करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
इस संसार में सगुण-निर्गुण से संबंधित जितनी भी भक्यिाँ प्रचलित हैं, सब काल की हैं। उनमें किसी में भी पूर्ण आत्मज्ञान नहीं है। जब तक आत्मज्ञान नहीं हो जाता तब तक जीव सदा के लिए भवसागर से नहीं छूट सकता है। इस जीव को सत्य-भक्ति की राह दिखाने वाला भी कोई नहीं मिलता; अमर-लोक का संदेश देने वाला भी कोई नहीं मिलता । यदि हम संसार में देखें तो सभी सगुण, निर्गुण भक्ति अथवा पांच शब्द (पाँच मुद्राओं) का ही ज्ञान दे रहे हैं । जिनसे पाँच तत्व पैदा हुए मगर बोल निराकार सत्ता से आगे सत्य लोक, अमर लोक भी रहे हैं ऐसे में कुछ महात्माओं और महात्माओं की वाणीओं ने भी जीवों को उलझा दिया है।
वा घर की सुधि कोई न बतावे, जहँवा से हंसा आया है ॥
यदि मिलता भी है तो वो खुद वहाँ नहीं पहुँचा होता है, केवल साहिब की वाणियों की नक़ल करके ही बोलता है । इसी कारण फिर आ-जाकर निरंजन में ही उलझा देता है। इस तरह सत्य - भक्ति से रहित जीव आत्मज्ञान से बहुत दूर हो गया है। जब तक जीव अमर - लोक में नहीं पहुँच जाता, जब तक जीव सच्चे साहिब को नहीं पा लेता, तब तक सदा के लिए मुक्त नहीं हो सकता | अमर- लोक में पहुँचकर ही पूर्ण आत्मज्ञान होता है और उस लोक में पहुँचने के लिए सच्चे सद्गुरु के सच्चे नाम की ज़रूरत है । पर दुनिया इस रहस्य को नहीं समझ पाती है और पाखण्डियों के चंगुल में फँसकर बाहर भटक जाती है। वो प्रभु तो अन्दर में बैठा हुआ है, पर दुनिया उसे बाहर खोज कर रही है, क्योंकि स्वार्थियों ने उलझा दिया है। मनुष्य भटक रहा है; उसे पाने के लिए कमाई, योग, जप, तप, ध्यान आदि कर रहा है, पर इन चीज़ों से वो नहीं मिलने वाला । वो प्रभु तो सहज में ही मिलने वाला है। वो तो अन्दर में ही बैठा है। ज़रूरत है तो केवल सद्गुरु के द्वारा उसे प्रकट कर देने की । अन्यथा वो प्रभु आपसे कहीं दूर नहीं है।
घर में पड़ी वस्तु नहिं सूझे, बाहर खोजन जासी ॥
पानी में मीन पियासी । मोहि सुनि सुनि आवत हाँसी ॥
मृग की नाभि माहिं कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी ॥
आत्म ज्ञान बिना सब सूना, का मथुरा का कासी ॥
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सहज मिले अविनासी ॥
1. गुरु ज़रूरी है
गुरु ज़रूरी है
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरु वे नमः ।।
माता-पिता के योग का नाम संतान है । आश्चर्यमय है, पर सत्य है, गुरु के योग से जो सत्ता उत्पन्न होती है, वो ईश्वर है । बिना गुरु के ईश्वर उत्पन्न ही नहीं हो सकता है ।
गुरु की शरणा लीजे भाई । जासे जीव नरक नहिं जाई ।।
गुरुमुख होई परमपद पावै । चौरासी में बहुरि न आवै ।।
गुरु की बड़ी महिमा है। 'ऋग्वेद' कहता है कि गुरु का एक पल ध्यान भी काशी में हज़ारों वर्ष रहने से श्रेष्ठ है। त्रेतायुग में ऋषि बाल्मीकि जी की 'रामायण' में भी गुरु को ही पूर्ण रूप से स्थापित किया गया है । द्वापर में भी जितने ऋषि-मुनि आए, वे भी गुरु भक्ति की बात कह रहे हैं। 'गीता' में भी वासुदेव श्री कृष्ण ने अर्जुन को अन्य - अन्य भक्तियों को छोड़कर अपने में समाने को कहा, क्योंकि वे अर्जुन के गुरु थे। कलयुग के मान्य ग्रंथ 'रामचरित मानस' में भी गोस्वामी तुलसीदास जी ने गुरु को बड़ा ऊँचा स्थान दिया है।
बंदऊँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।
महामोह तप पुंज जासु वचन रवि कर निकर ।।
अर्थात् मैं उस गुरु-महाराज के चरणकमलों की वंदना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नररूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोह रूप घने अँधकार के नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं । फिर संतों ने तो इस क्षेत्र में कमाल ही कर दिया है। साहिब ने किसी को खुश करने या पक्षपात की बात नहीं की। गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय ।
बलिहारी गुरु आपनो, जिन गोविंद दियो बताय ।।
संतों से पहले गुरु को ईश्वर के बराबर कहा गया था। हमारे सभी धर्म-शास्त्रों तथा ऋषि-मुनियों ने गुरु को ईश्वर के समान लाकर खड़ा किया था; लेकिन संतों ने आध्यात्मिक क्षेत्र में अद्भुत क्रांति लाई । उन्होंने गुरु को ईश्वर से ऊँचा दर्जा दिया। गुरु चरणदास जी की शिष्या सहजोबाई बड़े सुन्दर तर्क द्वारा गुरु को ईश्वर से ऊँचा स्थान देती हुई कहती है-
हरि जूँ गुरु को न बिसाऊँ । गुरु के सम हरि को न निहारूँ ।।
हरि ने जन्म दियो जग माहीं । गुरु ने आवागमन छुड़ाई ।।
हरि ने पाँच चोर दियो साथा। गुरु ने लई छुड़ाय अनाथा ।।
हरि ने कुटुंब जाल में घेरी । गुरु ने काटी ममता बैरी ।।
हरि ने रोग भोग उरझायो । गुरु योगी कर सबै छुड़ायो ।।
हरि ने कर्म भर्म भरमायो । गुरु ने आतम रूप लखायो ।।
हरि ने मोंसे आप छिपायो । गुरु दीपक दे ताहि दिखायो ।।
चरनदास पर तन मन वारूँ। गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ ।।
