्रकार त्रिविकी पूर्ण करे । इसके बाद ब्रह्माका विसर्जन करके- स मा सिञ्चन्तु मरुत समिन्द्र स बृहस्पति । स मायमग्नि सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन नायुष्मन्त करोतु मा ॥* या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानमात्मन् । अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्मे नर्या पुरूणि ॥ यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वा योनिम् । जातवेदो भुव आजायमान सक्षय एहि ॥†
- अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि-ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें । ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञान- रूपी धन तथा साधनकी शक्तिमे सम्पन्न करें, साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें । † हे अग्निदेव ' जो तुम्हारा यज्ञिय ( यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला ) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से