भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ३४९ यह गुफा उसी प्रबल दानव की है। इसी कारण वह उन पहरेदारों के साथ यह उसी के अधीन है॥२४२॥ उस गुफा के नीचे प्रबल का भवन है, जहाँ अलंकारों से सजी हुई उसकी बारह पत्नियां रहती हैं॥२४३॥ वहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार के रत्न और विविध प्रकार के मन्त्र-शस्त्र हैं। चिन्तामणि है और एक लाख घोड़ा है और उतने ही घड़े भी हैं॥२४४॥ प्रभास की ये सब वस्तुएँ उसके पहले जन्म की कमाई हैं। इस प्रकार यह प्रभास की कहानी है। अतः इसके लिए यह सब कुछ आश्चर्य नहीं है ॥२४५॥ मुनि सुबाहुकुमार के मुख से यह सब सुनकर सूर्यप्रभ, सुनीथ, मय, प्रभास आदि सभी रत्न आदि की प्राप्ति के लिए पाताल-स्थित प्रबल के गुहा-मन्दिर में गए ॥२४६॥ उसमें प्रवेश करके प्रभास ने अपने पूर्वजन्म की पत्नियों, चिन्तामणि, घोड़ा, मणियाँ तथा मन्त्र-रत्नों को बाहर लाकर सूर्यप्रभ को कुछ सन्तुष्ट किया ॥२४७॥ तब मय, सुनीथ और सुमेरु के साथ अपने मन्त्रियों के संग सूर्यप्रभ अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त कर फिर सेना-शिविर में लौट आया ॥२४८॥ वहाँ पर असुर और मानव-राजाओं के अपने-अपने निवास-भवन में चले जाने पर स्वयं भी रण-दीक्षा का व्रत लेकर सूर्यप्रभ ने गुहा के आँगन पर रात्रि व्यतीत की ॥२४९॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट विरचित कथामरित्सागर के सूर्यप्रभ लम्बक का तृतीय तरंग समाप्त चतुर्थ तरंग सूर्यप्रभ का रणभूमि में सेना का उतारना रात बीतने पर प्रातःकाल वह सूर्यप्रभ सुमेरु के शासन से अपनी सेना के साथ अमरावती को जीतने के लिए चला ॥१॥ वहाँ से चलकर मन्दरादि के विशाल-स्थल त्रिकूट पर्वत पर पहुँचकर वहाँ पड़ी हुई उसकी सेना, काहलपूर्वक सुनकर सूर्यप्रभ ने अपनी सेना का शिविर स्थापित किया ॥२॥