भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 805, कुल 832 में से

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पृष्ठ 805

उपदेश ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४९

गयी है। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंको प्रकाशित करते हुए तुरीयरूपमें जिसकी स्थिति बतायी गयी है, वह तुरीयरूप अविनाशी परमात्मा मैं ही हूँ—यों जानकर जो जाग्रत्- अवस्था में भी सुषुप्तकी भाँति रहता है; जो-जो सुनी और जो-जो देखी हुई वस्तु है, वह सब मानो अविज्ञात (अपरिचित)- सी है—इस प्रकार उनकी ओर ध्यान न देते हुए जो निवास करता है, उसकी स्वप्नावस्थामें भी वैसी ही अवस्था बनी रहती है। अर्थात् वह स्वप्नमें उपलब्ध पदार्थों को भी ग्रहण नहीं करता। ऐसा पुरुष जीवन्मुक्त है—इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं। समस्त श्रुतियोंके अर्थका प्रतिपादन भी यही है कि उसी- की मुक्ति होती है। भिक्षु इहलोक और परलोकके विषयोंकी भी अपेक्षा नहीं रखता। यदि उसमे अपेक्षा हो तो उसीके अनुरूप वह बन जायगा—अपने स्वरूपसे नीचे गिर जायगा। स्वरूपानुसन्धानको छोड़कर अन्य शास्त्रोंका अभ्यास उसके लिये उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे ऊँटकी पीठपर लदा हुआ केसरका भार। उसकी योगशास्त्रमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये। उसे सांख्यशास्त्रका अभ्यास तथा मन्त्र-तन्त्रका व्यापार भी नहीं करना चाहिये। यदि सन्यासीकी प्रवृत्ति अन्यान्य शास्त्रों- में होती है, तो वह सब उसके लिये मुर्देको पहनाये हुए आभूषणके समान है। चमारकी भाँति सबसे अत्यन्त दूर रहकर कर्म, आचार और विद्यासे भी दूर रहे। प्रणवका भी उच्च स्वरसे कीर्तन न करे, क्योंकि मनुष्य जो-जो कर्म करता है, उसका फल भी उसे भोगना पड़ता है। अतः सबको रेड़ी- के तेलके फेनकी भाँति निःसार समझकर त्याग दे और परमात्मचिन्तनमें संलग्न मनोमय दण्ड तथा हाथरूपी पात्र धारण करनेवाले दिगम्बर सन्यासीका दर्शन करके—उसके आदर्शको सामने रखकर भिक्षु सब ओर विचरण करे। वह बालक, उन्मत्त तथा पिशाचकी भाँति जीवन अथवा मृत्युकी कामना न करे। आज्ञाकारी भृत्यकी भाँति भिक्षु केवल काल की ही प्रतीक्षा करता रहे ॥ २५-२६॥

'जो तितिक्षा (सहनशीलता), ज्ञान, वैराग्य और शम दम आदि सद्गुणोंमें शून्य रहकर केवल भिक्षासे जीवन- निर्वाह करता है, वह सन्यासी सन्यास वृत्तिका हनन करनेवाला है। केवल दण्ड धारण करने, मूँड़ मुँड़ाने, वेष बनाने और दिखावेके लिये किसी आचारका पालन करनेसे मोक्ष नहीं मिलता। जिसने ज्ञानरूप दण्ड धारण किया है, वही एकदण्डी कहलाता है। जिसने काष्ठका दण्ड तो धारण कर लिया है किंतु मनसे सम्पूर्ण कामनाओंको स्थान दे रक्खा है, तथा जो ज्ञानसे सर्वथा शून्य है, वह सन्यासी महारौरव नामक घोर नरकोंमें पड़ता है। महर्षियोंने प्रतिष्ठाको शूकरीकी विष्ठाके समान बताया है। अतः सन्यासी इस प्रतिष्ठाको त्यागकर, कीटकी भाँति सर्वत्र विचरण करे। दिगम्बर सन्यासी बिना माँगे जो मिल जाय, वही भोजन करे और वैसे ही वस्त्रसे अपने शरीरको ढँके। वह दूसरोंकी इच्छासे ही वस्त्र पहने और दूसरोंकी इच्छासे ही स्नान करे। जो स्वप्नमें भी जाग्रत्- अवस्थाकी भाँति ही विशेषरूपसे सावधान हो वैसी ही चेष्टा करता है, वह श्रेष्ठ सन्यासी ब्रह्मवेत्ताओंमें वरिष्ठ (प्रधान) माना गया है। भिक्षा आदि न मिलनेपर विषाद न करे और मिल जानेपर हर्षसे फूल न उठे। भिक्षा उतनी ही ग्रहण करे, जितनेसे प्राण-रक्षा हो सके। शब्द आदि विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा दूर रहे। सम्मानकी प्राप्तिको वह सब प्रकारसे घृणाकी दृष्टिसे ही देखे। सम्मानका लाभ उठानेवाला सन्यासी मुक्त होनेपर भी बँध जाता है॥२७-३४॥

'जब चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर लें, ऐसे समयमें सन्यासी उत्तम वर्णवाले गृहस्थोंके घर भिक्षा लेने जाय। भिक्षाका उद्देश्य प्राण-यात्राका निर्वाहमात्र होना चाहिये। हाथको ही पात्र बनाकर विचरनेवाला करपात्री यति बार-बार भिक्षा न माँगे। एक बारमें जो मिल जाय, उसे खड़े-खड़े पा ले या चलते चलते भोजन करे। जबतक हाथका भोजन समाप्त न हो जाय, बीचमे आचमन (जलपान) न करे। सन्यासी समुद्रकी भाँति मर्यादाके भीतर ही रहते हैं। उनका आशय महान् होता है। वे महान् होकर भी सूर्यकी भाँति नियति (नियत मार्ग) का त्याग नहीं करते। जिस समय सन्यासी मुनि गौकी भाँति मुखसे आहार ग्रहण करने लगता है अर्थात् यदि कोई उसके मुखमे कुछ डाल दे, तभी वह भोजन करता है, उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति उसका समभाव हो जाता है और वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्तिका अधिकारी बन जाता है। जो घर निन्दनीय न हो, वहीँ भिक्षा लेनेके लिये जाय। निन्दनीय घरोंको छोड़ दे। जिस घरका दरवाजा खुला हो, उसीमे प्रवेश करे। जिसका द्वार बंद हो, उस घरमे न जाय। वह धूलसे आच्छादित निर्जन घरोंमें आश्रय ले अथवा वृक्षकी जड़को ही अपना निवासस्थान बनाये। समस्त प्रिय और अप्रियकी भावनाओंको त्याग दे ॥ ३५—४० ॥

'सन्यासी मुनि जहाँ सूर्यास्त हो जाय वहीं सो रहे। न तो अग्नि रक्खे और न कोई घर ही बनाये। दैवेच्छासे जो कुछ प्राप्त हो जाय उसीपर जीवन निर्वाह करे। मन

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