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कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४१


भवति । य एतद्विदुः स्वात्मप्रवृत्तिसाक्षिभूतमेकं ब्रह्मामृता अमरणधर्माणस्ते भवन्ति ॥ २ ॥अपने अन्तःकरणकी प्रवृत्तिके साक्षी-भूत इस एक ब्रह्मको जो लोग जानते हैं वे अमर–अमरणधर्मा हो जाते हैं ॥ २ ॥

कथं तद्भयाज्जगद्वर्तत इत्याह—उसके भयसे जगत् किस प्रकार व्यापार कर रहा है ? सो कहते हैं—

सर्वशासक प्रभु

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।
भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥

इस ( परमेश्वर ) के भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तपता है तथा इसीके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥३॥

भयाद्भीत्या परमेश्वरस्याग्निः तपति भयात्तपति सूर्यो भयात् इन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः । न हीश्वराणां लोकपालानां समर्थानां सतां नियन्ता चेद्वज्रोद्यतकरवन्न स्यात्स्वामिभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरुपपद्यते ॥ ३ ॥इस परमेश्वरके भयसे अग्नि तपता है, इसीके भयसे सूर्य तप रहा है तथा इसीके भयसे इन्द्र, वायु और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है। यदि सामर्थ्यवान् और ईशन-शील लोकपालोंका, हाथमें वज्र उठाये रखनेवाले [इन्द्र] के समान कोई नियन्ता न होता तो स्वामीके भयसे प्रवृत्त होनेवाले सेवकोंके समान उनकी नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती थी ॥ ३ ॥

१४२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१४२कठोपनिषद्[ अध्याय २

ईश्वरज्ञानके बिना पुनर्जन्मप्राप्ति

तच्च,और उस (भयके कारण-स्वरूप ब्रह्म) को—

इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक्शरीरस्य विस्रसः ।
ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥

यदि इस देहमें इसके पतनसे पूर्व ही [ब्रह्मको] जान सका तो बन्धनसे मुक्त होता है यदि नहीं जान पाया तो इन जन्म-मरणशील लोकोंमें वह शरीर-भावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है ॥ ४ ॥

इह जीवन्नेव चेद्यद्यशकत शक्नोति शक्तः सञ्जानात्येतद्भयकारणं ब्रह्म बोद्धुमवगन्तुं प्राक्पूर्वं शरीरस्य विस्रसोऽवस्रंसनात्पतनात्संसारबन्धनाद्विमुच्यते । न चेदशकद्बोद्धुं ततः अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गाः पृथिव्यादयो लोकास्तेषु सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय कल्पते समर्थो भवति शरीरं गृह्णातीत्यर्थः । तस्माच्छरीरविस्रंसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न आस्थेयः ॥ ४ ॥यदि इस देहमें अर्थात् जीवित रहते हुए ही शरीरका पतन होनेसे पूर्व साधक पुरुषने इन सूर्यादिके भयके हेतुभूत ब्रह्मको जान लिया तो वह संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है; और यदि उसे न जान सका तो उसका ज्ञान न होनेके कारण वह सर्गोंमें जिनमें स्रष्टव्य प्राणियोंकी रचना की जाती है उन पृथिवी आदि लोकोंमें शरीरत्व—शरीरभावको प्राप्त होनेमें समर्थ होता है अर्थात् शरीर ग्रहण कर लेता है। अतः शरीरपातसे पूर्व ही आत्मज्ञानके लिये यत्न करना चाहिये ॥ ४ ॥

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४३

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४३


| यस्मादिहैवात्मनो दर्शनम् आदर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्टमुपपद्यते न लोकान्तरेषु ब्रह्मलोकाद् अन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम् ? इत्युच्यते— | क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इस (मनुष्यदेह) में ही आत्माका स्पष्ट दर्शन हो सकता है। इसमें वह जैसा स्पष्टतया अनुभव होता है वैसा ब्रह्मलोकको छोड़कर और किसी लोकमें नहीं होता और उसका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है; सो किस प्रकार ? इसपर कहते हैं— |

स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य

यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ।
यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥

जिस प्रकार दर्पणमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें आत्माका [ स्पष्ट ] दर्शन होता है तथा जैसा स्वप्नमें वैसा ही पितृ-लोकमें और जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [ अस्पष्ट ] भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह [ सर्वथा स्पष्ट ] अनुभव होता है ॥ ५ ॥

| यथाऽऽदर्शे प्रतिबिम्बभूतम् आत्मानं पश्यति लोकोऽत्यन्तविविक्तं तथेहात्मनि स्वबुद्धौ आदर्शवनिर्मलीभूतायां विविक्तम् आत्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः । <br><br> यथा स्वप्नेऽविविक्तं जाग्रद्वास-नोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तम् | जिस प्रकार लोक दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुए अपने-आपको अत्यन्त स्पष्टतया देखता है उसी प्रकार दर्पणके समान निर्मल हुई अपनी बुद्धिमें आत्माका स्पष्ट दर्शन होता है—ऐसा इसका अभिप्राय है। <br><br> जिस प्रकार स्वप्नमें जाग्रद्वासनाओंसे प्रकट हुआ दर्शन अस्पष्ट होता है उसी प्रकार पितृलोकमें |