गुरु की महत्ता बताते हुए वासुदेव श्री कृष्ण भी गीता में अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! जो गुरु का भक्त होता है और जो प्राणी गुरु के सम्मुख होकर भजन करता है, उसका भजन करना सफल है । जो गुरु से विमुख है, उसको बड़ा पाप लगता है । जिस तरह मदिरा का पात्र हो, उसमें जो गंगाजल है, सो अपवित्र है । इसी तरह गुरु से विमुख का भजन सदा अपवित्र होता है। उसके हाथ का देवता भी नहीं लेते। उसके सब कर्म निष्फल हैं। कूकर, सूकर, काग आदि योनियाँ बड़ी खोटी हैं। इन सबसे वो मनुष्य खोटा है, जो गुरु नहीं करता। गुरु बिना गति नहीं होती । वह अवश्य नरक में जायेगा । हमारी धार्मिक पुस्तकें तथा ग्रंथ 'गुरु' शब्द की परिभाषा देते हुए कहते हैं कि मनुष्य के मन के अज्ञान रूपी अँधकार को दूर करने वाले और ज्ञान का प्रकाश देने वाले गुरुदेव होते हैं। गुरु के बिना दुनिया के भोग- विलासों में ग्रस्त भूले हुए प्राणियों को कौन सच्चा मार्ग दिखा सकता है ! ज्ञान की आँखें गुरु देता है। गुरु की महिमा का अंत ही नहीं है । यही कारण है कि कबीर साहिब गुरु की अपार महिमा का वर्णन करते हुए अंत में यह भी कह दिया है— गुरु की महिमा अनन्त है, मौसे कही न जाय।
तन मन गुरु को सौंपि के, चरणों रहुँ समाय ।।
गुरु के बहुत अधिक महत्व 'कारण' साहिब ने गुरु को परमात्मा से भी बड़ा बताकर गुरु- भक्त बनने का संदेश दिया है।
धन्य माता पिता धन्य है, धन्य सुहद अनुरक्त । धन्य ग्राम वह जानिये, जहँ जन्मे गुरु भक्त ।।
बड़े-बड़े महापुरुष, जो इस धरा पर आए, सभी के गुरु थे | राम जी आए तो वशिष्ठ मुनि उनके गुरु हुए। कृष्ण जी आए तो दुर्वासा ऋषि उनके गुरु हुए।
राम कृष्ण से को बड़ा, तिनहूँ तो गुरु कीन ।
तीन लोक के वै धनी, गुरु आगे अधीन ।।
जब इतने बड़े-बड़े महापुरुषों को गुरु की ज़रूरत पड़ गयी तो आम आदमी गुरु के बिना कहाँ जायेंगे ! इसलिए जब तक एक इष्ट नहीं मिल जाता तब तक किसी के प्रति भी आस्था बनाए रखो, लेकिन जब गुरु मिल जाए तो अन्दर से ही परमात्मा को खोजो। जैसे ‘नर्सरी' कोई वर्ग नहीं है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को इस वर्ग में भी साल-भर रहना पड़ता है। वास्तव में यह वर्ग बच्चों को स्कूल जाने का शौक पैदा करने के लिए है । इसमें बच्चों को तरह-तरह के झूले झुलाकर, उन्हें नाना तरह के खिलौनों से खुश किया जाता है ताकि उनके दिल में स्कूल आने का शौक पैदा हो सके; स्कूल के प्रति उनका मोह बन जाए। इसी तरह मंदिर आदि ईश्वर का शौक पैदा करने के लिए हैं, पर बाद में गुरु की ज़रूरत पड़ेगी-ही-पड़ेगी। यदि कोई सोचे कि वह गुरु के बिना ही भक्ति करता रहे तो फिर वह नर्सरी क्लास वाले खिलौनों में ही खुश रहना चाहता है, आगे बढ़कर लक्ष्य तक नहीं पहुँचना चाहता । अतः अध्यात्म की राह में आगे बढ़ने के लिए गुरु की खोज तो करनी ही होगी । हमें संसार में जीने के लिए पग-पग पर गुरु की ज़रूरत पड़ जाती है। पढ़ना है तो गुरु चाहिए। डॉ० बनना है तो गुरु चाहिए। बहुत सारी किताबें पड़ी हैं, पर उन्हें पढ़कर कोई डॉक्टर नहीं बना। किताबें पढ़कर कोई इंजीनियर नहीं बना। जब हम जिस दुनिया में रह रहे हैं, जो दुनिया हमारी जानी पहचानी है, वहाँ पर जीने के लिए, कुछ करने के लिए, कदम आगे बढ़ाने के लिए हमें एक गाइड की ज़रूरत पड़ जाती है, तो जिस रास्ते से हम बिलकुल भी बेख़बर
हैं, जिस रास्ते का हमें पता ही नहीं है, जो राह हमारी कल्पना से परे है, वहाँ हम गुरु के बिना कैसे चल सकेंगे ! गुरु के बिना हम भटक जायेंगे । ज़रूर भटक जायेंगे। इसलिए गुरु तो हमें करना ही पड़ेगा। गुरु के बिना तीर्थ, व्रत, जप, तप, दान आदि सब व्यर्थ हैं। गुरु के बिना ये किसी खाते में नहीं आने वाले । गुरु बिन माला फेरते, गुरु बिन देते दान |
गुरु बिन साहिब कह रहे हैं कि वेद-पुराणों से पूछ लेना, गुरु के बिना दिया दान हराम है, पूछो वेद पुरान।।
हुआ दान भी हराम है।
जो निगुरा सुमिरन करे, दिन में सौ सौ बार ।
नगर नायिका सत करै, जरै कौन की लार ।।
नगर नायिका कहते हैं - वेश्या को । अगर वेश्या सती होना चाहे तो किसके साथ जले ! ....... सारा शहर उसका पति है । साहिब कह रहे हैं कि निगुरे व्यक्ति का भजन करना भी ऐसा ही है। निगुरे का भजन करना या नहीं करना एक ही बात है। शुकदेव जैसा ज्ञानी मनुष्य, जो माता के पेट से ही ज्ञान लेकर आया था, जो बाहर ही नहीं आ रहा था, जब गुरु के बिना भक्ति कर रहा था तो नहीं पहुँच पाया था। गर्भ योगेश्वर गुरु बिना, लागा हरि की सेव ।
कहैं कबीर वैकुण्ठ से, फेर दिया शुकदेव ।।
गुरु के बिना इतने बड़े भक्त का क्या हाल हो गया ! विष्णु जी ने वापिस किया—जो तेरे लिए कोई जगह नहीं है; तूने गुरु नहीं किया है।
गुरु बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ।।
गुरु के बिना इंसान कभी निर्मल नहीं हो सकता है और निर्मल हुए बिना भक्ति संभव नहीं । मन किसी को भी अच्छा नहीं बनने देता। मन के छल, कपट के कारण ही यह दुनिया चल रही है। यदि मन निर्मल हो जाए तो दुनिया ही समाप्त हो जाएगी। यह मन कभी निर्मल नहीं होता, पर इसे काबू में करना है । गुरु के बिना यह काबू में नहीं आ सकता, इसलिए गुरु के बिना इंसान अच्छा नहीं हो सकता। गुरु की कृपा से ही मनुष्य अच्छा बनता है । गुरु अपने शिष्य को प्रदान करता है । एक बार नारद जी विष्णु महाराज के पास पहुँचे। वहाँ कुछ देर बैठने के बाद चले गये। लेकिन किसी काम से पुनः वापिस लौट आए। जब वे
