भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक - २५५ और दूसरे ही दिन वे सभी सूर्यप्रभ को लेकर राजा पौरव के साथ विमान से चीन देश को गये ॥१७५॥ वहाँ अगवानी के लिए बाहर आये हुए राजा ने उन्हें अपने बिम में ले जाकर अपनी कन्या का विवाह-संस्कार किया तथा मुदाह में विद्युन्माला और सूर्यप्रभ को कन्यादान में अमूल्य सोना रत्न एवं चीन के वस्त्र आदि प्रदान किये ॥१७६-१७७॥ विवाह के अनन्तर चन्द्रप्रभ आदि राजा गुरोह से सेवा-सत्कार प्राप्त करते हुए कुछ दिनों तक चीन में रहकर आनन्द करते रहे ॥१७८॥ घनघोर घटाटोपवाले वर्षाकाल के समान उमड़े हुए धन-यौवन से समृद्ध सूर्यप्रभ भी विद्युन्माला [बिजली] के साथ समुद्गृह में विविध प्रकार के भाव-विलासों का आनन्द लेने लगा ॥१७९-१८०॥ कुछ दिनों के अनन्तर सिद्धार्थ आदि मन्त्रियों से सम्मति करके अन्यान्य श्वशुर राजाओं को उपहारों के साथ अपने-अपने देश को भेजकर, सूर्यप्रभ भी राजा गुरोह से आज्ञा लेकर, उनकी कन्या विद्युन्माला तथा अपने माता-पिता के साथ सफल होकर भूतासन नामक विमान में बैठकर अपनी राजधानी शाकल में आ गया ॥१८१-१८३॥ सूर्यप्रभ के राजधानी में आने पर, सारी नगरी हर्ष से पागल-सी हो रही थी। कहीं नाच हो रहा था तो कहीं गाना-बजाना चल रहा था। कहीं मद्यपान-गोष्ठियाँ हो रही थीं तो कहीं स्त्रियों की सजधज चल रही थी। कहीं प्रचुर पुरस्कार-प्राप्त बन्दी-चारण आदि प्रशंसा के गान गा रहे थे ॥१८४॥ सूर्यप्रभ ने अपनी राजधानी में जाकर अपने-अपने पिताओं के घर में छोड़ी गई सभी रानियों को अपने पास बुलवा लिया। वे रानियां भी अपने-अपने पिताओं द्वारा दिये गये असंख्य हाथी घोड़े और दास-दासियों और धन-रत्नों के साथ आईं तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों सूर्यप्रभ के दिग्विजय का वैभव आ गया हो। यह सब देखकर नागरिक जनता आश्चर्य-चकित हो गई ॥१८५॥