भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 1079 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

सप्तम लम्बक ११ पञ्चम तरंग राजपुत्र शृंगभुज और रूपशिखा की कथा इस प्रकार, मरुभूति के कथा सुनाने पर सभापति हरिशिखर ने नरवाहनदत्त के सम्मुख कहा—॥१॥ 'यह सत्य है, कुलीन स्त्री के लिए पति ही एकमात्र गति है। इस प्रसंग में एक आश्चर्यमयी कथा सुनो—॥२॥ इस भूतल पर वर्धमान नामक जो नगर है, उसमें वीरभुज नाम का राजा था। उसकी रानियों में गुणवरा नाम की महाराज्ञी उसे प्राणों से भी अधिक प्यारी थी॥३-४॥ उस राजा की एक सौ रानियों में एक को भी पुत्र (सन्तान) नहीं था॥५॥ इस कारण राजाने श्रुतवर्धन नामक वैद्य को बुलाकर पूछा कि क्या ऐसी कोई औषधि है कि जिससे पुत्र की उत्पत्ति हो सके॥६॥ यह सुनकर वैद्य ने कहा—'महाराज! मैं इस कार्य को सिद्ध करता हूँ किन्तु यदि आप मेरे लिए एक जंगली बकरा मँगा दें ॥७॥ वैद्य की बात सुनकर राजा ने द्वारपाल को आज्ञा देकर जंगली बकरा मँगा दिया॥८॥ उस बकरे का राजा के रसोईदारों द्वारा वैद्य ने रानियों के लिए स्वादिष्ट रस (शोरबा) बनवाया॥९॥ राजा सब रानियों को एक स्थान पर आने की आज्ञा देकर स्वयं भगवान् की पूजा करने चला गया और सभी रानियाँ एक स्थान पर एकत्र हो गईं॥१०॥ इनमें केवल एक महाराज्ञी गुणवरा अनुपस्थित रही, क्योंकि वह उस समय राजा के साथ देव-पूजन में संलग्न थी॥११॥ सब रानियों के एकत्र होने पर वैद्य ने उनके पीने के लिए चूल्हे से निकाला हुआ सम्पूर्ण भाग उन उन में बाँट दिया॥१२॥ तुरन्त ही राजा पूजन करके रानी गुणवरा के साथ वहाँ आया और सभी मांस-रस को समाप्त देखकर वैद्य से बोला—'बहुत बुरा हुआ कि तुमने गुणवरा के लिए कुछ भी रस बचाकर नहीं रखा। जिसके लिए यह सब कुछ किया गया, उसे ही तुम भूल गये? —॥१३-१४॥