वापिस चले आए तो यह देखकर अत्यंत दुखी हुए कि जिस जगह पर वे बैठे हुए थे, उस जगह को विष्णु जी और लक्ष्मी जी साफ़ कर रहे हैं। नारद जी को बुरा लगा; कहने लगे - हे प्रभु! क्या मैं इतना गंदा हूँ कि जहाँ बैठा था, वहाँ सफ़ाई कर रहे हो! विष्णु जी ने गंभीर होकर कहा – हाँ नारद ! यह सच है, तू बड़ा गंदा है, क्योंकि तूने गुरु नहीं किया है। नारद जी चौक गये। प्रभु ! मैं इतना ब्रह्मज्ञानी; मुझे क्या ज़रूरत है गुरु की ? विष्णु जी ने कहा- नहीं, गुरु तो तुम्हें करना ही पड़ेगा। नारद जी ने पूछा- हे प्रभु! फिर मैं किसे गुरु मानूँ ? विष्णु जी ने बताया कि दक्षिण दिशा में सुबह-सुबह निकल पड़ना; जो पहला मनुष्य मिल जाए, उसे ही अपना गुरु मान लेना। नारद जी वहाँ से चल पड़े। सुबह जब नारद जी दक्षिण दिशा में जा रहे थे तो सामने उन्हें एक मछुआरा आता दिखाई दिया। मछुआरे ने रात को जाल लगाया था, सुबह देखने के लिए आ रहा था कि कितनी मछलियाँ पकड़ में आई हैं। नारद जी घबरा गये...... अब सत्यानाश हो गया; यह मछुआरा मिल गया; क्या अब इसी को गुरु बनाना पड़ेगा ! पर विष्णु महाराज की आज्ञा थी.......क्या करते! उसके पास आ गये; कहने लगे, मुझे दीक्षा दीजिए, मैं आपको गुरु धारण करने आया हूँ । मछुआरा कहने लगा कि मैं तो नीची जाति का हूँ, धीमर हूँ; आप ऊँची जाति के लग रहे हैं, जनेऊ पहन रखा है। कौन हैं आप ? नारद जी ने बताया—मैं ब्रह्मा का बेटा नारद हूँ । मछुआरा बेचारा प गया। ओ नारद महाराज - आप ! यह आप क्या कह रहे हैं ! भला मैं आपको क्या दीक्षा दूँगा ! नारद जी कहने लगे- नहीं ! मुझे आप ही को गुरु धारण करना है; विष्णु जी की आज्ञा है। पहले तो मछुआरा माना नहीं, पर जब नारद जी ने बहुत समझाकर कहा कि विष्णु महाराज की आज्ञानुसार उन्हें आप ही को गुरु करना है, तब कहीं जाकर उसने डरते-डरते बैठकर नारद जी को दीक्षा दी। नारद जी गुरु को प्रणाम करके चल पड़े और वैकुण्ठ में विष्णु जी के पास पहुँचे। विष्णु जी ने पूछा- कहो नारद! गुरु बना आए। नारद जी कहने लगे - गुरु तो बनाया, पर....... 'खामोश नारद' कहते हुए नारद को वहीं रोक लिया विष्णु जी ने । गुरु करके 'पर' लगा रहा है। 'पर' यानी कमी 'पर' यानी निंदा। जा! चौरासी भोग। ज्ञानी होकर मेरे आगे गुरु की निंदा ! जा ! चौरासी भोग । नारद जी डर गये कि अब तो चौरासी लाख योनियों में जाना पड़ेगा;
गधा बनना पड़ेगा, चूहा बनना पड़ेगा, बिल्ली बनना पड़ेगा, कुत्ता बनना पड़ेगा, गंदी-गंदी योनियों में जाना पड़ेगा। सोचने लगे कि अब क्या करूँ ! फिर ध्यान आया कि अंत में गुरुदेव ही रक्षा करते हैं । चल पड़े गुरु के पास । जाकर सारी बात गुरु जी को साफ़-साफ़ बता दी । मछुआरे ने नारद जी को समझा दिया; बचने का उपाय बता दिया। तब नारद जी पुनः विष्णु महाराज के पास वैकुण्ठ में आए और पूछने लगे कि मुझे किन-किन योनियों में जाना होगा? विष्णु जी ने कहा कि चौरासी लाख योनि यानी सभी योनियों में जाना है। नारद जी कहने लगे कि जिन-जिन योनियों में मुझे जाना है, वो कृपा करके किसी जगह लिख दें। जहाँ सब योनियों के नाम विष्णु जी ने लिखे, उसकी एक तरफ नारद जी लेट गये और लोटते हुए दूसरी तरफ से पार हो गये । फिर उठकर कहने लगे—यह लो प्रभु! मैंने चौरासी भोग ली; अब मुझे क्षमा करो । विष्णु जी कहने लगे कि यह क्या बात हुई ! नारद जी ने कहा कि मैं तो चौरासी भोग चुका। विष्णु जी सोच में पड़ गये कि यह कैसे हुआ ! फिर ध्यान आया कि गुरु ने इसे (नारद को ) बचाया है । तब विष्णु जी ने नारद को गले से लगा लिया और गुरु की महिमा बताते हुए समझाया कि गुरु ही इंसान का सच्चा साथी है, क्योंकि वह लोक और परलोक दोनों का साथी है। गुरु में बैठकर ही ईश्वर अपना काम करता है । गुरु के बिना परमात्मा पंगु है । जो राह हमें गुरु ने बताई, वो परमात्मा नहीं बता सकता था। वो हमारे पास था, पर हम फिर भी उससे दूर थे। यह दूरी बिना गुरु के कभी समाप्त नहीं होनी थी, इसलिए गुरु को कभी परमात्मा से कम नहीं मानना है। साहिब की वाणी बार-बार समझा रही है— गुरु हैं बड़े गोविंद ते, मन में देख विचार ।
हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार ।।
आज विज्ञान का युग है। सभी क्षेत्रों में मानव तरक्की पर है। क्या खुद मनुष्य वहाँ तक नहीं जा सकता ! क्या जररूत है गुरु की ! आओ, कुछ देर के लिए गुरु को एक तरफ रखते हैं और स्वयं रूहानी दुनिया में चलते हैं। रुको! रुको! सभी धर्मशास्त्र कह रहे हैं, नहीं! ऐसा नहीं करना । गुरु के बिना अन्दर की दुनिया में जाने का प्रयत्न नहीं करना । साहिब सावधान कर रहे हैं-
यह घट मंदिर प्रेम का, मत कोई बैठो धाय ।
जो कोई बैठे धाय के, वो बिन सिर सेती जाय ।।
