कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ३४९ राजकुमारी से साहस और वीरता के लिए प्रशंसित प्रछन्नचित्त विदूषक ने वहीं रात बिताई ॥५४३॥ प्रातःकाल राजा ने सब वृत्तान्त जानकर विदूषक के शौर्य की अद्वितीय पताका के समान उस राजपुत्री को पर्याप्त दहेज (धन) के साथ उसके लिए दे दिया ॥५४४॥ विदूषक ने उसके गुणों से बँधी हुई अतएव उसका साथ न छोड़ती हुई लक्ष्मी के समान उन कुछ रात्रियों को राजकुमारी के साथ व्यतीत किया ॥५४५॥ एक दिन भद्रा के प्रति उत्सुक विदूषक रात में चुपचाप चल दिया। सच है, दिव्य रस का आस्वाद प्राप्त कर लेने पर कौन दूसरे रसों की चाह करता है? ॥५४६॥ नगर से बाहर निकलकर विदूषक ने राक्षस का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित और नमस्कार करते हुए राक्षस को विदूषक ने कहा ॥५४७॥ 'मित्र ! मुझे उदय पर्वत पर सिद्धक्षेत्र में भद्रा नाम की विद्याधरी के लिए जाना है, इस लिए तुम मुझे वहाँ ले चलो' ॥५४८॥ 'ठीक है, चलो ऐसा कहते हुए राक्षस के कन्धे पर चढ़कर वह विदूषक रातो-रात दुर्गम और साठ योजन लम्बी शीतोदा नदी के किनारे पहुँचा। प्रातःकाल मनुष्यों के लिए अगम्य शीतोदा नामक नदी को पार करके, बिना परिश्रम ही उदयाचल के समीप जा पहुँचा ॥५४९-५०॥ उदय पर्वत के समीप पहुँच कर राक्षस ने कहा— श्रीमान् ! यह तुम्हारे सामने उदय पर्वत है। सिद्धों के निवास-स्थान इस पर्वत पर मेरी गति नहीं है ॥५५१॥ ऐसा कहकर और विदूषक की आज्ञा पाकर राक्षस के अन्तर्धान होने पर विदूषक ने वहाँ एक सुन्दर बावली देखी ॥५५२॥ खिले हुए कमलों से मुख-शोभा को धारण करती हुई वह बावली गुँजारते हुए भौरों के शब्दों से मानो उसका स्वागत कर रही थी ॥५५३॥ उस बावली के तट पर उसने स्त्रियों के पैरों की पंक्तियाँ देखीं जो मानों उसे यह कह रही थीं कि तुम्हारी प्रियतमा के मिलने का मार्ग यही है ॥५५४॥ विदूषक ने सोचा कि यह पर्वत मनुष्यों के लिए अलङ्घनीय है। अतः यहीं बैठकर देखता हूँ कि यह पैरों की पंक्तियाँ किस की हैं? ॥५५५॥ वह ऐसा सोच ही रहा था कि बहुत-सी सुन्दरियाँ सोने के घड़े लिये हुए जल भरने के लिए बावली पर आई ॥५५६॥ पानी से घड़े भर लेने के अनन्तर विदूषक ने उन सुन्दरियों से स्नेह-गरम शब्दों में पूछा कि यह जल किसके लिए ले जा रही हो ॥५५७॥