भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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इस संसार में सगुण-निर्गुण से संबंधित जितनी भी भक्यिाँ प्रचलित हैं, सब काल की हैं। उनमें किसी में भी पूर्ण आत्मज्ञान नहीं है। जब तक आत्मज्ञान नहीं हो जाता तब तक जीव सदा के लिए भवसागर से नहीं छूट सकता है। इस जीव को सत्य-भक्ति की राह दिखाने वाला भी कोई नहीं मिलता; अमर-लोक का संदेश देने वाला भी कोई नहीं मिलता । यदि हम संसार में देखें तो सभी सगुण, निर्गुण भक्ति अथवा पांच शब्द (पाँच मुद्राओं) का ही ज्ञान दे रहे हैं । जिनसे पाँच तत्व पैदा हुए मगर बोल निराकार सत्ता से आगे सत्य लोक, अमर लोक भी रहे हैं ऐसे में कुछ महात्माओं और महात्माओं की वाणीओं ने भी जीवों को उलझा दिया है।

वा घर की सुधि कोई न बतावे, जहँवा से हंसा आया है ॥

यदि मिलता भी है तो वो खुद वहाँ नहीं पहुँचा होता है, केवल साहिब की वाणियों की नक़ल करके ही बोलता है । इसी कारण फिर आ-जाकर निरंजन में ही उलझा देता है। इस तरह सत्य - भक्ति से रहित जीव आत्मज्ञान से बहुत दूर हो गया है। जब तक जीव अमर - लोक में नहीं पहुँच जाता, जब तक जीव सच्चे साहिब को नहीं पा लेता, तब तक सदा के लिए मुक्त नहीं हो सकता | अमर- लोक में पहुँचकर ही पूर्ण आत्मज्ञान होता है और उस लोक में पहुँचने के लिए सच्चे सद्गुरु के सच्चे नाम की ज़रूरत है । पर दुनिया इस रहस्य को नहीं समझ पाती है और पाखण्डियों के चंगुल में फँसकर बाहर भटक जाती है। वो प्रभु तो अन्दर में बैठा हुआ है, पर दुनिया उसे बाहर खोज कर रही है, क्योंकि स्वार्थियों ने उलझा दिया है। मनुष्य भटक रहा है; उसे पाने के लिए कमाई, योग, जप, तप, ध्यान आदि कर रहा है, पर इन चीज़ों से वो नहीं मिलने वाला । वो प्रभु तो सहज में ही मिलने वाला है। वो तो अन्दर में ही बैठा है। ज़रूरत है तो केवल सद्गुरु के द्वारा उसे प्रकट कर देने की । अन्यथा वो प्रभु आपसे कहीं दूर नहीं है।

घर में पड़ी वस्तु नहिं सूझे, बाहर खोजन जासी ॥

पानी में मीन पियासी । मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ॥

मृग की नाभि माहिं कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी ॥

आत्म ज्ञान बिना सब सूना, का मथुरा का कासी ॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी ॥