१४४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१४४कठोपनिषद्[ अध्याय २

| एव दर्शनमात्मनः कर्मफलोप-भोगासक्तत्वात् । यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्मरूपं परीव ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्व-लोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मनः। एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्र-प्रामाण्यादवगम्यते। छायातपयो-रिवात्यन्तविविक्तं ब्रह्मलोक एव एकस्मिन् । स च दुष्प्रापोऽत्यन्त-विशिष्टकर्मज्ञानसाध्यत्वात् । तस्मादात्मदर्शनायेहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ५ ॥ | भी अस्पष्ट आत्मदर्शन होता है, क्योंकि वहाँ जीव कर्मफलके उप-भोगमें आसक्त रहता है। तथा जिस प्रकार जलमें अपना स्वरूप ऐसा दिखलायी देता है, मानो उसके अवयव विभक्त न हों उसी प्रकार गन्धर्वलोकमें भी अस्पष्टरूपसे ही आत्माका दर्शन होता है। अन्य लोकोंमें भी शास्त्रप्रमाणसे ऐसा ही [ अर्थात् अस्पष्ट आत्मदर्शन ही ] माना जाता है। एकमात्र ब्रह्म-लोकमें ही छाया और प्रकाशके समान वह आत्मदर्शन अत्यन्त स्पष्टतया होता है। किन्तु अत्यन्त विशिष्ट कर्म और ज्ञानसे साध्य होनेके कारण वह ब्रह्मलोक बड़ा ही दुष्प्राप्य है। अतः अभिप्राय यह है कि इस मनुष्यलोकमें ही आत्मदर्शनके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ ५ ॥ | | कथमसौ बोद्धव्यः किं वा तदवबोधे प्रयोजनमित्युच्यते— | उस आत्माको किस प्रकार जानना चाहिये और उसके जान-नेमें क्या प्रयोजन है ? इसपर कहते हैं— |

आत्मज्ञानका प्रकार और प्रयोजन

इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।
पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४५


[ पृथक्-पृथक् भूतोंसे उत्पन्न होनेवाली ] इन्द्रियोंके जो विभिन्न भाव तथा उनकी उत्पत्ति और प्रलय हैं उन्हें जानकर बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता ॥ ६ ॥

इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकारणेभ्य आकाशादिभ्यः पृथग् उत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात् केवलाच्चिन्मात्रात्मस्वरूपात्पृथग्भावं स्वभावविलक्षणात्मकतां तथा तेषामेवेन्द्रियाणामुदयास्तमयौ चोत्पत्तिप्रलयौ जाग्रत्स्वापाद्यवस्थापेक्षया नात्मन इति मत्वा ज्ञात्वा विवेकतो धीरो धीमान्न शोचति। आत्मनो नित्यैकस्वभावस्य अव्यभिचाराच्छोककारणत्वानुपपत्तेः। तथा च श्रुत्यन्तरं “तरति शोकमात्मवित्” (छा० उ० ७।१।३) इति ॥ ६ ॥अपने-अपने विषयको ग्रहण करनारूप प्रयोजनके कारण अपने कारणरूप आकाशादि भूतोंसे पृथक्-पृथक् उत्पन्न होनेवाली श्रोत्रादि इन्द्रियोंका जो अत्यन्त विशुद्धस्वरूप केवल चिन्मात्र आत्मस्वरूपसे पृथक्त्व अर्थात् स्वाभाविक विलक्षणरूपता है उसे तथा जाग्रत् और स्वप्नकी अपेक्षासे उन इन्द्रियोंके उदयास्तमय—उत्पत्ति और प्रलयको जानकर अर्थात् विवेकपूर्वक यह समझकर कि ये इन्द्रियोंकी ही अवस्थाएँ हैं, आत्माकी नहीं, धीर-बुद्धिमान् पुरुष शोक नहीं करता, क्योंकि सर्वदा एक स्वभावमें रहनेवाले आत्माका कभी व्यभिचार न होनेके कारण शोकका कोई कारण नहीं ठहरता । जैसा कि “आत्मज्ञानी शोकको पार कर जाता है” ऐसी एक श्रुति भी है ॥ ६ ॥

यस्मादात्मन इन्द्रियाणां पृथग्भाव उक्तो नासौ बहिर्धि-जिस आत्मासे इन्द्रियोंका पृथक्त्व दिखलाया गया है वह कहीं बाहर है—ऐसा नहीं समझना

१४६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१४६कठोपनिषद्[ अध्याय २
गन्तव्यो यस्मात्प्रत्यगात्मा स सर्वस्य। तत्कथमित्युच्यते—चाहिये, क्योंकि वह सभीका अन्तरात्मा है। सो किस प्रकार? इसपर कहते हैं—

इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।
सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥

इन्द्रियोंसे मन पर (उत्कृष्ट) है, मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धिसे महत्तत्त्व बढ़कर है तथा महत्तत्त्वसे अव्यक्त उत्तम है ॥ ७ ॥

