कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ५२१ मच्छ के पेट से निकले हुए और कल्याण-कामना करते हुए उस युवक को देखकर चकित सत्यव्रत ने पूछा—'हे ब्राह्मण ! तुम कौन हो ? कैसे हो ? इस मत्स्य के पेट में तुमने शयन कैसे किया ? तुम्हारा यह वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत है' ।।५३-५४।। यह सुनकर शक्तिदेव उस निषादराज से बोला—'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण वर्धमान नगर से आया हूँ। मुझे कनकपुरी अवश्य जाना है। उसका पता न जानने के कारण चिरकाल तक दूर-दूर घूमा हूँ। तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि के कथन से उसके किसी द्वीपान्तर में होने का अनुमान करके उत्पल द्वीप-निवासी निषादराज सत्यव्रत के पास जाने के लिए जहाज पर आया और जहाज के टूट जाने पर मुझे मत्स्य ने निगल लिया और उसीने मुझे यहाँ पहुँचा दिया' ।।५५- ५८।। इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव को सत्यव्रत ने पुनः कहा—'मैं ही सत्यव्रत हूँ और यही उत्पलक द्वीप है। किन्तु अनेक द्वीपों को देखनेवाले मैंने तुम्हारी ईप्सित कनकपुरी नहीं देखी है। हाँ द्वीपों के अन्त में है ऐसा सुना गया है' ।।५९-६०॥ उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव को निराश और खिन्न देखकर अतिथि-प्रेम से सत्यव्रत बोला—॥६१॥ 'हे ब्राह्मणदेवता खेद न करो। आज रात को यहीं निवास करो। प्रातःकाल तुम्हारी सफलता के लिए कोई उपाय करूँगा' ।।६२।। ऐसा आश्वासन देकर निषाद के द्वारा भेजा गया वह शक्तिदेव एक ब्राह्मण-मठ में गया जहाँ अतिथियों का सत्कार सुलभ था। उस मठ में रहनेवाले विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण द्वारा भोजन कराने पर शक्तिदेव ने उसके साथ अपनी जीवन-चर्चा प्रारम्भ की ।।६३-६४।। उसका परिचय सुनकर तुरन्त ही विष्णुदत्त ने उसका आलिङ्गन करके हर्ष के आँसुओं के कारण रुँधे हुए कण्ठ से गद्गद होकर कहा—'भाग्य से तू मेरे मामा का लड़का (ममेरा भाई) है और हम दोनों एक ही देश में उत्पन्न हुए हैं ।।६५-६७।।