कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५०१ 'दक्षिण देश का एक महाधनी माधव नाम का राजकुमार यहाँ उज्जैन में ठहरा है। वह वदान्य है और अपना सर्वस्व दान करना चाहता है। यदि आप स्वीकार करें, तो वह सब आपको ही देना चाहता है। उसके पास अनेक प्रकार के रत्न-जटित आभूषण हैं' ॥१४८-१४९॥ पुरोहित की यह बात सुनकर वह धूर्त शिव धीरे-धीरे मौन छोड़कर बोला महाराज! भिक्षामान से जीवित रहनेवाले मुझ ब्राह्मण को धन से क्या प्रयोजन ? ॥१५० ॥ तब वह पुरोहित फिर बोला--हे ब्राह्मण देवता ! ऐसा न कहो। क्या तुम आश्रमों का क्रम नहीं जानते ? अर्थात् अब तुम्हें गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना है जिसमें धन की ही आवश्यकता पड़ेगी। १५१॥ विवाह के उपरान्त मनुष्य देवता पितर और अतिथियों की सेवा करके धर्म अर्थ और काम इन तीन पुरुषार्थों को प्राप्त करता है क्योंकि गृहस्थी ही चारों आश्रमों में श्रेष्ठ है' ॥१५२॥ तब वह शिव बोला- 'मेरा विवाह कहाँ हो सकता है। मैं ऐसे-वैसे साधारण कुल से विवाह न करूँगा' ॥१५३॥ यह सुनकर और राजकुमार की ओर से दान दिये जानेवाले धन को जीवन-भर सुख भोगने के लिए पर्याप्त समझकर लालची पुरोहित अवसर पाकर शिव से बोला- 'यदि ऐसा आपका निश्चय है तो मेरी विनयस्वामिनी नाम की अत्यन्त सुन्दरी कन्या है। उसे मैं दान करके तुम्हें दे दूँगा और माधव द्वारा दान में जो धन तुम्हे मिलेगा उसे मैं सुरक्षित रखूँगा। इसलिए तुम अब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करो' ॥१५४-१५६॥ यह सुनकर और अपनी योजना को पूर्ण रूप से सफल होते देखकर धूर्त शिव ने कहा--'हे ब्राह्मणदेव ! यदि तुम्हारा यही आग्रह है, तो मैं तुम्हारी बात मान लेता हूँ। रत्न और सोना आदि धन के सम्बन्ध में तो मैं तपस्वी मूर्ख ही हूँ किन्तु तुम्हारे आग्रह से मैं तैयार हो जाता हूँ जैसा उचित समझो करो ॥१५७-१५८॥ इस प्रकार शिव की बातें सुनकर प्रसन्न पुरोहित उस अशिव (अकल्याण) शिव को वैसे ही अपने घर ले गया ॥१५९॥ शिव को बैठाकर उसके साथ जो कुछ वार्तालाप हुआ था वह सब पुरोहित ने माधव से कहा। माधव ने भी उसकी पर्याप्त प्रशंसा की॥ १६० ॥ उसी समय बड़े कष्ट से पाली हुई कन्या पुरोहित ने जाकर शिव को समर्पित कर दी मानों जीवन-भर की अपनी कमाई उसने अपनी मूर्खता से गँवा दी ॥ १६१॥