साहिब कह रहे हैं कि यह घट ईश्वर का मंदिर है, पर इसमें गुरु के बिना प्रवेश नहीं करना । यदि ऐसा किया तो बिना सिर कटे ही मरोगे। अन्दर की दुनिया में घना अँधकार फैला हुआ है। वहाँ नाम प्रकाश की ज़रूरत है। 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' और नाम गुरु के द्वारा ही मिलेगा । गुरु बिन मुक्ति न पावै भाई । नर्क उर्ध्वमुख वासा पाई ।। गुरु बहुत ज़रूरी है।
गुरु बिन पढ़े जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिले भगवाना ।।
गुरु बिन प्रेत जन्म सो पावै । वर्ष सहस्र गरभ रहावै ।।
गुरु बिन दान पुण्य जो करहीं । मिथ्या होय कबहुँ नहिं फलहीं ।।
गुरु बिन भर्म न छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ।। निगुरा करे मुक्ति की आसा । कैसे पावै मुक्ति निवासा ।।
औरो शूकर देह सो पावै । सतगुरु बिना मुक्ति नहिं पावै ।।
गुरु बिन आतस कैसे जाने । सुख सागर कैसे पहिचाने।।
भक्ति पदारथ कैसे पावै । गुरु बिन कौन राह बतलावै ।।
गुरु बिन लख भरमे चौरासी । जन्म अनेक नरक के वासी ।।
गुरु बिन पशु जन्म सो पावै । फिर फिर गर्भवास में आवै ।।
साहिब कह रहे हैं, गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिलेगी। गुरु के बिना तो मनुष्य नरक में ही जायेगा । जो गुरु के बिना वेद, पुराण आदि पढ़ते हैं, उन्हें प्रमात्मा नहीं मिलता। गुरु के बिना तो प्रेत योनि में भी जा सकता है और हज़ार साल का महादुख भोगना पड़ सकता है । जो गुरु के बिना दान, पुण्य आदि करते हैं, उनके सब कर्म बेकार जाते हैं; वो फलित नहीं होते । गुरु के बिना कितने भी उपाय कर लो, भ्रम नहीं छूट सकता है। निगुरे इंसान की मुक्ति की आशा बेकार है। गुरु के बिना आत्म-ज्ञान नहीं हो सकता है । गुरु के बिना जीव चौरासी में ही फिरता रहेगा और बार-बार गर्भवास में आता रहेगा । इसलिए समझाते हुए कह रहे हैं-
तेहि कारण निश्चय गुरु कीजै । सुर दुरलभ तन खोय न दीजै ।।
कह रहे हैं कि यह सब विचारकर गुरु ज़रूर करना । देवताओं को भी दुर्लभ इस मानव-तन को बेकार में नहीं जाने देना ।
2. गुरु और सतगुरु में अन्तर
गुरु और सतगुरु में अन्तर
गुरु और सद्गुरु में अन्तर क्या है ? अगर हम सद्गुरु शब्द पर चिंतन करते हैं तो साहिब से पहले यह शब्द नहीं मिलता है । यह शब्द पहले प्रचलित नहीं था। गुरु शब्द था। तो क्या गुरु शब्द का विरोध कर रहे हैं ? नहीं! पर पहले जो गुरु लोग थे, वो तीन - लोक की बात कर रहे थे । बहुत बड़ा अन्तर है। पहला अन्तर यह कि सगुण और निर्गुण भक्तियों में गुरु कहा गया। संतत्व की धारा में सद्गुरु कहा। सगुण और निर्गुण में भी गुरु का महत्व है। पर वो केवल दिशा देता है कि किस तरह परम-तत्व की प्राप्ति करनी है, किस तरह साधना करनी है। पर गुरु ने पार करने की जिम्मेवारी नहीं ली है। संसार सागर से पार होने के लिए आपको अपना प्रयास करना है, अपनी चेष्टा करनी है। यानी यह केवल मार्गदर्शक हुआ। कालांतर में जितने भी गुरु-शिष्य हुए, उनमें संवाद भी हुए, युद्ध भी हुए, पर संतत्व की धारा कह रही है-
गुरु का वचन मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ॥
विचार भी नहीं करना है । सद्गुरु की इतनी महिमा के पीछे कुछ कारण है। सद्गुरु आपको साधन करने के लिए नहीं बोलता है। वो आपको संसार-सागर से पार कर देता है । दोनों के काम में अन्तर हुआ कि नहीं ! साहिब नहीं कह रहे हैं कि आप कमाई करो, साधना करो । वो सीधा कह रहे हैं कि सद्गुरु आपको पार कर देगा ।
तीन लोक नव खण्ड में, गुरु से बड़ा न कोय ।
कर्त्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय ॥
सतगुरु दीन दयाल जी, तुम लग मेरी दौड़ ।
जैसे काग जहाज पर, सूझत और न ठौर ॥
क्या अन्तर है ? बहुत बड़ा तत्वविज्ञान है; तार्किक अन्तर है । सद्गुरु स्वयं ही आपको चेतन कर देगा। वो आपके अन्दर ईश्वरीय सत्ता प्रकट कर
देगा । सद्गुरु परमात्मा को प्रगट कर देता है । ऐसी गारंटी पहले किसी ने नहीं दी। किसी ने पहले ऐसा कुछ नहीं कहा। सत्य तक पहुँचने के लिए सद्गुरु की ज़रूरत पड़ेगी - ही पड़ेगी । सद्गुरु यानी एक पूर्ण गुरु । सगुण-निर्गुण में यदि गुरु पहुँचा हुआ भी है, तो भी सदा के लिए हमें भवसागर से छुटकारा नहीं दिला सकता है । क्योंकि उसकी पहुँच निरंजन तक ही होगी । सगुण-निर्गुण भक्ति में गुरु जो नाम देता है, वो सार नाम नहीं होता, वो काया से जपने वाला नाम होता है, वो 52 अक्षर की सीमा में आ जाता है, इसलिए उसे पाकर जीव कतई अमर - लोक नहीं पहुँच सकता है। हाँ, स्वर्ग लोक, ब्रह्म लोक, निरंजन लोक आदि की प्राप्ति हो सकती है और थोड़ी देर के लिए मुक्ति भी मिल सकती है, पर कर्मों के क्षीण होने पर फिर मृत्युलोक में आना पड़ता है, सदा के लिए छुटकारा नहीं मिल पाता। जो कहा जाता है कि भगवान ने फलाने को मुक्ति दे दी, वो इन्हीं मुक्तियों की बात होती है, जो निरंजन की सीमा में आती हैं, जिन्हें पाकर जीव सदा के लिए काल के जाल से मुक्त नहीं हो पाता । अमर-लोक ले जाने के लिए सद्गुरु के सच्चे नाम (विदेह नाम, सार नाम, निःशब्द ) की ज़रूरत पड़ती है । वहाँ अपनी कमाई से, अपने ज़ोर से कतई