कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतदनन्तर तू मनुष्य-योनि में उत्पन्न इसी पत्नी को प्राप्त करेगा इसे और दूसरे पुरुष के साथ अपनी आँखों से देखेगा। तब तू विरक्त होकर ब्राह्मण को राज्य देकर वन जाने का यत्न करेगा। उस समय तेरा छोटा भाई सोमप्रभ भी हाथी की योनि से मुक्त हो जायगा और तू भी इसी पत्नी के साथ मानव-योनि से मुक्त होकर अपने गन्धर्व-रूप को प्राप्त करेगा' ॥१२६-१२७॥ हाथी ने फिर कहा—'इस प्रकार, हम लोग सिद्ध के शाप से मुक्त हो गये। अपने-अपने कर्म के भेद से हम लोग पृथक् पृथक् योनि में उत्पन्न हुए थे। अब हम लोगों के शाप का आज अन्त हो गया' ॥१२८॥ सोमप्रभ के ऐसा कहने पर वह राजा नलाधिपति बोला—'मैं अपने पूर्व जन्म का स्मरण करता हूँ। वह देवप्रभ मैं ही तो था और यह राजदत्ता मेरी राजवती नाम की पत्नी है। ऐसा कहकर राजा और रानी राजवती राजदत्ता ने अपना मनुष्य का चोला त्याग दिया। उसी समय वे तीनों (राजा रानी और हाथी) गन्धर्व-देह धारण करके लीला के देखते-देखते आकाश में उड़कर मरुदाचल-स्थित अपने धाम को चले गये ॥१२९-१३१॥ शीलावती भी अपने शुद्ध चरित्र के प्रभाव से प्रचुर धन प्राप्त करके ताम्रलिप्ती नगर में जाकर धार्मिक जीवन व्यतीत करने लगी ॥१३२॥ इस प्रकार, संसार में कहीं भी कोई स्त्री को नियन्त्रण में रखकर रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकता। कुलीन स्त्री को उसका अपना ही एकमात्र प्रबल और विशुद्ध मन उसकी रक्षा कर सकता है ॥१३३॥ इस प्रकार दूसरों से ईर्ष्या करना और उन पर दोष लगाना यह मानव-स्वभाव का दोष है। यहाँ अधिक नियन्त्रण स्त्रियों की उन्मुक्तता को अत्यधिक बढ़ा देता है ॥१३४॥ नरवाहनदत्त इस प्रकार अपनी पत्नी रत्नप्रभा से कही गई कथा को सुनकर अपने मन्त्रियों के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुआ ॥१३५॥ महाकविश्रीमत्सोमदेवभट्टविरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग निश्चयबल और अनुरागपरा की कथा इस प्रकार रत्नप्रभा से कही गई कथा के अन्त में नरवाहनदत्त का मन्त्री गोमुख उससे कहने लगा—॥१॥