कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक ३५१ उन सुन्दरियों ने कहा—भद्र ! इस पर्वत पर भद्रा नाम की विद्याधरी निवास करती है। यह उसके स्नान का जल है॥३५८॥ यह सत्य है कि साहसिक कार्यों को प्रारम्भ करनेवाले वीरों के लिए विधाता स्वयं ही उपयोगी सामग्री घटित कर देता है॥३५९॥ इतने में ही उन सुन्दरियों में से एक बोली—हे महापुरुष ! घड़े को मेरे कन्धे पर रख दो॥३६०॥ तब बुद्धिमान् विदूषक ने घड़े को उसके कन्धे पर रखते हुए, भद्रा की दी हुई रत्नों की अंगूठी को उस (घड़े) में धीरे से रख दिया॥३६१॥ और उसी बावली के किनारे फिर बैठ गया। वे स्त्रियाँ पानी लेकर भद्रा के घर चली गई। वहाँ जब वे भद्रा को पानी देकर स्नान कराने लगीं तब वह अंगूठी (भद्रा) उसकी गोद में गिर पड़ी॥३६२-३६३॥ उसे देखकर भद्रा ने सहेलियों से पूछा कि क्या तुम लोगों ने किसी नये मनुष्य को देखा है॥३६४॥ उन्होंने कहा—हाँ हम लोगों ने नदी के किनारे एक जवान मनुष्य को देखा है उसने ही यह घड़ा भी उठवा दिया था॥३६५॥ तब भद्रा बोली—तुम लोग उसे स्नान और वेश-भूषा आदि से सज्जित करके शीघ्र ही मेरे पास ले आओ वह मेरा पति आया है॥३६६॥ भद्रा के इस प्रकार कहने पर और सब कुछ विदूषक से निवेदन करके उसकी सहेलियाँ स्नान किये विदूषक को भद्रा के पास ले आईं॥३६७॥ विदूषक ने उत्सुकता के साथ राह देखती हुई भद्रा को अपने साहस-रूपी वृक्ष के पके हुए फल के समान देखा॥३६८॥ भद्रा भी उसे देखकर हर्ष के आँसुओं से मानों अर्घ्य देती हुई उसके गले में लिपट गई और उसे अपनी भुज-लता रूपी पाश से बाँध लिया ॥३६९ ३७ ० ॥ तदनन्तर बैठे हुए दोनों परस्पर देखते हुए अघाते नहीं थे। मानों सैकड़ोंगुनी बढ़ी हुई सात्कंठा (चाह) उनमें भरी थी॥३७१॥ 'इस स्थान पर कैसे आये ? भद्रा के इस प्रकार पूछने पर विदूषक उसी समय बोला—॥३७२॥