नहीं पहुँचा जा सकता है । वहाँ पहुँचने के लिए सद्गुरु की कृपा की आवश्यकता होती है। पहले तो वो नाम की ताक़त उसे वहाँ पहुँचा ही देगी। पर यदि कहीं बीच में अटक गये तो फिर सद्गुरु की कृपा की ज़रूरत पड़ती है । निरंजन और माया किसी भी जीव को इस ब्रह्माण्ड से परे नहीं जाने देते हैं । वो तो किसी को अन्दर की दुनिया में भी नहीं जाने देना चाहते। अनेक बाधाएँ डालकर जीव को भ्रमित कर देते हैं । फिर निरंजन की सीमा से पार जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ निरंजन और माया पूरी ताक़त लगाकर जीव को खींचते हैं। करोड़ों प्रयत्न करने पर भी जीव वहाँ से पार नहीं हो सकता है। सद्गुरु जीव को अपनी शक्ति देकर पार करता है । तभी तो कहा है
केते पढ़ि गुनि पचि मुए, योग यज्ञ तप लाय ।
बिन सतगुरु पावे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय ।।
तो आओ, सद्गुरु यानी एक पूर्ण गुरु की तरफ चलते हैं । वर्तमान युग में भारत में हज़ारों पंथ हैं और लाखों गुरु हैं। करीब करीब 60 लाख गुरु पूंजीकृत (रजिस्ट्रड) हैं और कई लाख ऐसे भी होंगे। इनमें से अधिकांश गुरु परमात्मा के नाम पर धन इकट्ठा करके अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं और बड़े ठाठ से जीवन व्यतीत कर रहे हैं ।
बहुत गुरु हैं अस जग माहिं । हरें द्रव्य दुख कोऊ नाहिं ।।
साधारण श्रद्धालू इस स्थिति में नहीं होते कि एक सच्चे सद्गुरु को चुन सकें । वे भेड़चाल ही चलते हैं । अत: सच्चाई की खोज करने वालों को सावधान रहना है। उन्हें गुरु धारण करने में औरों की अँधाधुँध नकल नहीं करनी है। 'गुरु' और 'सद्गुरु' । इसे भी समझना होगा अन्यथा साधारण गुरु कोही सद्गुरु मान लिया तो काम नहीं बनेगा, अमर-लोक नहीं पहुँच पाओगे, वैकुण्ठ आदि तक ही सीमित रह जाओगे । सगुण और निर्गुण-दोनों में से किसी भक्ति का ज्ञान देने वाला साधारण गुरु है जबकि सगुण-निर्गुण भक्ति से परे साहिब की भक्ति, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला सद्गुरु है । पर आज तो दुनिया में सभी सद्गुरु बने हुए हैं । ऐसे में फिर जीव तो भटक जाता है न! कुछ सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान देने वाले भी सद्गुरु बने हुए हैं जबकि कुछ ऐसे ही 'सत्लोक'' सत्लोक' कहे जा रहे हैं, पर वास्तव में वे वहाँ पहुँचे ही नहीं हैं । पहली बात तो भक्त-जन समझ सकते हैं यानी जो भी सगुण-निर्गुण भक्ति का ज्ञान दे रहा है, समझ लेना कि ये सद्गुरु नहीं हैं । .. पर ये गुरु वास्तव में वहाँ पहुँचे हैं या नहीं, इसका फैसला कैसे हो ? साहिब जानते थे कि यह कलयुग है, नकली संत-सद्गुरु भी जीवों को भटकाने लग जायेंगे, इसलिए वे सद्गुरु के लक्षण भी समझा गये हैं, जिन्हें संतों ने भी स्वीकार किया है। वास्तव में 'सद्गुरु' शब्द संतकाल से पहले नहीं मिलता है । 'सद्गुरु' नाम दिया ही सर्वप्रथम कबीर साहिब ने। पहले गुरु की बात होती थी, पहले सगुण-निर्गुण भक्ति की बात होती थी, पर साहिब ने ही सर्वप्रथम सद्गुरु भक्ति की - बात कही। उन्हें प्रथम संत-सद्गुरु कहा जाता है । वास्तव में वे संत नहीं थे। वे तो संत-सम्राट थे । उन्होंने संतों का सृजन किया । इसलिए सब
संतों ने उनकी बात को माना । जो साहिब की बात पर चले, जिन्हें उन्होंने अमर-लोक पहुँचाया, जिन्हें उन्होंने सत्पुरुष का दर्शन करवाया, वे ही संत-सद्गुरु कहलाए। साहिब तो एक सच्चे सद्गुरु की पहचान बताकर गये हैं । सद्गुरु के लक्षण बताते हुए वो कह रहे हैं- -
गुरु के लक्षण कहत हौं, सुनो धीर चितलाय ।।
गुरु के लक्षण बताते हुए साहिब ने पहला लक्षण निर्वासना बताया है। आओ, ये लक्षण समझें, जिससे हम एक सच्चे सद्गुरु की खोज में भ्रमित होने से बच सकें । 1. निर्वासना : निर्वासना से मतलब है कि वो स्त्री- सहवास कभी न करे । इसके लिए या तो बालब्रह्मचारी हो । बालब्रह्मचारी है तो समझो कि कभी माया में फँसा ही नहीं है । ज्ञान चदरिया जिसने लीनी, मैली कर धर दीनी ।
एक कबीर जतन से लीनी, ज्यों की त्यों धर दीनी ।।
विवाह से मतलब ही इंद्रिय सुख की प्राप्ति है और इंद्रिय सुख का आनन्द लेने वाला सच्चा गुरु कैसे हो सकता है ! यदि कोई गुरु इंद्रियों के सुख में डूबा हुआ है तो समझो कि अभी तक उसे आत्मा का सुख मिला ही नहीं है। अतः वो अपने शिष्यों को इंद्रिय सुखों से दूर सच्चे आनन्द की ओर कैसे ले जा सकता है ! साहिब यहाँ चेता कर कह रहे हैं-
जाका गुरु है गीरही, चेला गिरही होय ।
कीच कीच के धोवते, मैल न जावे कोय।।
जिसका गुरु गृहस्थ है, उसका शिष्य चाहे सन्यासी ही क्यों न हो, वो भी गृहस्थ हो जायेगा, क्योंकि कीचड़ का दाग़ कीचड़ से तो साफ़ नहीं हो सकता है। इसलिए कबीर साहिब ने बालब्रह्मचारी गुरु करने को कहा है। बालब्रह्मचारी गुरु का मिलना बड़ा कठिन है, इसलिए यदि ऐसा गुरु न मिले तो दूसरे ऐसे गुरु की खोज करनी चाहिए, जो ज्ञान हो जाने पर सन्यासी हो चुका हो । गुरु- पद पर आसीन होने के लिए विषय-वासनाओं का त्याग अति अनिवार्य है। शिष्य ने तो अपना तन, मन, धन गुरु को समर्पित करना है। इसलिए तो कह रहे हैं-