इन्द्रियेभ्यः परं मन इत्यादि। <br><br> अर्थानामिहेन्द्रियसमानजातीयत्वादिन्द्रियग्रहणेनैव ग्रहणम्। <br><br> पूर्ववदन्यत्। सत्त्वशब्दाद्बुद्धिरिहोच्यते ॥ ७ ॥इन्द्रियोंसे मन पर है [तथा मनसे बुद्धि श्रेष्ठ है] इत्यादि। इन्द्रियोंके सजातीय होनेसे इन्द्रियोंका ग्रहण करनेसे ही विषयोंका भी ग्रहण हो जाता है। अन्य सब पूर्ववत् (कठ० १।३।१० के समान) समझना चाहिये। 'सत्त्व' शब्दसे यहाँ बुद्धि कही गयी है ॥७॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।
यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥

अव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है और वह व्यापक तथा अलिङ्ग है; जिसे जानकर मनुष्य मुक्त होता है और अमरत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥

अव्यक्तात्तु परः पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादेः सर्वस्य कारणत्वात्। अलिङ्गोअव्यक्तसे भी पुरुष श्रेष्ठ है। वह आकाशादि सम्पूर्ण व्यापक पदार्थोंका भी कारण होनेसे व्यापक है। और अलिङ्ग है—जिसके द्वारा

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४७


| लिङ्ग्यते गम्यते येन तल्लिङ्गं बुद्ध्यादि तदविद्यमानमस्येति सोऽयमलिङ्ग एव। सर्वसंसारधर्मवर्जित इत्येतत्। यं ज्ञात्वा आचार्यतः शास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुः अविद्यादिहृदयग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च गच्छति सोऽलिङ्गः परोऽव्यक्तात् पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्धः ॥८॥ | कोई वस्तु जानी जाती है वह बुद्धि आदि लिङ्ग कहलाते हैं; परन्तु पुरुषमें इनका अभाव है इसलिये यह अलिङ्ग अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे रहित ही है। जिसे आचार्य और शास्त्रद्वारा जानकर पुरुष जीवित रहते हुए ही अविद्या आदि हृदयकी ग्रन्थियोंसे मुक्त हो जाता है तथा शरीरका पतन होनेपर भी अमरत्वको प्राप्त होता है वह पुरुष अलिङ्ग है, और अव्यक्तसे भी पर है—इस प्रकार इसका पूर्ववाक्यसे सम्बन्ध है ॥ ८ ॥ |


| कथं तर्ह्यलिङ्गस्य दर्शनम् उपपद्यत इत्युच्यते— | तो फिर जिसका कोई लिङ्ग (ज्ञापक चिह्न) नहीं है उस [आत्मा] का दर्शन होना किस प्रकार सम्भव है? इसपर कहा जाता है— |

न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥

इस आत्माका रूप दृष्टिमें नहीं ठहरता। इसे नेत्रसे कोई भी नहीं देख सकता। यह आत्मा तो मनका नियमन करनेवाली हृदयस्थिता बुद्धिद्वारा मननरूप सम्यग्दर्शनसे प्रकाशित [हुआ ही जाना जा सकता] है। जो इसे [ब्रह्मरूपसे] जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥

१४८ कठोपनिषद् [ अध्याय २

१४८ कठोपनिषद् [ अध्याय २


न संदृशे संदर्शनविषये न तिष्ठति प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम्। अतो न चक्षुषा सर्वेन्द्रियेण, चक्षुर्ग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात् , पश्यति नोपलभते कश्चन कश्चिदप्येनं प्रकृतमात्मानम्।<br><br>कथं तर्हि तं पश्येदित्युच्यते। हृदा हृत्स्थया बुद्ध्या। मनीषा मनसः संकल्पादिरूपस्येष्टे नियन्तृत्वेनेति मनीट् तया हृदा मनीषाविकल्पयित्र्या मनसा मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन अभिक्लृप्तोऽभिसमर्थितोऽभिप्रकाशित इत्येतत्। आत्मा ज्ञातुं शक्यत इति वाक्यशेषः। तम् आत्मानं ब्रह्मैतद्ये विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥इस प्रत्यगात्माका रूप दृष्टिविषयमें स्थिर नहीं होता। अतः कोई भी पुरुष इस प्रकृत आत्माको चक्षुसे—सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे [ अर्थात् समस्त इन्द्रियोंमेंसे किसीसे ] भी नहीं देख सकता अर्थात् उपलब्ध नहीं कर सकता। यहाँ चक्षुका ग्रहण सम्पूर्ण इन्द्रियोंका उपलक्षण करानेके लिये है।<br><br>तो फिर उसे किस प्रकार देखे ? इसपर कहते हैं—हृदयस्थिता बुद्धिसे, जो कि सङ्कल्पादिरूप मनकी नियन्त्री होकर ईशान करनेके कारण 'मनीट्' है उस विकल्पशून्या बुद्धिसे मन अर्थात् मननरूप यथार्थदर्शनद्वारा सब प्रकार समर्थित अर्थात् प्रकाशित हुआ वह आत्मा जाना जा सकता है। यहाँ 'आत्मा जाना जा सकता है' यह वाक्यशेष है। उस आत्माको जो लोग 'यह ब्रह्म है' ऐसा जानते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥ ९ ॥

