करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंतों ने उनकी बात को माना । जो साहिब की बात पर चले, जिन्हें उन्होंने अमर-लोक पहुँचाया, जिन्हें उन्होंने सत्पुरुष का दर्शन करवाया, वे ही संत-सद्गुरु कहलाए। साहिब तो एक सच्चे सद्गुरु की पहचान बताकर गये हैं । सद्गुरु के लक्षण बताते हुए वो कह रहे हैं- -
गुरु के लक्षण कहत हौं, सुनो धीर चितलाय ।।
गुरु के लक्षण बताते हुए साहिब ने पहला लक्षण निर्वासना बताया है। आओ, ये लक्षण समझें, जिससे हम एक सच्चे सद्गुरु की खोज में भ्रमित होने से बच सकें । 1. निर्वासना : निर्वासना से मतलब है कि वो स्त्री- सहवास कभी न करे । इसके लिए या तो बालब्रह्मचारी हो । बालब्रह्मचारी है तो समझो कि कभी माया में फँसा ही नहीं है । ज्ञान चदरिया जिसने लीनी, मैली कर धर दीनी ।
एक कबीर जतन से लीनी, ज्यों की त्यों धर दीनी ।।
विवाह से मतलब ही इंद्रिय सुख की प्राप्ति है और इंद्रिय सुख का आनन्द लेने वाला सच्चा गुरु कैसे हो सकता है ! यदि कोई गुरु इंद्रियों के सुख में डूबा हुआ है तो समझो कि अभी तक उसे आत्मा का सुख मिला ही नहीं है। अतः वो अपने शिष्यों को इंद्रिय सुखों से दूर सच्चे आनन्द की ओर कैसे ले जा सकता है ! साहिब यहाँ चेता कर कह रहे हैं-
जाका गुरु है गीरही, चेला गिरही होय ।
कीच कीच के धोवते, मैल न जावे कोय।।
जिसका गुरु गृहस्थ है, उसका शिष्य चाहे सन्यासी ही क्यों न हो, वो भी गृहस्थ हो जायेगा, क्योंकि कीचड़ का दाग़ कीचड़ से तो साफ़ नहीं हो सकता है। इसलिए कबीर साहिब ने बालब्रह्मचारी गुरु करने को कहा है। बालब्रह्मचारी गुरु का मिलना बड़ा कठिन है, इसलिए यदि ऐसा गुरु न मिले तो दूसरे ऐसे गुरु की खोज करनी चाहिए, जो ज्ञान हो जाने पर सन्यासी हो चुका हो । गुरु- पद पर आसीन होने के लिए विषय-वासनाओं का त्याग अति अनिवार्य है। शिष्य ने तो अपना तन, मन, धन गुरु को समर्पित करना है। इसलिए तो कह रहे हैं-