भारतकोश
कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

कठोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Katha Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished182 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

वल्ली ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४३


| यस्मादिहैवात्मनो दर्शनम् आदर्शस्थस्येव मुखस्य स्पष्टमुपपद्यते न लोकान्तरेषु ब्रह्मलोकाद् अन्यत्र, स च दुष्प्रापः, कथम् ? इत्युच्यते— | क्योंकि जिस प्रकार दर्पणमें मुखका प्रतिबिम्ब स्पष्ट पड़ता है उसी प्रकार इस (मनुष्यदेह) में ही आत्माका स्पष्ट दर्शन हो सकता है। इसमें वह जैसा स्पष्टतया अनुभव होता है वैसा ब्रह्मलोकको छोड़कर और किसी लोकमें नहीं होता और उसका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है; सो किस प्रकार ? इसपर कहते हैं— |

स्थानभेदसे भगवद्दर्शनमें तारतम्य

यथाऽऽदर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ।
यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥

जिस प्रकार दर्पणमें उसी प्रकार निर्मल बुद्धिमें आत्माका [ स्पष्ट ] दर्शन होता है तथा जैसा स्वप्नमें वैसा ही पितृ-लोकमें और जैसा जलमें वैसा ही गन्धर्वलोकमें उसका [ अस्पष्ट ] भान होता है; किन्तु ब्रह्मलोकमें तो छाया और प्रकाशके समान वह [ सर्वथा स्पष्ट ] अनुभव होता है ॥ ५ ॥

| यथाऽऽदर्शे प्रतिबिम्बभूतम् आत्मानं पश्यति लोकोऽत्यन्तविविक्तं तथेहात्मनि स्वबुद्धौ आदर्शवनिर्मलीभूतायां विविक्तम् आत्मनो दर्शनं भवतीत्यर्थः । <br><br> यथा स्वप्नेऽविविक्तं जाग्रद्वास-नोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तम् | जिस प्रकार लोक दर्पणमें प्रतिबिम्बित हुए अपने-आपको अत्यन्त स्पष्टतया देखता है उसी प्रकार दर्पणके समान निर्मल हुई अपनी बुद्धिमें आत्माका स्पष्ट दर्शन होता है—ऐसा इसका अभिप्राय है। <br><br> जिस प्रकार स्वप्नमें जाग्रद्वासनाओंसे प्रकट हुआ दर्शन अस्पष्ट होता है उसी प्रकार पितृलोकमें |