सा हन्मनीट् कथं प्राप्यत इति तदर्थो योग उच्यते—वह हृदयस्थित [सङ्कल्पशून्य] बुद्धि किस प्रकार प्राप्त होती है ? यह बतलानेके लिये योगसाधनका उपदेश किया जाता है—

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४९


परमपदप्राप्ति

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।
बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

जिस समय पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मनके सहित [ आत्मामें ] स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती उस अवस्थाको परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवर्तितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि—ज्ञानार्थत्वाच्छ्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते—अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि तेन संकल्पादिव्यावृत्तेनान्तःकरणेन; बुद्धिश्चाध्यवसायलक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥जिस समय अपने-अपने विषयोंसे निवृत्त हुई पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ—ज्ञानार्थक होनेके कारण श्रोत्रादि इन्द्रियाँ ‘ज्ञान’ कही जाती हैं—मनके साथ अर्थात् वे जिसका अनुवर्तन करनेवाली हैं उस सङ्कल्पादि व्यापारसे निवृत्त हुए अन्तःकरणके सहित [ आत्मामें ] स्थिर हो जाती हैं और निश्चयात्मिका बुद्धि भी अपने व्यापारोंमें चेष्टाशील नहीं होती—चेष्टा नहीं करती—व्यापार नहीं करती उस अवस्थाको ही परम गति कहते हैं ॥ १० ॥

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।
अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥

उस स्थिर इन्द्रियधारणाको ही योग कहते हैं। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है, क्योंकि योग ही उत्पत्ति और नाशरूप है ॥ ११ ॥

१५० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५०कठोपनिषद्[ अध्याय २

| तामीदृशीं तदवस्थां योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम्। सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिनः। एतस्यां ह्यवस्थायामविद्याध्यारोपणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिराम् इन्द्रियधारणां स्थिरामचलाम् इन्द्रियधारणां बाह्यान्तःकरणानां धारणमित्यर्थः। | उस ऐसी अवस्थाको ही—जो वास्तवमें वियोग ही है—योग मानते हैं, क्योंकि योगीकी यह अवस्था सब प्रकारके अनर्थसंयोगकी वियोगरूपा है। इस अवस्थामें ही आत्मा अपने अविद्यादि आरोपसे रहित स्वरूपमें स्थित रहता है। [उस अवस्थाको ही] स्थिर इन्द्रियधारणा कहते हैं—स्थिर अर्थात् अचल इन्द्रियधारणा यानी बाह्य और आन्तरिक करणोंको धारण करना। | | अप्रमत्तः प्रमाद्वर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो भवतीति सामर्थ्यादवगम्यते। न हि बुद्ध्यादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति। तस्मात्प्रागेव बुद्ध्यादिचेष्टोपरमादप्रमादो विधीयते। अथवा यदैवेन्द्रियाणां स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतः | तत्र—उस समय साधक पुरुष अप्रमत्त—प्रमादरहित हो जाता है, अर्थात् चित्तसमाधानके प्रति सर्वदा सयत्न रहता है; जिस समय कि वह योगमें प्रवृत्त होता है [उस समय ऐसी स्थिति होती है]—ऐसा इस वाक्यकी सामर्थ्यसे जाना जाता है, क्योंकि बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव हो जानेपर प्रमाद होना सम्भव नहीं है। अतः बुद्धि आदिकी चेष्टाका अभाव होनेसे पूर्व ही अप्रमादका विधान किया जाता है। अथवा जिस समय भी इन्द्रियोंकी धारणा स्थिर होती है उसी समय निरङ्कुश अप्रमत्तत्व होता |

| वल्ली ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५१ |

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संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति।<br><br>कुतः ? योगो हि यस्मात् प्रभवाप्ययौ उपजनापायधर्मक इत्यर्थोऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्रायः ॥ ११ ॥है; इसीलिये 'उस समय अप्रमत्त हो जाता है' ऐसा कहा है। ऐसी बात क्यों है ? क्योंकि योग ही प्रभव और अप्यय यानी उत्पत्ति और लयरूप धर्मवाला है; अतः तात्पर्य यह है कि अपाय (लय) की निवृत्तिके लिये प्रमादका अभाव करना चाहिये ॥ ११ ॥

