भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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अष्टम लम्बक ४३५ 'तुम विद्याधरों की दक्षिण ओर की आधी वेदी पर अपना चक्रवर्ती-शासन स्थापित करो और उत्तर की आधी वेदी पर श्रुतशर्मा को चक्रवर्ती बने रहने दो। पुनः कुछ दिनों के पश्चात् इवृत पोगुला किन्नर आदि आकाशचारियों का राज्य प्राप्त करोगे। जब तुम्हारा राज्य-विस्तार हो जाय तब अपनी दक्षिणांशाधी आधी वेदी कुंजरकुमार को देना। इतना कहने के पश्चात् अन्त में शिवजी ने कहा-'इस युद्ध में उभय पक्ष के जितने वीर मरे हैं वे सब जीवित हो जायें। उनके शरीर पर एक घाव भी न रहे। ऐसा कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर सभी मुर्दे ऐसे उठ गये जैसे अभी सोकर उठे हों ॥९०—१०३॥ तदनन्तर विजयी सूर्यप्रभ शिवजी की आज्ञा को शिरोधार्य करके और एकान्त में विस्तृत भूभाग में जाकर एक स्थान पर बैठ गया और सभा (दरबार) की। उस समय आये हुए श्रुतशर्मा को उसने अपने सिंहासन के आधे भाग में सहर्ष बैठाया ॥१०४-१०५॥ प्रभास आदि सूर्यप्रभ के मित्र और श्रुतशर्मा के मित्र दामोदर आदि दोनों, दोनों ओर यथास्थान बैठ गये ॥१०६॥ सुनीथ और मय आदि असुर तथा अष्टापद विद्याधर राजा समुचित आसनों पर विराजमान हो गए। तब मन्त्रि-प्रयासों के अतिरिक्त उद्धत और दैत्य-दानवगण हर्ष मनाते हुए यहाँ आये ॥१०७-१०८॥ युद्ध समाप्त हो जाने वाले सामन्तों के साथ हुए तथा सुभट सुबाहुकुमार एवं इन्दु- कम्पित-सहित भट को दोनों ओर जहाँ जहाँ अपने अपने समुचित विश्राम पर बैठकर सूर्यप्रभ की महारथ-पदवी में बनी पहुँची में अन्य अन्य आकर्षत करहस्त कण्ठ हार हार पदस्थापन में गले अन्य दृश्यों वाली सिन्दु के दरी (दर) के राक्षस से ही इस प्रकार फल-दे गुणो और मन्त्रज्ञ दैत्यों दृढ मनस्क नीते रति अन्य इन दोनों उभयपक्ष के आश्रयदाता जिन मय का आदर सत्कार ही यह इन सब का अनुग्रह पहले कीर्तिदत्त का (युद्ध) के समय में हुआ था दूर दूर तक विस्तृत उत्सव मङ्गलवर्द्धन ॥१०९-११३॥