तन मन वाको दीजिए, जाके विषया नाहिं ।।
नानक देव जी कह रहे हैं-
यह दुनिया सकली तजी, लियो वैष वैराग ।
कह नानक सुन रे मना, ता घट ब्रह्म निवास ।।
वर्तमान में गुरुओं को इस एक लक्षण की कसौटी पर उतारने की कोशिश करेंगे तो अधिकांश इसी में फेल हो जायेंगे । 2. निर्बन्धन : निर्बन्धन से मतलब है कि उसका भाई, बहन, बेटा, बेटी, नातेदार आदि से गहरा संबंध नहीं होना चाहिए। उसका नाता मात्र शिष्यों से होना चाहिए। यदि घर-परिवार के लोगों से विशेष प्रेम होगा तो शिष्यों द्वारा दिये जाने वाले धन को उन्हीं की सेवा में लगा देगा और परमार्थ के काम में नहीं लगायेगा। इसके अलावा अंत में पक्षपात होगा। वो जाते समय अपनी गद्दी अपने बेटे को या किसी सगे-संबंधी को देकर जायेगा, चाहे वो उसके लायक हो या नहीं। साहिब ने इस विषय पर सतर्क किया है।
बीज बिंदु नहीं चले गुरु आई । नाद बिंद से चले गुरु आई ।।
कहा कि शब्द पुत्र को ही गद्दी देनी है। यदि कोई अपने बेटे को या रिश्तेदार को गद्दी देकर जा रहा है तो समझो कि मोह-माया में फँसा है । तब आपकी आत्मा का काम नहीं हो पायेगा।
बंधे को बंधा मिले, छूटे कौन उपाय।
कर सेवा निर्बन्ध की, पल में लेय छुड़ाय ।।
3. सारग्राही : गुरु को अपनी ही कमाई से खाना है । किसी से माँग कर नहीं
खाना है। शिष्यों के धन से नहीं खाना है । साहिब तो कह रहे हैं-
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगो भीख।
माँगन मरना भला, सतगुरु देते सीख।।
यदि गुरु स्वयं माँग कर खा रहा है तो शिष्यों को भी यही सीख देगा। वो भी कहीं पर्चियाँ कटवाकर माँगेंगे तो कहीं ऐसे ही हाथों-हाथ माँगना शुरू हो जायेंगे । इसलिए साहिब चेता रहे हैं- स्वांग यती का पहिन के घर घर माँगी भीख । पूरा सतगुरु ना मिला, सुनी अधूरी सीख । , 4. निर्लोभी : गुरु को शिष्य के धन से प्रेम नहीं होना चाहिए । शिष्य के द्वारा
दिये जाने वाले धन को परमार्थ के काम में लगाने वाला होना चाहिए । यदि वो अपने निजि स्वार्थ के लिए उसका इस्तेमाल कर रहा है तो समझो—
गुरु लोभी शिष्य लालची, दोनों खेले दाँव ।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पत्थर की नाव।।
5. सत्यवान एवं निष्कामी : सत्य को तो संतों ने सब धर्मों का मूल माना है ।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप ।
जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप ।।
स्वयं सत्यवादी होने वाला गुरु ही शिष्यों को सत्य की ओर ले जा सकता है। उस सत्य तक पहुँचने के लिए साहिब ने गुरु, शिष्य और नाम- - तीनों की सत्यता पर बल दिया है।
गुरु सत्य नाम सत्य हो, आप सत्य जो होय ।
तीन सत्य जब एक हों, विष से अमृत होय।।
6. सर्वज्ञी : गुरु को सभी धर्म - शास्त्रों का ज्ञान होना चाहिए। उसे आन्तरिक
मंडलों का भी पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए। तभी वो शिष्य की शंकाओं का
निराकरण कर सकेगा । यहाँ पर साहिब कह रहे हैं-
जा गुरु ते भ्रम ना मिटे, भ्रांति न जिव का जाय ।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय।।
7. सातवाँ लक्षण : सबसे बड़ी बात यह है कि उसकी आत्मा परमात्मा में
मिल चुकी होनी चाहिए ।
सतपुरुष को जानसी, तिसका सतगुरु नाम ।।
जिस गुरु में उपर्युक्त छः लक्षण हों, उसी में अंतिम सातवाँ लक्षण भी हो सकता है और जिसमें उपर्युक्त सातों लक्षण हों, वो ही एक पूर्ण गुरु हो सकता है। ऐसा सद्गुरु परमात्मा का सच्चा प्रतिनिधि हो सकता है। यदि आप पूर्ण गुरु की तलाश में हैं तो ऊपर बताए गये सद्गुरु के प्रमुख सात लक्षणों को ध्यान में रखना । जब ये लक्षण किसी में मिल जाएँ तो समझना कि पूर्ण गुरु मिल गये । यदि ये लक्षण नहीं मिलें तो कबीर साहिब इस विषय में कह रहे हैं—
जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा।।
आमतौर पर भक्तों में एक वहम देखा गया है । वे समझते हैं कि यदि
उन्होंने कोई गुरु पहले से ही किया हुआ है तो अन्य गुरु करने से उन्हें पाप लग जायेगा। नहीं, ऐसा नहीं है । उपर्युक्त शब्द में साहिब ने यही तो समझाया है कि जब तक पूर्ण गुरु न मिल जाएँ, तब तक दस-पाँच गुरु अगर कर भी लो तो कोई बात नहीं है, क्योंकि पूर्ण गुरु बड़ी मुश्किल से मिलता है । पर जब पूर्ण गुरु मिल जाए तो अन्य गुरु करना वैसा ही है जैसे समुद्र में गोता लगाते-लगाते अचानक हीरा मिल जाए और उसे पुन: समुद्र में फेंक दिया जाए। बस, यह समझ लेना कि बिना सद्गुरु के संसार-सागर से पार करने वाला कोई नहीं है । सतगुरु के उपदेश का, सुनिया एक विचार ।
जो सतगुरु मिलता नहीं, जाता यम के द्वार ।।
यम द्वारे में दूत सब, करते ऐं चातानि ।
उनते कभू न छूटता, फिरता चारों खानि ।।
चारि खानि में भरमता, कबहुँ न लगता पार ।
सो फेरा सब मिटि गया, सतगुरु के उपकार ।।
सद्गुरु का भेद देते हुए साहिब धर्मदास को समझाते हैं—
भृंग मता होय जेहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
