कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 816, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७६० * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ९
[बायाँ स्तम्भ]
का निरन्तर ध्यान करनेसे उन प्रकाशमय परमात्माको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है, क्योंकि क्लेशोंका नाश हो जानेके कारण जन्म-मृत्युका सर्वथा अभाव हो जाता है। (अतः वह) शरीरका नाश होनेपर तीसरे लोक (स्वर्ग) तकके समस्त ऐश्वर्यका त्याग करके सर्वथा विशुद्ध एव पूर्णकाम हो जाता है। अपने ही भीतर स्थित इन ब्रह्मको सदा ही जानना चाहिये। इनसे बढकर जाननेयोग्य तत्त्व दूसरा कुछ भी नही है। भोक्ता (जीवात्मा), भोग्य (जडवर्ग) और उनके प्रेरक परमेश्वर—इन तीनोंको जानकर मनुष्य सब कुछ जान लेता है। इस प्रकार इन तीन भेदोंमे बताया हुआ यह सब कुछ ब्रह्म ही है। आत्मविद्या और तपस्या ही जिसकी प्राप्तिके मूल साधन हैं, वह उपनिषद्- वर्णित परमतत्त्व ही ब्रह्म है। (दृष्टिभेदसे वह द्विविध या त्रिविध बताया जाता है, परन्तु वास्तवमे भेद दृष्टि अज्ञान- मूलक है, अतः सब रूपोंमें वह एक ही ब्रह्म विराजमान है) ॥ २-१३ ॥
जो इस प्रकार जानकर निरन्तर अपने स्वरूपभूत ब्रह्मका ही चिन्तन करता है, उस एकत्वदर्शी ज्ञानीको वहाँ क्या शोक है और क्या मोह। इसलिये भूत, भविष्य और वर्तमान —तीनों कालोंमे प्रकट होनेवाला यह विराट् जगत् अविनाशी ब्रह्मस्वरूप ही है। यह सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्से भी परम महान् परमात्मा इस जीवकी हृदयरूपी गुहामे स्थित है। सबकी सृष्टि एव रक्षा करनेवाले परमात्माकी कृपासे जो मनुष्य उस सङ्कल्परहित परमेश्वरको तथा उसकी महिमाको भी देख लेता है, वह सब प्रकारके दुःखोंसे रहित हो जाता है। वह परमात्मा हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी सब वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला तथा वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है। आँखोंके बिना ही वह सब कुछ देखता है। कानोंके बिना ही वह सब कुछ सुनता है। वह जाननेमे आनेवाली सभी वस्तुओंको जानता है, परन्तु उसको जाननेवाला कोई नहीं है। ज्ञानी पुरुष उसे पुरातन महान् पुरुष (पुरुषोत्तम) कहते हैं। वह इन अनित्य शरीरोंमें नित्य एव शरीररहित होकर स्थित है, उन सर्वव्यापी महान् परमात्माको जान लेनेपर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता। वह सबका धारण-पोषण करनेवाला है, उसकी अघटित घटना-पटीयसी शक्ति अचिन्त्य है, सम्पूर्ण शास्त्रोंके सिद्धान्तरूपसे स्वीकृत अर्थविशेष— परमात्माके रूपमें वही जाननेयोग्य है। परात्पर परब्रह्मरूपमे भी वही ज्ञातव्य है तथा सबके अवसानमें अर्थात् सम्पूर्ण
[दायाँ स्तम्भ]
जगत्का प्रलय होनेपर सबके सहारकरूपमे भी उसीको जानना चाहिये। वह कवि (त्रिकालज्ञ), पुराण-पुरुष तथा सबसे उत्तम पुरुषोत्तम है। वही सबका ईश्वर तथा सम्पूर्ण देवताओं- द्वारा उपासना करनेयोग्य है। वह आदि, मध्य और अन्तसे रहित है, उसका कभी विनाश नहीं होता। वही शिव, विष्णु तथा कमलजन्मा ब्रह्मारूपी वृक्षोंको प्रकट करनेवाला महान् भूधर (पर्वत) है। जो पञ्चभूतात्मक है तथा पाँच इन्द्रियों- में विद्यमान रहता है, जिसने अनन्त जन्मोंके विस्तारकी परम्पराको बढा रक्खा है, उस सम्पूर्ण प्रपञ्चको उस परमात्माने पञ्चभूतोंके रूपोंमे प्रकट किये हुए अपने ही अवयवोंद्वारा स्वय ही व्याप्त कर रक्खा है, फिर भी वह स्वय इन पञ्चभूतात्मक अवयवोंसे आवृत नही है। वह परसे भी पर और महान्से भी महान् है। वह स्वरूपतः स्वतः प्रकाशमय, सनातन एवं कल्याणरूप है। जो दुराचारसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ अशान्त हैं—वशमे नहीं हैं, जो एकाग्रचित्त नहीं हुआ है तथा जिसका मन पूर्णतः शान्त नहीं हो पाया है, वह इस परमात्माको उत्तम ज्ञानद्वारा नहीं पा सकता (उसके भीतर आत्मज्ञानका उदय होगा ही नहीं)। वह पूर्ण ब्रह्म न भीतर जानता है, न बाहर जानता है, न बाहर- भीतर—दोनोंको ही जानता है, वह न स्थूल है न सूक्ष्म है; न वह ज्ञानरूप है, न अज्ञानरूप है, वह पकड़में आनेवाला तथा व्यवहारका विषय नहीं है। वह अपने भीतर स्वयं ही स्थित है। जो इस प्रकार जानता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है—इस प्रकार भगवान् ब्रह्माजीने उपदेश दिया ॥ १४-२२ ॥
अपने स्वरूपको जाननेवाला सन्यासी अकेला ही विचरता है। वह भयभीत मृगकी भाँति कभी एक स्थानपर नहीं ठहरता। अन्यत्र जानेका यदि कोई विरोध (अथवा न जानेका अनुरोध) करता है, तो उसे वह स्वीकार नहीं करता। अपने शरीरके सिवा अन्य सब वस्तुओंको त्यागकर वह मधुकरी वृत्तिसे भिक्षा ग्रहण करता है। सदा अपने स्वरूपका ही चिन्तन करते हुए उसकी सबके प्रति अनन्य बुद्धि हो जाती है—वह सबको अपना आत्मा ही समझता है तथा इस प्रकार अपने-आपमे ही स्थित रहनेवाला वह यति सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। वह परिव्राजक सम्पूर्ण क्रियाओं और कारकोंसे भेद-बुद्धि त्याग देता है। गुरु (शास्ता), शिष्य और शास्त्र