भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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नवम लम्बक ५०७ अपने रूप और यौवन के घमंड से उसने किसी भी पति को पसन्द नहीं किया तो उसके दुराग्रह से क्रुद्ध होकर उसके माता-पिता ने शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगी और उस योनि में भी उसे पति-सुख न मिलेगा और सोलह वर्ष की अवस्था में ही वह मनुष्य- देह का त्याग कर यहाँ आ जायगी ॥१७१-१७२॥ मुनि-कन्या की अभिलाषा से शाप के कारण मानव-देह को प्राप्त कुरूप मानव खड्गधर तेरा पति होगा। तेरे न चाहने पर भी तुझे वह मर्त्यलोक में ले जायगा। तब दूसरे के द्वारा तुझे ले जाने पर उसके साथ तेरा वियोग होगा ॥१७३-१७४॥ क्योंकि उस खड्गधर ने पूर्वजन्म में दूसरों की आठ स्त्रियों का अपहरण किया है इसलिए वह आठ जन्मों तक भोगने के योग्य दुःखों को प्राप्त करेगा ॥१७५॥ तू भी मानव बन जाने से विद्याओं के नष्ट हो जाने के कारण एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोगेगी ॥१७६॥ पापी व्यक्ति का सम्पर्क सभी को उसके पाप का भागी बना देता है। और, स्त्रियों को तो पापी पति के समान ही पाप का भागी होना ही पड़ता है ॥१७७॥ तूने योग्य वर मिलने पर भी उसका दुराग्रहपूर्ण द्वेष किया है। अतः तू पूर्वजन्मों का स्मरण न करते हुए अनेक मानव-पतियों को प्राप्त करेगी ॥१७८॥ जिस आकाशचारी और समान कुल के मदनप्रभ ने विवाह के लिए तुझे माँगा था वह मनुष्य-राजा होकर अन्त में तेरा पति बनेगा ॥१७९॥ तदनन्तर, शाप से मुक्त होकर फिर अपने लोक में आई हुई और उसी विद्याधर बने हुए मदनप्रभ को पति-रूप में प्राप्त करेगी ॥१८०॥ इस प्रकार माता-पिता द्वारा शाप दी गई अनंगरति पृथ्वी में उत्पन्न होकर और अब (मरकर) माता-पिता के पास पहुँचकर पुनः अनंगप्रभा हो गई है ॥१८१॥ अतः अब तुम वीरपुर जाकर और युद्ध में उसके पिता को जीतकर कुलीनता में सदृश जानते हुए उसे प्राप्त करो। और, इस तलवार को ले लो जिसके हाथ में रहने पर तेरी आकाश में गति हो जायगी और तू अजेय हो जायगा' ॥१८२-१८३॥ ऐसा कहकर और खड्ग देकर वह देवी अन्तर्हित हो गई। तदनन्तर वह जीवदत्त जाग उठा और उसने अपने हाथ में तलवार देखी ॥१८४॥ तदनन्तर, प्रसन्नचित्त जीवदत्त ने उठकर माता को प्रणाम किया और माता की कृपा से उसकी तपस्या का सारा क्लेश दूर होगया ॥१८५॥