कह रहे हैं कि जिसके पास भृंग मता हो, वही सच्चा गुरु है, वही सद्गुरु है। अब यह भृंग मता क्या है ? 27 लाख कीट हैं । भृंगा उन सबमें निराला है । वो केवल पुरुष ही है । उसकी मादा नहीं है। उसका वंश कैसे चलता है ? वो किसी भी कीड़े को पकड़ लाता है। मिट्टी का घर बनाता है वो । उड़ता भी बड़ी स्पीड में है । उसकी आवाज़ में एक जादू है। वो कीड़े को मिट्टी के घर में रख कर अपनी आवाज़ सुनाता है । बड़ी रोमांचित करने वाली है उसकी आवाज़। उस आवाज़ से उसे वो अपने जैसा कर देता है । पर यदि कीड़ा उसकी आवाज़ सुने ही न तो नहीं हो पाता है वो उसकी तरह। तो भृंगा उसे छोड़कर इधर-उधर चक्कर काट कर आता है और फिर आकर अपना शब्द सुनाने लगता है। यदि वो फिर भी न सुने तो भृंगा फिर उड़कर चला जाता है और फिर एक चक्कर काटकर आता है और अपनी आवाज़ सुनाने लगता है । यदि वो सुन ले तो उसकी तरह हो जाए, पर यदि तीसरी बार भी न सुने तो भृंगा उसे छोड़ देता है। वो कीड़ा ही रह जाता है, भृंगा नहीं बन पाता है। अब वो दूसरे कीड़े को पकड़कर लाता है और यही खेल उसके साथ भी शुरू करता है ।
यही काम सद्गुरु का है शिष्य के कान में अपना शब्द सुनाता है। सद्गुरु भी शिष्य को अपनी सुरति से अपने समान कर देता है। कीड़े को कुछ नहीं करना है। पकड़कर भी उसे भृंगा ही लाता है, नीचे गिराकर शब्द भी उसे खुद ही सुनाता है। उस कीड़े को तो केवल सहमति जतानी है, शब्द सुनना है। पर वो सुने ही नहीं तो कैसे होगा ! यहां पर नोट करने वाली बात यह है कि अगर सद्गुरु पूरा होगा तो आप में आटोमैटिक बदलाव आना शुरु हो जायेगा । मन काबू में आने लगेगा । इसी पर साहिब कह रहे हैं-
भृंगी शब्द कीट जो माना ।
वरण फेर आपन कर जाना ॥
जो कीड़ा भृंगे का शब्द सुन लेता है, वो अपना वर्ण भूलकर उसकी तरह हो जाता है। यानी गोबरैला होगा तो वो अपनी आदतें भूलकर भृंगा हो जायेगा, ततैया होगा तो वो ततैया वाली आदतें, ततैया वाले गुण छोड़कर भृंगे के गुण अपना लेगा, उसकी तरह ही हो जायेगा ।
कोई कोई कीट परम सुखदाई ।
प्रथम आवाज़ गहे चित्तलाई ॥
पर साहिब कह रहे हैं कि कोई-कोई कीट बड़ा सुखदाई होता है, जो पहली आवाज़ में ही शब्द को ग्रहण कर लेता है और उसी की तरह हो जाता है ।
कोई दूजे कोई तीजे मानै ।
तन मन रहित शब्द हित जानै ॥
कोई दूजे और कोई तीजे शब्द में ग्रहण करता है । कुछ-कुछ क कठिन हैं, जो पहली में परिवर्तित नहीं होते हैं, दूसरी या तीसरी आवाज़ में परिवर्तित हो जाते हैं । भृंगी शब्द कीट ना गहई । तौ पुनि कीट आसरे
रहई ॥
पर जो कीड़ा उसका शब्द सुनता ही नहीं, तीसरी बार भी डर जाता है या सुनना नहीं चाहता, वो फिर कीड़ा ही रह जाता है। गुरुशब्द निश्चय सत्य माने, भृंगि मत तब पावई ।
तजि सकल आसा शब्द बासा, कागा हंस कहावई ॥
ऐसे ही गुरु शब्द सुखदाई है । भृंगे की भू-भू की प्रकिया में स्पन्दन है। कुछ कीट पहले में नहीं हो पाते हैं परिवर्तित । क्यों नहीं हुए? क्योंकि समर्पित नहीं होते । जब तक समर्पित होकर नहीं सुनता, उसका परिवर्तन नहीं हो पाता। फिर तीन बार में भी न हो तो भृंगा उसे छोड़ देता है, दूसरे को ढूँढ़ता है तो पुनि कीट आसरे रहई .. फिर नहीं बन पाता है वो भृंगा, कीट ही रह जाता है। उसने सहमति नहीं दी। यह सहमति साधारण नहीं है ।
पहले दाता शिष्य भया, जिन तन मन अरपा शीश ।
पीछे दाता सतगुरु भया, जिन नाम दिया बखशीश ॥
सभी सहज-मार्ग, सहज - मार्ग कहे जा रहे हैं, पर कमाई - कमाई क जा रहे हैं । ये दो पहलू हैं । साहिब कह रहे हैं कि तुम्हें कुछ भी नहीं करना है, सद्गुरु सभी चीजें उत्पन्न कर देगा । ये चीजें अपने-आप आपमें आती जायेंगी । ज्ञान भी खुद ही आ जायेगा, भक्ति भी खुद ही आ जायेगी, मन पर कण्ट्रोल भी खुद ही आ जायेगा, रूहानियत भी खुद ही आ जायेगी, शक्तियाँ भी खुद ही आती जायेंगी। आप कहेंगे कि हम नहीं करेंगे तो कैसे होगा ! यह जो 'हम' है, इसे संचालित कौन कर रहा है नाम के बाद ! गुरु की ताक़त ही इसका संचालन कर रही है, इसलिए अपनी 'मैं' नहीं लाना बीच में, केवल सहमति रखना । एक ने कहा कि यदि गुरु की कृपा से ही सब होता है तो जो हम ठगी कर रहे हैं, वो भी उसकी ही इच्छा से होता होगा । मैंने कहा – सुन, पूरा-पूरा जबाव दूँगा। यह तब होता है जब हम पूर्ण रूप से समर्पित नहीं हो जाते हैं । आप जब पूर्ण रूप से समर्पित हो जाते हैं तब चाहकर भी ग़लत नहीं कर पायेंगे। अभी आप प्रभु के भरोसे चल रहे हैं, प्रारब्ध आपका संचालन कर रहा है, कर्मानुसार आपको फल मिलेगा। मान लो कि कुँए में गिरना होगा तो पक्का गिरोगे। पर जब सद्गुरु पर आश्रित होते हैं सद्गुरु कर्म को एक तरफ कर देते हैं। वो घटना टल जाती है।
कोटि कर्म पल में कटे, जो आवे गुरु ओट ॥
जो भी काम करेंगे, जो भी नुकसान या अहित होने वाला होगा, वहाँ गुरु की ताक़त रक्षा करेगी। जो भी होगा वो हित में ही होगा। इसलिए हित-
अनहित सबमें उसी की रज़ा मानना । ...तो कहने का भाव है कि सब कुछ वही करेगा, तुम्हें कुछ नहीं करना है । आप ही हम बह जायेंगे, जो न सुरति करौ मम साईंया, हम हैं
भवजल माहिं ।
गहोगे बाहिं ॥