संस्कृतहिन्दी अनुवाद
बुद्ध्यादिचेष्टाविषयं चेद् ब्रह्मेदं तदिति विशेषतो गृह्येत बुद्ध्याद्युपरमे च ग्रहणकारणाभावात् अनुपलभ्यमानं नास्त्येव ब्रह्म।<br><br>यद्धि करणगोचरं तदस्तीति प्रसिद्धं लोके विपरीतं चासद् इत्यतश्चानर्थको योगः। अनुपलभ्यमानत्वाद्वा नास्तीत्युपलब्धव्यं ब्रह्मेत्येवं प्राप्त इदमुच्यते—<br><br>सत्यम्,<br>कठो० ६—यदि ब्रह्म बुद्धि आदिकी चेष्टाका विषय होता तो 'यह वह [ब्रह्म] है' इस प्रकार विशेषरूपसे ग्रहण किया जा सकता था; किन्तु बुद्धि आदिके निवृत्त हो जानेपर तो उसे ग्रहण करनेके कारणका अभाव हो जानेसे उपलब्ध न होनेवाला वह ब्रह्म वस्तुतः है ही नहीं। लोकमें जो वस्तु इन्द्रिय-गोचर होती है वही 'है' इस प्रकार प्रसिद्ध होती है और इसके विपरीत [इन्द्रियगोचर न होनेवाली] वस्तु 'असत्' कही जाती है, अतः योग व्यर्थ है। अथवा उपलब्ध होनेवाला न होनेसे ब्रह्म 'नहीं है' इस प्रकार जानना चाहिये—ऐसा प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है—<br><br>ठीक है,

१५२ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५२कठोपनिषद्[ अध्याय २

आत्मोपलब्धिका साधन सद्बुद्धि ही है

नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।
अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥

वह आत्मा न तो वाणीसे, न मनसे और न नेत्रसे ही प्राप्त किया जा सकता है; वह 'है' ऐसा कहनेवालोंसे अन्यत्र (भिन्न पुरुषोंको) किस प्रकार उपलब्ध हो सकता है ? ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
नैव वाचा न मनसा चक्षुषा नान्यैरपीन्द्रियैः प्राप्तुं शक्यत इत्यर्थः । तथापि सर्वविशेषरहितोऽपि जगतो मूलम् इत्यवगतत्वादस्त्येव कार्यप्रविलापनस्य अस्तित्वनिष्ठत्वात् । तथा हीदं कार्यं सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्येणानुगम्यमानं सद्बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्यमाना बुद्धिस्तदापि सा सत्प्रत्ययगर्भैव विलीयते । बुद्धिर्हि नः प्रमाणं सदसतोर्याथात्म्यावगमे ।तात्पर्य यह कि वह ब्रह्म न तो वाणीसे, न मनसे, न नेत्रसे और न अन्य इन्द्रियोंसे ही प्राप्त किया जा सकता है । तथापि सर्वविशेषरहित होनेपर भी 'वह जगत्‌का मूल है' इस प्रकार ज्ञात होनेके कारण वह है ही, क्योंकि कार्यका विलय किसी अस्तित्वके आश्रयसे ही हो सकता है । इसी प्रकार सूक्ष्मताकी तारतम्यपरम्परासे अनुगत होनेवाला यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग भी सद्बुद्धिनिष्ठाको ही सूचित करता है । जिस समय विषयका विलय करते हुए बुद्धिका विलय किया जाता है उस समय भी वह सद्‌वृत्तिगर्भीता हुई ही लीन होती है । तथा सत् और असत्‌का यथार्थ स्वरूप जाननेमें तो हमारे लिये बुद्धि ही प्रमाण है ।

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १५३


| मूलं चेज्जगतो न स्यादसद्न्वितमेवेदं कार्यमसदित्येवं गृह्येत न त्वेतदस्ति सत्सदित्येव तु गृह्यते; यथा मृदादिकार्यं घटादि मृदाद्यन्वितम् । तस्माज्जगतो मूलमात्मास्तीत्येवोपलब्धव्यः । कस्मात् ? अस्तीति ब्रुवतोऽस्तित्ववादिन आगमार्थानुसारिणः श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि नास्ति जगतो मूलमात्मा निरन्वयमेवेदं कार्यमभावान्तं प्रविलीयत इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनि कथं तद्ब्रह्म तत्त्वत उपलभ्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्थः ॥ १२ ॥ | यदि जगत्‌का कोई मूल न होता तो यह सम्पूर्ण कार्यवर्ग असन्मय ही होनेके कारण 'असत् है' इस प्रकार ग्रहण किया जाता । किन्तु ऐसी बात नहीं है; यह जगत् तो 'है-है' इस प्रकार ही ग्रहण किया जाता है, जिस प्रकार कि मृत्तिका आदिके कार्य घट आदि [अपने कारण] मृत्तिका आदिसे समन्वित ही गृहीत होते हैं । अतः जगत्‌का मूल आत्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये । क्यों ? क्योंकि आत्मा 'है' इस प्रकार कहनेवाले शास्त्रार्थानुसारी श्रद्धालु आस्तिक पुरुषोंसे भिन्न नास्तिकवादियोंको, जो ऐसा मानते हैं कि 'जगत्‌का मूल आत्मा नहीं है, जिसका अभाव ही अन्तिम परिणाम है ऐसा यह कार्यवर्ग कारणसे अनन्वित हुआ ही लीन हो जाता है'—ऐसे उन विपरीतदर्शियोंको वह ब्रह्म किस प्रकार तत्त्वतः उपलब्ध हो सकता है ? अर्थात् किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ |


| तस्मादपोहासद्वादिपक्षम् आसुरम्— | अतः असद्वादियोंके आसुरी पक्षका निराकरण कर— |

१५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५४ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २


अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।
अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥

वह आत्मा 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध किया जाना चाहिये तथा उसे तत्त्वभावसे भी जानना चाहिये । इन दोनों प्रकारकी उपलब्धियोंमेंसे जिसे 'है' इस प्रकारकी उपलब्धि हो गयी है तत्त्वभाव उसके अभिमुख हो जाता है ॥ १३ ॥

शाङ्करभाष्यम्भाषानुवाद
अस्तीत्येवात्मोपलब्धव्यः <br><br> सत्कार्यो बुद्ध्याद्युपाधिः । यदा तु तद्रहितोऽविक्रिय आत्मा कार्यं च कारणव्यतिरेकेण नास्ति "वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्" (छा० उ० ६।१।४) इति श्रुतेस्तदा यस्य निरुपाधिकस्यालिङ्गस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मनः तत्त्वभावो भवति तेन च रूपेण आत्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते । <br><br> तत्राप्युभयोः सोपाधिकनिरुपाधिकयोरस्तित्वतत्त्वभावयोः—बुद्धि आदि जिसकी उपाधि हैं तथा जिसका सत्त्व उसके कार्य-वर्गमें अनुगत है उस आत्माको 'है' इस प्रकार ही उपलब्ध करना चाहिये। जिस समय आत्मा उस बुद्धि आदि उपाधिसे रहित और निर्विकार जाना जाता है तथा कार्यवर्ग "विकार वाणीका विलास और नाममात्र है, केवल मृत्तिका ही सत्य है" इस श्रुतिके अनुसार अपने कारणसे भिन्न नहीं है—ऐसा निश्चित होता है उस समय जिस निरुपाधिक अलिंग और सत्-असत् आदि प्रतीतिके विषयत्वसे रहित आत्माका तत्त्वभाव होता है उस तत्त्वस्वरूपसे ही आत्माको उपलब्ध करना चाहिये—इस प्रकार यहाँ 'उपलब्धव्य' पदकी अनुवृत्ति की जाती है। <br><br> सोपाधिक अस्तित्व और निरुपाधिक तत्त्वभाव इन दोनोंमेंसे—

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५५


| निर्धारणार्था षष्ठी—पूर्वमस्तीत्ये<br>वोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधि-<br>कृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य<br>इत्यर्थः पश्चात्प्रत्यस्तमित-<br>सर्वोपाधिरूप आत्मनस्तत्त्वभावो<br>विदिताविदिताभ्यामन्योऽद्वयस्व-<br>भावो "नेति नेति" (बृ० उ० २ ।<br>३ । ६, ३ । ९ । २६) इति<br>"अस्थूलमण्वह्रस्वम्" (बृ०<br>उ० ३ । ८ । ८) "अदृश्येऽनात्म्ये-<br>ऽनिरुक्तेऽनिलयने" (तै० उ० २ ।<br>७ । १) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः<br>प्रसीदत्यभिमुखीभवति आत्म-<br>प्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्ध-<br>वत इत्येतत् ॥ १३ ॥ | यहाँ 'उभयोः' इस पदमें षष्ठी<br>निर्धारणके लिये है—पहले तो 'है'<br>इस प्रकार उपलब्ध हुए आत्माका<br>अर्थात् सत्कार्यरूप उपाधिके किये<br>हुए अस्तित्व-प्रत्ययसे उपलब्ध हुए<br>आत्माका और फिर जिसकी सम्पूर्ण<br>उपाधि निवृत्त हो गयी है और जो ज्ञात<br>एवं अज्ञातसे भिन्न अद्वितीयस्वरूप<br>है, उस "नेति-नेति"¹ "अस्थूल-<br>मण्वह्रस्वम्"² "अदृश्येऽनात्म्येऽ-<br>निरुक्तेऽनिलयने"³ इत्यादि श्रुतियोंसे<br>निर्दिष्ट आत्माका तत्त्वभाव 'प्रसीदति'—<br>अभिमुख होता है अर्थात् जिसे पहले<br>'है' इस प्रकार आत्माकी उपलब्धि<br>हो गयी है उसे अपना स्वरूप प्रकट<br>करनेके लिये [वह तत्त्वभाव अभि-<br>मुख प्रकाशित होता है] ॥ १३ ॥ |


अमर कब होता है ?

