भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 807

उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५१

रक्खे । मन-ही-मन सबके ईश्वर सर्वव्यापी परमात्माका चिन्तन शरीर और क्रियाद्वारा समस्त संसारको त्यागकर, प्रपञ्चकी ओरसे करते हुए, 'मैं ही परमानन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ, ऐसी भावना मुँह मोड़कर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी भाँति सदा रक्खे । जो इस प्रकार जानकर, मनोमय दण्ड धारण करके, अपने स्वरूपके चिन्तनमें ही संलग्न रहता है, वह मुक्त हो आशासे निवृत्त हो जाता है तथा दिगम्बर होकर सदा मन, वाणी, जाता है। यह उपनिषद् है' ॥ ६०--६६ ॥ ॥ पञ्चम उपदेश समाप्त ॥ ५ ॥ षष्ठ उपदेश तुरीयातीत पद और उसकी प्राप्तिके उपाय तथा यतिकी जीवनचर्या तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा--'भगवन् ! पुष्ट करता रहे। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति--इन तीन अवस्थाओं- भ्रमर-कीट-न्यायसे अपने स्वरूपका अनुसन्धान करनेपर मोक्ष को पार करके तुरीयावस्थामें पहुँचकर संन्यासी तुरीयातीत प्राप्त होता है--यह आपने बताया, किंतु उस स्वरूपानु- परमात्मपदमें प्रवेश करे ॥ २ ॥ सन्धानका अभ्यास कैसे हो ?' तब ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा-- 'दिन जाग्रत्-अवस्था है, रात्रि स्वप्न है, अर्द्धरात्रि सुषुप्ति- 'सत्यवादी होकर ज्ञान और वैराग्यद्वारा इस शरीरकी स्थानीय है। ये तीनों अवस्थाएँ तुरीयमें हैं और तुरीयकी आसक्तिको त्यागकर, शेष बचे हुए एक विशिष्ट शरीरमें स्थिति तुरीयातीतमें है । इस प्रकार एककी अवस्थामें स्थित होकर रहे ॥१॥ चार अवस्थाएँ हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार--इन चार "ज्ञान ही वह शरीर है। वैराग्यको ही उसका प्राण समझो । अन्तःकरणोंमेसे प्रत्येकके अधीन जो नेत्र आदि चौदह करण शम और दम--ये दो नेत्र हैं। विशुद्ध मन मुख है, बुद्धि हैं, उनके व्यापार बतलाये जाते हैं। नेत्रोंका काम है रूपको कला है, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच ग्रहण करना, श्रोत्रोंका कार्य है शब्दकी उपलब्धि, जिह्वा- विषय, चार अन्तःकरण तथा अव्यक्त प्रकृति--ये पचीस तत्त्व का कार्य है रसास्वादन, गन्धका अनुभव घ्राणेन्द्रियका काम ही उस शरीरके अवयव हैं। समष्टिगत जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, है, बोलनेकी क्रिया वाक्-इन्द्रियका व्यापार है, हाथोंका काम है तुरीय और तुरीयातीत--ये पाँच अवस्थाएँ ही उस विशिष्ट किसी वस्तुको ग्रहण करना, पैरोंका कार्य है चलना, मल- शरीरके पाँच महाभूत हैं। कर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य--ये त्याग गुदाका और विषयजनित आनन्दका अनुभव उपस्थका शरीरकी शाखा अर्थात् भुजाएँ हैं। अथवा जाग्रत्, स्वप्न, कार्य है। त्वचाका कार्य स्पर्शका अनुभव करना है। इनके सुषुप्ति और तुरीय--ये चार अवस्थाएँ ही चार भुजाएँ हैं। अधीन विषय-ग्रहणकी बुद्धि है। बुद्धिसे जानता है। चित्तसे पहले बताये हुए चौदह करण पङ्कमें स्थित कमजोर कर्मोंके चेतना प्राप्त करता है। अहङ्कारसे अहंताका अनुभव करता है। इन समान हैं। ऐसी स्थितिमें भी जैसे कीचड़में पड़ी हुई नावको सब भावोंकी विशेषरूपसे सृष्टि करके इनके समुदायरूपी शरीरमें भी अच्छा नाविक ढकेलकर उसे ठीक मार्गपर ला ही देता है, आत्माभिमान करनेके कारण तुरीय-चेतन ही जीव 'हो जाता उसी प्रकार संसार-सिन्धुके पङ्कमें फँसी हुई इस जीवनरूपी है। जैसे घरमें अभिमान करके मनुष्य गृहस्थ बनता है, उसी नौकाको उत्तम बुद्धिके द्वारा वशमें रखकर पार लगाये-ठीक प्रकार शरीरमें अभिमान करके तुरीय-चेतन जीव होकर उसी तरह, जैसे हाथीवान् हाथीको अपने वशमें रखकर उसे विचरता है। शरीरके भीतर जो अष्टदल कमलसे युक्त हृदय ठीक रास्तेसे ले जाता है। ज्ञानमय विशिष्ट शरीरमें स्थित हुआ है, उसमें रहनेवाला जीव जब उक्त कमलके पूर्ववर्ती दलमें पुरुष 'मेरे अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब कल्पित होनेके विचरता है, तब उसमे पुण्यानुष्ठानकी प्रवृत्ति होती है। आग्नेय कारण नश्वर है'--यों समझकर सदा 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं कोणवाले दलमें जानेपर उसे निद्रा और आलस्य सताते हैं। ब्रह्म ही हूँ) इस प्रकार उच्चारण करे। अपने आत्माके अतिरिक्त दक्षिण दिशाके दलमें स्थित होनेपर उसमें क्रूरताका भाव दूसरी कोई भी वस्तु ज्ञातव्य नहीं है, ऐसा निश्चय करके आता है। नैर्ऋत्यकोणवाले दलका आश्रय लेनेपर उसमें पाप- जीवन्मुक्त होकर रहे। इस प्रकार रहनेवाला पुरुष कृतकृत्य बुद्धि जाग्रत् होती है। पश्चिम दलमें स्थिति होनेपर उसका हो जाता है। व्यवहार-कालमें भी यों न कहे कि 'मैं ब्रह्म क्रीडामें अनुराग होता है। वायव्यकोणके दलमे जानेपर उसकी नहीं हूँ।' अपितु निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इस धारणाको ही बुद्धि गमनमें लगती है-वह इधर-उधर जानेका सङ्कल्प