भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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उन्होंने कोई गुरु पहले से ही किया हुआ है तो अन्य गुरु करने से उन्हें पाप लग जायेगा। नहीं, ऐसा नहीं है । उपर्युक्त शब्द में साहिब ने यही तो समझाया है कि जब तक पूर्ण गुरु न मिल जाएँ, तब तक दस-पाँच गुरु अगर कर भी लो तो कोई बात नहीं है, क्योंकि पूर्ण गुरु बड़ी मुश्किल से मिलता है । पर जब पूर्ण गुरु मिल जाए तो अन्य गुरु करना वैसा ही है जैसे समुद्र में गोता लगाते-लगाते अचानक हीरा मिल जाए और उसे पुन: समुद्र में फेंक दिया जाए। बस, यह समझ लेना कि बिना सद्गुरु के संसार-सागर से पार करने वाला कोई नहीं है । सतगुरु के उपदेश का, सुनिया एक विचार ।

जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यम के द्वार ।।

यम द्वारे में दूत सब, करते ऐं चातानि ।

उनते कभू न छूटता, फिरता चारों खानि ।।

चारि खानि में भरमता, कबहुँ न लगता पार ।

सो फेरा सब मिटि गया, सतगुरु के उपकार ।।

सद्गुरु का भेद देते हुए साहिब धर्मदास को समझाते हैं—

भृंग मता होय जेहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥

कह रहे हैं कि जिसके पास भृंग मता हो, वही सच्चा गुरु है, वही सद्गुरु है। अब यह भृंग मता क्या है ? 27 लाख कीट हैं । भृंगा उन सबमें निराला है । वो केवल पुरुष ही है । उसकी मादा नहीं है। उसका वंश कैसे चलता है ? वो किसी भी कीड़े को पकड़ लाता है। मिट्टी का घर बनाता है वो । उड़ता भी बड़ी स्पीड में है । उसकी आवाज़ में एक जादू है। वो कीड़े को मिट्टी के घर में रख कर अपनी आवाज़ सुनाता है । बड़ी रोमांचित करने वाली है उसकी आवाज़। उस आवाज़ से उसे वो अपने जैसा कर देता है । पर यदि कीड़ा उसकी आवाज़ सुने ही न तो नहीं हो पाता है वो उसकी तरह। तो भृंगा उसे छोड़कर इधर-उधर चक्कर काट कर आता है और फिर आकर अपना शब्द सुनाने लगता है। यदि वो फिर भी न सुने तो भृंगा फिर उड़कर चला जाता है और फिर एक चक्कर काटकर आता है और अपनी आवाज़ सुनाने लगता है । यदि वो सुन ले तो उसकी तरह हो जाए, पर यदि तीसरी बार भी न सुने तो भृंगा उसे छोड़ देता है। वो कीड़ा ही रह जाता है, भृंगा नहीं बन पाता है। अब वो दूसरे कीड़े को पकड़कर लाता है और यही खेल उसके साथ भी शुरू करता है ।