कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 466, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टम लम्बक ४२९ ब्रह्मा जबतक इन्द्र से इस प्रकार कह रहे थे तभी प्रभास ने महान् पाशुपतास्त्र चलाया ॥५४॥ सर्वसंहारकारी उस अस्त्र से भीषण संहार होते देखकर अपने अंश दामोदर के पुत्र स्नेह से विष्णु ने सुदर्शन चक्र चला दिया ॥५५॥ तब समान बलशाली उन दोनों दिव्यास्त्रों का सहसा विश्व के संहार का कारण तीनों लोकों को व्याकुल करनेवाला युद्ध होने लगा ॥५६॥ 'तुम अपने पाशुपत अस्त्र को हटा लो तो मैं भी अपने सुदर्शन चक्र को हटा लूँगा' विष्णु के इस प्रकार कहने पर प्रभास उनसे बोला—॥५७॥ मेरा चलाया हुआ अस्त्र व्यर्थ नहीं जायगा। दामोदर, युद्ध-भूमि छोड़कर हट जाय तो मैं अस्त्र-संहार कर सकता हूँ ॥५८॥ प्रभास के ऐसा कहने पर विष्णु ने कहा—'तो तुम भी मेरे चक्र की मान-रक्षा करो। जिससे दोनों निष्फल न हों' ॥५९॥ विष्णु का वचन सुनकर अवसर जाननेवाले प्रभास ने कहा—'ठीक है, आपका यह चक्र मेरे रथ को तोड़ दे' ॥६०॥ विष्णु भगवान् के स्वीकार करने पर दामोदर युद्ध-भूमि से लौट गया। फलतः प्रभास ने पाशुपतास्त्र को लौटा लिया और उसके रथ पर सुदर्शन चक्र गिरा ॥६१॥ तब प्रभास दूसरे रथ पर बैठकर सूर्यप्रभ के पास चला गया और उधर दामोदर भी श्रुतशर्मा के पास गया ॥६२॥ इसी बीच इन्द्र का अंश होने के कारण गर्वित श्रुतशर्मा का और सूर्यप्रभ का द्वन्द्व-युद्ध अत्यन्त भीषण अवस्था में पहुँच गया ॥६३॥ श्रुतशर्मा बड़े ही प्रयत्न से जिस अस्त्र का प्रयोग करता था सूर्यप्रभ उसी क्षण प्रति अस्त्र से उसका प्रतिकार कर देता था ॥६४॥ इसके अतिरिक्त श्रुतशर्मा ने जो-जो इन्द्रजाल की माया फैलाई, सूर्यप्रभ ने उस-उस को विरोधी माया से दूर कर दिया ॥६५॥ जब श्रुतशर्मा ने अत्यन्त क्रोध से सूर्यप्रभ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया तब सूर्यप्रभ ने भी पाशुपत अस्त्र का प्रयोग कर दिया ॥६६॥ पाशुपतास्त्र ने जब ब्रह्मास्त्र को दूर कर श्रुतशर्मा पर प्रभाव डाला तब इन्द्र आदि लोकपालों ने क्रोध करके चारों ओर से वज्र आदि अस्त्रों का सूर्यप्रभ पर प्रहार किया ॥६७-६८॥