कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 810, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७५४ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ७ सप्तम उपदेश संन्यासीके सामान्य नियम और कुटीचक आदिके विशेष नियम तदनन्तर नारदजीके यह पूछनेपर कि 'यतिका नियम कैसा होना चाहिये ?' ब्रह्माजीने इस प्रश्नको सामने रखकर उत्तर देना आरम्भ किया। उन्होंने कहा, 'संन्यासी विरक्त होकर केवल वर्षाके चार महीनोंमें ही किसी निश्चित स्थानपर विश्राम करे। शेष आठ महीनोंमे एकाकी विचरण करे। कहां एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे; क्योकि वैसा करनेसे पतनका भय है। भ्रमरोंकी भाँति एक स्थानपर न ठहरे । अपने अन्यत्र जानेका यदि कोई विरोध करे तो सन्यासी उस विरोधको स्वीकार न करे। अपने हाथों तैरकर नदी पार न करे। पेड़पर भी न चढे । देव-उत्सवके निमित्त होनेवाले मेलेको न देखे । सदा एक घरका भोजन और आत्माके अतिरिक्त बाह्य देवताओंका पूजन न करे। आत्माके अतिरिक्त सबका त्याग करके मधुकरी वृत्तिसे भिक्षा लाकर ग्रहण करे। शरीरको कृश बनाये रखे। मेदकी वृद्धि न होने दे। घीको रुधिरके समान समझकर त्याग दे। एक घरके अन्नको मासकी भाँति समझकर छोड़ दे। इत्र या चन्दन आदिके लेपको अशुद्ध मल मूत्रादिके लेपकी भाँति मानकर उसका त्याग करे। क्षार (सोडा, साबुन आदि) को चाण्डालके समान अस्पृश्य समझे। कौपीन आदिके अतिरिक्त अन्य वस्त्रोंको जूठे बर्तनके समान समझकर उन्हें त्याग दे। अभ्यङ्ग (तेल आदि मलने) को स्त्रीके आलिङ्गनकी भाँति मानकर उससे दूर रहे। मित्रोंके आनन्ददायक सङ्गको मूत्रके समान त्याज्य समझे। किसी वस्तुकी प्राप्तिके लिये मनमें होनेवाली स्पृहाको अपने लिये गोमासके समान वर्जनीय माने। परिचित स्थानको चाण्डालका बगीचा समझे। स्त्रीको सर्पिणीके समान भयङ्कर समझे । सुवर्णको कालकूट, सभा स्थलको श्मशानभूमि, राजधानीको कुम्भीपाक नरक तथा एक स्थानके अन्नको मुर्देके लिये अर्पित पिण्डकी भाँति समझकर त्याग दे । देहको आत्मासे पृथक् देखना और प्रवृत्तिमे फँसना छोड़ दे। स्वदेशको त्याग दे और परिचित स्थानोंसे भी दूर रहे। अपनी आनन्दरूपताका निरन्तर चिन्तन करते हुए ऐसी प्रसन्नताका अनुभव करे मानो कोई भूली हुई बहुमूल्य वस्तु पुनः प्राप्त हो गयी हो। जहाँ जानेपर अपने शरीरमें ही आत्माभिमान जाग्रत् हो जाय, जिसमें अपने शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले लोग रहते हों, उस प्रदेशको सदाके लिये भूल जाय। अपने शरीरको भी मुर्देकी भाँति त्याज्य मानकर उसमें आसक्त न हो। जैसे जेलखानेसे छूटा हुआ चोर लज्जावश अपनी जन्मभूमिको न जाकर कहीं दूर जा बसता है, उसी प्रकार सन्यासी जहाँ उसके पुत्र और माता पितादि गुरुजन रहते हों, उस स्थानको छोड़कर वहाँसे दूर ही रहे। बिना यत्न किये ही जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीका आहार करे । ब्रह्मस्वरूप प्रणवके चिन्तनमें तत्पर रहकर अन्य समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाय । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरता आदिको जलाकर त्रिगुणातीत हो जाय। क्षुधा, पिपासा आदि छः प्रकार की ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो । जन्म, वृद्धि आदि छः प्रकारके भावविकारोंसे भी अपना सम्बन्ध न माने। सत्य बोले, शरीर और मनसे पवित्र रहे तथा किसीसे भी द्रोह न करे। गाँवमे एक रात, नगरमें पाँच रात, किसी पुण्यक्षेत्रमे पाँच रात तथा तीर्थमें भी पाँच रातसे अधिक न रहे। कहीं भी अपने लिये घर न बनाये। बुद्धिको परमात्मचिन्तनमें स्थिर रक्खे । झूठ कभी न बोले । पर्वतकी गुफाओंमें निवास करे । भ्रमणकालमें सदा अकेला ही रहे। (चौमासेके समय) दो व्यक्तियोंके साथ भी रह सकता है। तीनके साथ रहनेपर तो गाँव-सा ही बन जाता है; और चारके साथ वहाँ नगर-सा बस जाता है। अतः सन्यासी अकेला ही रहे। अपने चौदह करणों (इन्द्रियो) को पृथक् पृथक् विषयोंके चिन्तनका अवकाश न दे । अखण्ड बोधसे वैराग्य-सम्पत्तिका अनुभव करके 'मुझसे भिन्न दूसरा कोई नही है, मेरे सिवा दूसरेका अस्तित्व ही नहीं है'-ऐसा मन-ही-मन विचार करके सब ओर अपने स्वरूपका ही साक्षात्कार करता हुआ जीवन्मुक्त-अवस्थाको प्राप्त करे। जबतक प्रारब्धके प्रतिभासका नाश न हो जाय, प्रणव-चिन्तनपूर्वक ओत, अनुज्ञातृ आदि चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाले तुरीय तुरीयरूपमें स्थित अपने निर्विकल्प आत्माका सम्यक् बोध प्राप्त करे । स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जबतक यह शरीर गिर न जाय, तबतक स्वरूपका चिन्तन करते हुए ही कालयापन करता रहे ॥ १ ॥ 'कुटीचकके लिये तीनों काल स्नानका विधान है। बहूदक साय-प्रातः दो बार स्नान करे । इसके लिये दिनमें एक बार ही स्नानका नियम है । परमहंस मानसिक स्नान करे । तुरीयातीतके लिये भस्मस्नान बताया गया है। अर्थात् वह सारे शरीरमें केवल विभूति लगा ले । तथा अवधूतके लिये वायव्य-