कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Katha Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ
पृष्ठ 153, कुल 182 में से
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वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१
| भवति । य एतद्विदुः स्वात्मप्रवृत्तिसाक्षिभूतमेकं ब्रह्मामृता अमरणधर्माणस्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | अपने अन्तःकरणकी प्रवृत्तिके साक्षी-भूत इस एक ब्रह्मको जो लोग जानते हैं वे अमर–अमरणधर्मा हो जाते हैं ॥ २ ॥ |
| कथं तद्भयाज्जगद्वर्तत इत्याह— | उसके भयसे जगत् किस प्रकार व्यापार कर रहा है ? सो कहते हैं— |
सर्वशासक प्रभु
भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥
इस ( परमेश्वर ) के भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है तथा इसीके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥३॥
| भयाद्भीत्या परमेश्वरस्याग्निः तपति भयात्तपति सूर्यो भयात् इन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । न हीश्वराणां लोकपालानां समर्थानां सतां नियन्ता चेद्वज्रोद्यतकरवन्न स्यात्स्वामिभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरुपपद्यते ॥ ३ ॥ | इस परमेश्वरके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तप रहा है तथा इसीके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है। यदि सामर्थ्यवान् और ईशन-शील लोकपालोंका, हाथमें वज्र उठाये रखनेवाले [इन्द्र] के समान कोई नियन्ता न होता तो स्वामीके भयसे प्रवृत्त होनेवाले सेवकोंके समान उनकी नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती थी ॥ ३ ॥ |