अर्थात साहिब ने इंगित किया कि वो अविलंब बदल देगा । कैसा बना देगा? स्वयंमय बना देगा | यही कह रहे हैं कि परिश्रम करने की ज़रूरत नहीं है। दुनिया में अनेक गुरु हैं जो कहते हैं कि आपको पार कर देंगे, पर जब उनके लोगों को देखते हैं तो पता चलता है कि उनमें कोई बदलाव नहीं है । यानी वे सच्चे गुरु नहीं हैं। इसलिए साहिब ने सतर्क करते हुए कहा-
भृंग मता होय जिहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
जैसे भृंगा कीट के बिना प्रयास के उसे बदल देता है, ऐसे ही शिष्य की चेष्टा बिना ही यह काम गुरु कर देता है। आप नहीं देख रहे हैं अपने बच्चों को कि उनमें आपकी आदतें आ रही हैं। यह आपका एक शुक्राणु है । गुरु की सुरति शिष्य की आत्मा तक पहुँची। उसमें सब चीज़ें सहज ही आ गयीं। फिर काम, क्रोध नहीं लगेगा। साहिब ने ऐसे गुरु के लिए कहा कि जो भृंग की तरह बदलने की क्षमता रखता हो । 'गुरु मिलने से झगड़ा ख़त्म हो गया॥' अध्यात्म की खोज समाप्त हो जाती है। योग में यह प्रावधान नहीं है। सहज मार्ग क्या है ? पूरी जिम्मेदारी गुरु की है। आपकी मोह- माया हटती जायेगी, आपके अंदर के विकार समाप्त होते जायेंगे, एक चौकीदार आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा रहेगा हमेशा । 'मेरा हरि मौको भजे, मैं सोऊँ पाँव पसार ॥ ' वाली बात हो जायेगी । यह है – सहज- मार्ग । तुम्हें कुछ नहीं करना है। यह है – भृंग मता । - गुरु को कीजे दण्डवत्, कोटि कोटि प्रणाम ।
कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान॥
आदमी तो शंका में है कि हमें क्या करना है । कोई कुछ कह रहा है, कोई कुछ। अपनी ताक़त से आप माया को नहीं छोड़ सकते हैं। गुरु नाम की ताक़त खुद यह काम करेगी।
जो आपको कह रहा है कि कुछ कर, कमाई कर, समझना कि वो संत नहीं है, संत वेश में कोई पाखण्डी है, जिसे यथार्थ ज्ञान कुछ भी नहीं है, केवल किताबों से पढ़कर सुना रहा है। संत तो सक्षम होता है, पर वो अक्षम है; संत आँखों देखी वाली बात करता है, वो किताबों वाली बात कर रहा है; संत यथार्थ में अमर - लोक से होकर आते हैं, उसने कभी अमर-लोक सपने में भी नहीं देखा है । यदि सपने में भी देखा होता तो जान जाता कि अपनी ताक़त से नहीं देखा, कोई दिखा गया। यह पक्की बात है कि सपने में भी अमर - लोक नहीं देखा जा सकता है। फिर वहाँ पहुँचना तो बड़ी दूर की बात है । इसलिए जिसके पास भृंग मते वाली थ्यूरी नहीं है, वो आपका बहुत बड़ा बैरी है, क्योंकि आपको धोखे में रखे हुए हैं। इस बात को अपने दिल में गहराई से उतार लेना कि वो आपका सर्वनाश करने पर तुला है, जो कह रहा है कि कुछ कमाई कर, कुछ साधना कर, तभी कुछ होगा। क्योंकि उस पाखण्डी को पता नहीं है कि- -
ना कुछ किया ना करि सका, ना करने योग शरीर ।
जो कुछ किया साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥
जो कमाई करने को कह रहा है, इसका सीधा सा मतलब है कि वो कहना चाह रहा है कि उसने भी अपनी कमाई से ही सब कुछ हासिल किया है । इससे स्पष्ट हो जाता है कि वो कभी अमर - लोक गया ही नहीं है । उसका गुरु भी संत नहीं हो सकता है। यदि होता तो वो ऐसी बात नहीं करता । कहीं से भी उसका मत संत-मत नहीं है, कहीं भी उसका मत भृंग-मत नहीं है। वो एक झूठा है, जो अपने साथ-साथ आपको भी भवसागर में डुबाने में लगा हुआ है। उसका मुद्दा केवल धन कमाना हो सकता है, आपकी मुक्ति नहीं । हमारे देश में शीश पर हाथ रखकर नाम दिया जाता है । कोई कहता है कि हमें गुरु जी ने माइक पर नाम दिया, कोई कहता है कि टी. वी. पर दिया। नहीं, नाम ऐसे नहीं दिया जाता। एक ने मुझसे भी पूछा कि यदि आपको हज़ार आदमी को एक साथ नाम देना पड़ेगा तो क्या तब भी ऐसे ही शीश पर हाथ रखकर देंगे? मैंने कहा कि यदि एक लाख आदमी को भी नाम देना पड़ा तो ऐसे ही दूँगा, क्योंकि नाम देने
की विधि ही यही है। वो ऐसे ही दिया जाता है। यही सिस्टम है नाम का। क्योंकि वो किरणें शिष्य को प्रदान करनी हैं । एक शराबी मेरे पास आया, थोड़े दिन हुए थे शराब छोड़े; कहा नाम दो। मैंने कहा कि अभी थोड़ा कण्ट्रोल करो, बाद में दूँगा। बाद में वो किसी दूसरे महात्मा से नाम लेकर आया, अपने ही गुरु को गालियाँ देने लगा, कहने लगा कि मैं शराब में धुत था तो नाम दे दिया। क्या ऐसे देते हैं नाम ! मुझे तो पता भी न चला कुछ। यानी गुरु जी को शिष्य की कुछ ख़बर ही नहीं थी कि क्या मामला है । तभी कहा – 'पानी पीजिये छानि के, गुरु कीजे जानि के ॥' गुरु जी तो बस अपनी संख्या बढ़ाने में लगा था। मैं समाज को कह रहा हूँ कि ऐसे लोगों से सतर्क रहो, जिनको आपकी ख़बर ही नहीं है कि क्या कर रहे हैं आप। यदि गुरु जी को आपके पाप कर्मों की ख़बर नहीं है तो फिर वो आपका कल्याण भी नहीं कर पायेगा, क्योंकि जब काल आपकी आत्मा को लेने आयेगा तो भी उसे ख़बर न होगी और वो आपको कहीं भी जाकर पटक देगा। आपका वो पाखण्डी गुरु आपको काल से बचा नहीं पायेगा । इसलिए पूर्ण गुरु की खोज करनी होगी। साहिब के ये शब्द याद रखने होंगे-
भृंग मता होय जिहि पासा । सोई गुरु सत्य धर्मदासा ॥
काग पलट हंसा कर दीना ।
ऐसा नाम सतगुरु मैं दीना ॥