एवं परमार्थदर्शिनोः—इस प्रकार परमार्थदर्शीकी—

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥


१. 'यह (स्थूल) नहीं है, यह (सूक्ष्म) नहीं है।'
२. 'अस्थूल, असूक्ष्म, अह्रस्व।'
३. 'अदृश्य (इन्द्रियोंके अविषय) में, अनात्म्य (अहंता-ममताहीन) में, अनिर्वचनीयमें, अनिलयन (आधाररहित) में।'

१५६ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५६कठोपनिषद्[ अध्याय २

जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो कि इसके हृदयमें आश्रय करके रहती हैं, छूट जाती हैं उस समय वह मर्त्य (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और इस शरीरसे ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १४ ॥

| [कामत्यागेन अमृतत्वम्]<br><br>यदा यस्मिन्काले सर्वे कामाः कामयितव्यस्यान्यस्याभावात्प्रमुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिताः । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । “कामः संकल्पः” (बृ० उ० १ । ५ । ३) इत्यादिश्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधात् आसीत्स प्रबोधोत्तरकालमविद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योर्विनाशादमृतो भवति । गमनप्रयोजकस्य मृत्योर्विनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रैहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद्ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः ॥ १४ ॥ | जब—जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ कामनायोग्य अन्य पदार्थका अभाव होनेके कारण छूट जाती हैं—छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, जो कि बोध होनेसे पूर्व इस विद्वान्‌के हृदय—बुद्धिमें आश्रित रहती हैं—क्योंकि बुद्धि ही कामनाओंका आश्रय है, आत्मा नहीं; जैसा कि “कामना, संकल्प [और संशय—ये सब मन ही हैं]” इत्यादि एक दूसरी श्रुतिसे भी सिद्ध होता है।<br><br>तब फिर जो आत्मसाक्षात्कारसे पूर्व मरणधर्मा था वह जीव आत्मज्ञान होनेके अनन्तर अविद्या, कामना और कर्मरूप मृत्युका नाश हो जानेसे अमर हो जाता है । परलोकमें गमन करानेवाले मृत्युका विनाश हो जानेसे वहाँ जाना सम्भव न होनेके कारण वह इस लोकमें ही दीपनिर्वाणके समान सम्पूर्ण बन्धनोंके नष्ट हो जानेसे ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्म ही हो जाता है ॥ १४ ॥ |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५७


कदा पुनः कामानां मूलतो विनाश इत्युच्यते-परन्तु कामनाओंका समूल नाश कब होता है ? इसपर कहते हैं—

यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।
अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥

जिस समय इस जीवनमें ही इसके हृदयकी सम्पूर्ण ग्रन्थियोंका छेदन हो जाता है उस समय यह मरणधर्मा अमर हो जाता है। बस सम्पूर्ण वेदान्तोंका इतना ही आदेश है ॥ १५ ॥

[ग्रन्थिभेद एवामृतत्वम्]<br><br>यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदम् उपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीवत एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिदं शरीरं ममेदं धनं सुखी दुःखी चाहम् इत्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोपजननादब्रह्मैवाहमस्म्यसंसारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ताः कामा मूलतो विनश्यन्ति । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्धयेतावदेवैतावन्मात्रं नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या—जिस समय यहाँ—जीवित रहते हुए ही इसके हृदयकी—बुद्धिकी सम्पूर्ण ग्रन्थियाँ अर्थात् दृढ बन्धनरूप अविद्याजनित प्रतीतियाँ छिन्न-भिन्न होतीं—भेदको प्राप्त होतीं अर्थात् नष्ट हो जाती हैं—'मैं यह शरीर हूँ, यह मेरा धन है, मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ' इत्यादि प्रकारके अनुभव अविद्या-प्रत्यय हैं; उसके विपरीत ब्रह्मात्मभावके अनुभवकी उत्पत्तिसे 'मैं असंसारी ब्रह्म ही हूँ' ऐसे बोधद्वारा अविद्यारूप ग्रन्थियोंके नष्ट हो जानेपर उसके निमित्तसे हुई कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं। तब वह मर्त्य (मरणधर्मा जीव) अमर हो जाता है। बस इतना ही सम्पूर्ण वेदान्तोंका अनुशासन—आदेश है; इससे अधिक कुछ और

१५८ | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१५८कठोपनिषद्[ अध्याय २

| अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेशः। सर्व-वेदान्तानामिति वाक्यशेषः ॥१५॥ | है ऐसी आशङ्का नहीं करनी चाहिये। यहाँ 'सर्ववेदान्तानाम्' यह वाक्यशेष है ॥ १५॥ |


| निरस्ताशेषविशेषव्यापि-ब्रह्मात्मप्रतिपत्त्या प्रभिन्नसमस्ता-विद्यादिग्रन्थेर्जीवत एव ब्रह्मभूतस्य विदुषो न गतिर्विद्यत इत्युक्तमत्र ब्रह्म समश्नुत इत्युक्तत्वात् । “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४।४।६) इति श्रुत्यन्तराच्च ।<br><br>ये पुनर्मन्दब्रह्मविदो विद्या-न्तरशीलिनश्च ब्रह्मलोकभाजो ये च तद्विपरीताः संसारभाजः तेषामेव गतिविशेष उच्यते— प्रकृतोत्कृष्टब्रह्मविद्याफलस्तुतये । | जिसमें सम्पूर्ण विशेषणोंका अभाव है उस सर्वव्यापक ब्रह्मको ही अपने आत्मस्वरूपसे जान लेनेके कारण जिसकी अविद्या आदि समस्त ग्रन्थियाँ टूट गयी हैं और जो जीवितावस्थामें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो गया है उस विद्वान्का कहीं गमन नहीं होता—ऐसा पहले कहा गया, क्योंकि [चौदहवें मन्त्रमें] 'इस शरीरमें ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है'—ऐसा कहा है। "उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते वह ब्रह्मरूप हुआ ही ब्रह्ममें लीन हो जाता है" इस एक दूसरी श्रुतिसे भी यही निश्चय होता है।<br><br>किन्तु जो मन्द ब्रह्मज्ञानी और अन्य विद्या (उपासना) का परिशीलन करनेवाले ब्रह्मलोक-प्राप्तिके अधिकारी हैं अथवा जो उनसे विपरीत [जन्म-मरणरूप] संसारको ही प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हींकी किसी गतिविशेषका वर्णन यहाँ प्रकरणप्राप्त ब्रह्मविद्याके उत्कृष्ट फलकी स्तुतिके लिये किया जाता है। |

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५९


किं चान्यदग्निविद्या पृष्टा प्रत्युक्ता च। तस्याश्च फलप्राप्तिप्रकारो वक्तव्य इति मन्त्रारम्भः। तत्र—इसके सिवा नचिकेताके पूछनेपर यमराजने पहले अग्निविद्याका भी वर्णन किया था; उस अग्निविद्याके फलकी प्राप्तिका प्रकार भी बतलाना है ही। इसी अभिप्रायसे इस मन्त्रका आरम्भ किया जाता है। वहाँ [कहना यह है कि—]

शतं चैका च हृदयस्य नाड्य- स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्ङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥

इस हृदयकी एक सौ एक नाड़ियाँ हैं; उनमेंसे एक मूर्धाका भेदन करके बाहरको निकली हुई है। उसके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर गमन करनेवाला पुरुष अमरत्वको प्राप्त होता है। शेष विभिन्न गतियुक्त नाड़ियाँ उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) की हेतु होती हैं ॥ १६ ॥

[सुषुम्नाभेदेन अमृतत्वम्]<br><br>शतं च शतसंख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्विनिःसृता नाड्यः शिरास्तासां मध्ये मूर्धानं भित्त्वाभिनिःसृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत्।<br><br>तया नाड्योर्ध्वमुपर्य्यायन् गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरण-पुरुषके हृदयसे सौ अन्य और सुषुम्ना नामकी एक—इस प्रकार [एक सौ एक] नाडियाँ—शिराएँ निकली हैं। उनमें सुषुम्ना नाम्नी नाडी मस्तकका भेदन करके बाहर निकल गयी है। अन्तकालमें उसके द्वारा आत्माको अपने हृदयदेशमें वशीभूत करके समाहित करे।<br><br>उस नाडीके द्वारा ऊर्ध्व—ऊपरकी ओर जानेवाला जीव सूर्यमार्गसे अमृतत्व—आपेक्षिक अमरणधर्मत्व-

१६० | कठोपनिषद् | [ अध्याय २

१६०कठोपनिषद्[ अध्याय २

| धर्मत्वमापेक्षिकम् । “आभूतसं-<br>प्लवं स्थानममृतत्वं विभाव्यते”<br>(वि० पु० २ । ८ । ९७)<br>इति स्मृतेः । ब्रह्मणा वा सह<br>कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति<br>भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोक-<br>गतान् । विष्वङ्नानाविधगतयः<br>अन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्तं<br>भवन्ति संसारप्रतिपत्त्यर्था एव<br>भवन्तीत्यर्थः ॥ १६ ॥ | को प्राप्त हो जाता है, जैसा कि<br>“सम्पूर्ण भूतोंके क्षयपर्यन्त रहने-<br>वाला स्थान अमृतत्व कहलाता है”<br>इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ।<br>अथवा [ यह भी तात्पर्य हो सकता<br>है कि ] कालान्तरमें ब्रह्माके साथ<br>ब्रह्मलोकके अनुपम भोगोंको भोगकर<br>मुख्य अमृतत्वको प्राप्त करता है ।<br>इसके सिवा जिनकी गति विविध<br>भाँतिकी हैं ऐसी अन्य सब नाड़ियाँ<br>प्राणप्रयाणकी हेतु होती हैं, अर्थात्<br>वे संसारप्राप्तिके लिये ही होती<br>हैं ॥ १६ ॥ |

| इदानीं सर्ववल्ल्यर्थोपसंहा-<br>रार्थमाह— | अब सम्पूर्ण वल्लियोंके अर्थका<br>उपसंहार करनेके लिये कहते हैं— |

उपसंहार

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ।
तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ।
तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥

अङ्गुष्ठमात्र पुरुष, जो अन्तरात्मा है सर्वदा जीवोंके हृदयदेशमें स्थित है । मूँजसे सींकके समान उसे धैर्यपूर्वक अपने शरीरसे बाहर निकाले [ अर्थात् शरीरसे पृथक् करके अनुभव करे ] । उसे शुक्र ( शुद्ध ) और अमृतरूप समझे, उसे शुक्र और अमृतरूप समझे ॥ १७ ॥